मंगलवार, 28 जुलाई 2026

बिल्ली रानी-बाल कविता।

बहुत दिनों से थी तमन्ना,

एक नन्ही बिल्ली घर लाऊं।

काली, धवल या चितकबरी,

जी भर उस पर प्यार लुटाऊं।।


गांव- गांव में ढूंढ़ा मैंने,

नन्ही बिल्ली नहीं मिली।

मोबाइल पर जब खोजा मैंने, 

तब एक पर्शियन बिल्ली मिली।।


नीली- नीली उसकी आंखें,

मखमल जैसे कोमल बाल।

राजकुमारी जैसी लगती,

 उसकी प्यारी मतवाली चाल।।


रोटी- दूध उसे न भाता,

पेडिग्री ही उसे सुहाती।

अपने प्यारे नन्हे घर में,

रानी बनकर वह इठलाती।।


कभी गेंद के पीछे दौड़े,

कभी परछाईं से टकराए।

उसकी शैतानी देख- देख कर,

सबके चेहरे पर मुस्काए।।


धीरे- धीरे कदम बढ़ाकर,

वह मेरी गोदी में आती।

नन्हे- नन्हे कोमल पंजों से,

मन का सारा प्यार जताती।।


म्याऊं- म्याऊं करती जब आती,

घर में खुशियां नई जगाती।

उसकी नन्ही- सी अठखेलियां,

सबके मन को खूब लुभाती।।


स्वरचित- मं

जू बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।


मंगलवार, 21 जुलाई 2026

चेहरों के पीछे- हिंदी कविता।

चारों ओर मुखौटों का मेला,

सच का चेहरा लाचार है।

दिखावे की चकाचौंध में,

हर संवेदना बीमार है।।


भोले मन को मूर्ख समझना,

अब जग की पहचान हुई।

चापलूसी के ऊंचे सिंहासन,

मेहनत फिर उपेक्षित हुई।।


छल- प्रपंच की आंधी ऐसी,

विश्वास बिखर- बिखर जाता है।

मित्रों के ही बदले चेहरे,

मन को भीतर तक छल जाता है।।


रिश्तों की चौखट पर देखो,

स्वार्थ का पहरा गहरा है।

हर मुस्कान के पीछे जैसे,

कोई छिपा अंधेरा है।।


मेहनत का मूल्य कहां मिलता,

झूठ यहां सम्मानित है।

मक्खन बाजी के दरबारों में,

सत्य सदा तिरस्कृत है।।


फिर भी मन से हार न मानो,

सत्य कभी मरता नहीं।

मुखौटों के इस संसार में,

ईमान कभी झुकता नहीं।।


स्वरचित- मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सोमवार, 20 जुलाई 2026

श्रीमद्भगवद्गीता- अथ प्रथमोऽध्याय:

 ॐ श्री परमात्मने नमः 

श्रीमद्भगवद्गीता 

अथ प्रथमोऽध्याय:

धृतराष्ट्र उवाच 

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। 

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ १

हिंदी भावार्थ- धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्र और पाण्डु के पुत्र क्या कर रहे हैं? 

कुमाऊनी में अर्थ- रज धृतराष्ट्र संजय ह्वै पूछनयी- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में लड़ैं करनैं ल्यी इकठ्ठ ह्वै रयी म्यर और पाण्डुक च्यल कै करनैई?

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

 गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

समीक्षा 

धृतराष्टृ संजय थें पुछण रईं, हे संजय धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध करणैकि इच्छा लिहबैर एकठ्ठ हई म्यर च्याल और पांडु च्याल के करणईं ? 


रविवार, 19 जुलाई 2026

सपने का बोझ: एक मां की स्वीकारोक्ति। संस्मरण।

शादी के 3- 4 साल बाद मैं गाजियाबाद में शिफ्ट हो गई, मेरे पति की सैलरी सीमित थी, तो हम जनता से फ्लैट में रहते थे। मेरे सामने वाले घर में  उत्तराखंड से राजेश सिंह रावत जी का परिवार रहता था। उनकी पत्नी का नाम रमा था, और उनका एक प्यारा सा बेटा था। राजेश जी मेरे पति के दफ्तर में इलैक्ट्रिशियन थे। उनकी आय सीमित थी, लेकिन  उनकी पत्नी केे सपनों की कोई सीमा नहीं थी। हर मां की तरह रमा भी इच्छा थी कि उसका बेटा वह सब पाए जो उसे कभी नहीं मिला। उसे विश्वास था कि यदि उसे शहर के सबसे प्रतिष्ठित विद्यालय में पढ़ा देगी, तो उसका भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल हो जाएगा। और उसने राजेश से लड़ झगड़ कर अपने बेटे का दाखिला दिल्ली पब्लिक स्कूल में करा दिया।

उस विश्वास ने मुझे दिन- रात सिलाई मशीन के सामने बैठा दिया। मशीन की सुई केवल कपड़े नहीं सीती थी, वह मेरे सपनों को भी जोड़ती चली जाती थी। देर रात तक चलती मशीन की घरघराहट में मुझे अपने बेटे का सुनहरा भविष्य सुनाई देता था। 

धीरे- धीरे घर का हर महीना फीस की तारीख के इर्द- गिर्द सिमटने लगा। हमारी छोटी- छोटी खुशियां घूमना-फिरना, अपनी इच्छाएं, त्योहारों की सहज मुस्कान सब कुछ उस एक बार फीस की रसीद के नीचे दबता चला गया। हम जी तो रहे थे, लेकिन खुलकर नहीं जी पा रहे थे।

मेरा बेटा पढ़ाई में औसत था। वह अपनी क्षमता भर प्रयास करता था, लेकिन मेरी अपेक्षाएं उसकी क्षमता से कहीं बड़ी थीं। जब भी उसके अंक कम आते, मैं उसकी कापी नहीं देखती थी, उसकी मेहनत भी नहीं देखती थी। मुझे केवल वह भारी फीस दिखाई देती थी, जिसे भरने के लिए हमने अपने जीवन की अनेक आवश्यकताओं का त्याग किया था।

मैं उसे बार- बार यही कहती, "इतने महंगे स्कूल में पढ़ रहे हो, इतना पैसा खर्च हो रहा है, अभी मन लगाकर नहीं पढ़ते, नंबर देखो जरा अपने, किसी को बता भी नहीं सकते, लोग क्या कहेंगे?"

मैं आज सोचती हूं, मैं उसे पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर रही थी, बल्कि अनजाने में उसके मन पर अपराधबोध का बोझ रख रही थी। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि हर बच्चे की अपनी बौद्धिक क्षमता होती है। जो जितना कर सकता है, वह उतना ही करेगा। अपेक्षाएं प्रेरणा बनें तो सुंदर होती हैं, लेकिन जब वे तुलना और दबाव बन जाएं, तो बच्चे का आत्मविश्वास धीरे- धीरे टूटने लगता है।

एक घटना आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है, मानो वह कल ही घटित हुई हो। उस समय मेरा बेटा लगभग सात- आठ वर्ष का था। रविवार का दिन था। पतिदेव ओवरटाइम के कारण आफिस चले गए थे। घर के सभी काम निपटाकर मैं नहाने के लिए बाथरूम में गई।

अभी कुछ ही समय बीता था कि अचानक बाहर से बाथरूम का दरवाज़ा बंद हो गया।  मैंने बेटे को आवाज दी, "बेटा शुभम! दरवाज़ा खोलो।" परंतु उधर से कोई उत्तर नहीं आया।

मैंने फिर पुकारा। कभी प्यार से तो कभी गुस्से से पुकारा, कभी घबराकर रूंवासी आवाज में पुकारा। और साथ ही किसी अनहोनी के डर से मेरी बेचैनी भी बढ़ रही थी। किंतु आश्चर्य! न कोई उत्तर मिला, न कोई आहट सुनाई दी। बड़ी मुश्किल से लगभग आधे घंटे के आसपास उसने दरवाज़ा खोला। बाहर निकलते ही मैंने उसके कान जोर से खींचे और कहा, "तुम्हारी शरारतें  तो दिन- प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। आज तुम बाहर खेलने नहीं जाओगे। सिर्फ पढ़ाई करोगे। मैंने दंडस्वरूप उसे जबरन पढ़ने बैठा दिया और स्वयं अपनी सिलाई मशीन पर जाकर काम में लग गई। उस समय मुझे लगा कि बात यहीं समाप्त हो गई है

लेकिन आज, वर्षों बाद, जब उस घटना को याद करती हूं, तो समझ में आता है कि वह शरारत नहीं थी। वह एक छोटे से बच्चे का मौन विद्रोह था। उसके भीतर जमा हुआ आक्रोश, जिसे वह शब्दों में नहीं कह सकता था, उसने उसी तरह व्यक्त किया।

उस दिन मेरा बेटा मुझे बाथरूम में बंद नहीं कर रहा था; वह शायद उन शब्दों का प्रतिरोध कर रहा था, जिनसे मैं रोज उसके मन को बंद कर रही थी।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सर्वाधिकार सुरक्षित।

संघर्ष से सृजन तक- एक सांस्कृतिक यात्रा: संस्मरण।

जीवन की कुछ घटनाएं समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि स्मृतियों के आकाश में और अधिक उजली हो जाती हैं। वे केवल बीते हुए दिनों की कहानी नहीं होती, बल्कि हमारे व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिला बन जाती हैं। यह संस्मरण भी मेरे जीवन के ऐसे ही एक अनुभव की कहानी है, जिसने मुझे सिखाया कि समाज सेवा का मार्ग जितना सुंदर दिखाई देता है, उतना ही कठिन भी होता है।

2024 में गाजियाबाद RNE में जब उत्तराखंड समाज की नई संस्था का गठन हुआ। उस समय उत्तराखंड समाज का वातावरण पूरी तरह सहज नहीं था। हमारी सोसाइटी सहित अनेक सोसायटी के उत्तराखंडी परिवार उस संस्था से नाराज़ थे। नाराज़गी का कारण भी उचित था। जिन वरिष्ठ लोगों ने वर्षों की मेहनत, और संघर्ष से उस संस्था की नींव रखी थी, संस्था बनते ही उन्हें किनारे कर दिया गया। स्वाभाविक था कि उनके मन में पीड़ा थी और उनके साथ जुड़े लोगों के मन में भी असंतोष था।

मैं भी इस परिस्थिति से अनजान नहीं थी। मेरे मन में भी प्रश्न थे, कुछ खिन्नता भी थी। परंतु मेरे भीतर एक दूसरी आवाज़ भी थी, जो कहती थी, "यदि उत्तराखंड के नाम पर कोई सकारात्मक पहल हो रही है, तो उसे सफल बनाने में अपना योगदान अवश्य देना चाहिए।, व्यक्ति से बड़ा समाज होता है और समाज से बड़ी संस्कृति।" 

मेरे लिए सौभाग्य की बात यह थी कि सांस्कृतिक कार्यक्रम की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मैंने सभी व्यक्तिगत मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए यह दायित्व सहर्ष स्वीकार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि अपने कई परिचित उत्तराखंडी परिवारों की नाराज़गी भी मुझे सहनी पड़ी।

संस्था के प्रथम सांस्कृतिक महोत्सव की तैयारियों में मैंने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उत्तराखंड के बच्चों व महिलाओं को खोज- खोजकर एकत्रित किया, उन्हें मंच के लिए तैयार किया, अभ्यास करवाया, कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में सहयोग दिया। दिन और रात का भान ही नहीं रहा। जब मुझे बताया गया कि कार्यक्रम का मंच संचालन भी मुझे करना है, तो मैंने उसकी भी पूरी तैयारी की। मन में केवल एक ही इच्छा थी कि पहला कार्यक्रम इतना सफल हो कि लोगों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति नया विश्वास जागे।

कार्यक्रम का दिन आया। सभागार लोगों से भरा हुआ था। बच्चों का उत्साह, महिलाओं की भागीदारी और लोक संस्कृति की रंगत देखकर मन प्रसन्न था। लेकिन मंच पर पहुंचने का मेरा अनुभव वैसा नहीं रहा, जैसा मैंने सोचा था। माइक तभी मेरे हाथ में आता, जब मैं स्वयं निवेदन करती। उस समय मन को चोट तो लगी, लेकिन मैंने उसे अपने कर्तव्य के आड़े नहीं आने दिया। जितना भी मंच संचालन मुझे मिला मैंने पूरे मन से किया और कार्यक्रम अत्यंत सफल रहा।

कार्यक्रम समाप्त हुआ। सभी के योगदान की प्रशंसा हुई, अनेक लोगों का नाम लेकर धन्यवाद दिया गया। किन्तु अंत तक मेरे योगदान का एक शब्द भी किसी की ओर से नहीं आया। उस क्षण भीतर जैसे कोई गहरी खामोशी उतर आई। मुझे सम्मान की लालसा नहीं थी, लेकिन अपने श्रम की पूर्ण उपेक्षा ने मन को बहुत आहत किया।

कुछ समय बाद मैंने सोचा कि शिकायतों में समय नष्ट करने से बेहतर है कि एक नया रास्ता बनाया जाए।  कुछ समान सोच रखने वाली महिलाओं के साथ मैंने एक नया सांस्कृतिक समूह बनाया। हमारा उद्देश्य केवल कार्यक्रम करना नहीं था, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, लोक परंपराओं और मातृभाषाओं को निःस्वार्थ नई पीढ़ी तक पहुंचाना था। हमने उत्तराखंड के लोक पर्व हरेला, उत्रैणी और होली पर्व पूरे उत्साह से मनाने शुरू किए। धीरे-धीरे महिलाएं जुड़ने लगीं और समाज में अपनापन बढ़ने लगा। और एक  सांस्कृतिक समूह तैयार हो गया। हमने अपने समूह का नाम रखा "उत्तराखंड मातृशक्ति ग्रुप।"

किन्तु जहां केवल महिलाएं होती हैं, वहां भी समय- समय पर मतभेद जन्म ले लेते हैं। धीरे- धीरे कुछ महिलाओं के बीच राजनीति और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ने लगी। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि कुछ साथी मेरे विरोध में खड़ी हो गईं। यहां तक कहा जाने लगा कि मैं गढ़वाल की अपेक्षा कुमाऊं को अधिक महत्व देती हूं, जबकि मेरा उद्देश्य सदैव सम्पूर्ण उत्तराखंड की संस्कृति को समान सम्मान देना रहा है।

लगभग दस वर्ष पूर्व हमने राजनगर एक्सटेंशन में उत्तराखंड की महिलाओं को खोज- खोजकर एक व्हाट्सऐप समूह बनाया था। उसी समूह के माध्यम से हम सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का संचालन करते थे। एक दिन अचानक मुझे और मेरे साथियों को उस समूह के एडमिन पद से हटा दिया गया तथा हमारे सभी अधिकार समाप्त कर दिए गए। यह घटना मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक थी, क्योंकि मेरा सम्पूर्ण कार्य इस बात का साक्षी था कि मैंने सदैव पूरे उत्तराखंड को एक परिवार मानकर ही कार्य किया है।

इन घटनाओं ने मुझे दुखी अवश्य किया, पर मेरे संकल्प को डिगा नहीं सकीं। 

पुराने समूह में हम साथ तो रह रहे थे लेकिन स्वच्छंद रूप से कुछ काम नहीं कर पा रहे थे। अंततः हमने एक नया समूह बनाया, जिसका नाम रखा- "उत्तराखंड मातृशक्ति ग्रुप RNE। "उस समूह में हमने कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा सिखाने का नियमित अभियान प्रारम्भ किया।

कुछ महिलाओं ने ग्रुप को भी समाप्त करने का भरपूर प्रयास किया, इस बार मैंने यह निश्चय कर लिया कि अब मैं अपने उत्तर का माध्यम विवाद नहीं, बल्कि अपना कार्य बनाऊंगी। आज उसी समूह में मैं पूरे मन से गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा सिखाने का कार्य कर रही हूं।

मेरा विश्वास है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी स्मृतियों और हमारी संस्कृति की आत्मा है। उत्तराखंड मातृशक्ति ग्रुप RNE की कुछ समर्पित महिलाएं आज भी मेरी शक्ति बनकर मेरे साथ खड़ी हैं और मातृभाषा के प्रचार- प्रसार में पूर्ण सहयोग दे रही हैं।

अब मैं  जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो किसी के प्रति मेरे मन में कटुता नहीं है। जिन्होंने मुझे ठेस पहुंचाई, उन्होंने अनजाने में मुझे समाज के लिए काम करने के लिए और अधिक प्रेरित किया है। यदि वे परिस्थितियां न आतीं, तो शायद मैं अपना यह स्वतंत्र सांस्कृतिक परिवार कभी खड़ा ही न कर पाती।

आज मेरा विश्वास पहले से कहीं अधिक दृढ़ है कि समाज सेवा का मार्ग सम्मान पाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को जीवित रखने के लिए चुना जाता है। 

आलोचनाएं आती रहेंगी, मतभेद जन्म लेते रहेंगे और कुछ लोग साथ छोड़ते भी रहेंगे, पर यदि मन में समाज और संस्कृति की निस्वार्थ सेवा का भाव हो, तो समय अंततः उसी के पक्ष में साक्षी बनकर खड़ा होता है।

मैं आज भी उसी विश्वास के साथ आगे बढ़ रही हूं, मैं किसी व्यक्ति के लिए नहीं, मैं उत्तराखंड की बोलि- भाषा और संस्कृति के लिए कल भी समर्पित थी, आज भी हूं और आगे भी रहूंगी।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

डीडीहाट की एक अविस्मरणीय साहित्यिक यात्रा: संस्मरण।

 कुछ यात्राएं केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं ले जातीं, वे मनुष्य के भीतर भी एक नई यात्रा आरम्भ कर देती हैं। मेरी डीडीहाट यात्रा भी ऐसी ही थी। यह केवल एक साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने की यात्रा नहीं थी, बल्कि अपनी मातृभाषा, अपनी संस्कृति और देवभूमि उत्तराखंड के सहज, सरल जीवन को निकट से जीने का एक दुर्लभ अवसर भी थी। आज जब उस यात्रा को स्मरण करती हूं तो लगता है मानो हिमालय की शीतल हवा, देवदार के वन, वर्षा से भीगे पहाड़ और वहां के आत्मीय लोग आज भी मेरे मन के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं।

मेरा डीडीहाट यात्रा का आरम्भ हल्द्वानी बस स्टैंड से होना था।  प्रातः छह बजे हल्द्वानी से डीडीहाट के लिए केवल एक ही बस जाती है। प्राइवेट टैक्सी जाती है लेकिन उसका किराया दो हजार रुपये था , जो मेरे बजट से बाहर था। इसलिए मैंने बस से ही यात्रा करने का निर्णय लिया।

सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी कि मैं हल्द्वानी बस अड्डे पर पहुंच गई। मन में उत्साह भी था और हल्की- सी चिंता भी, कहीं बस छूट न जाए। सचमुच ऐसा ही होने वाला था। मैं जैसे ही बस अड्डे पर पहुंची, बस चलने को तैयार खड़ी थी। यदि पांच मिनट भी और देर हो जाती तो शायद पूरी यात्रा की योजना बदल जाती। बस में केवल एक ही सीट खाली थी, वह भी परिचालक के पास। उस सीट पर बैठते हुए मन में एक अनकही खुशी थी कि चलो, यात्रा शुरू तो हुई। 

बस धीरे- धीरे हल्द्वानी को पीछे छोड़ती हुई पर्वतीय मार्ग पर चढ़ने लगी। सड़क के हर मोड़ के साथ प्रकृति अपना नया रूप दिखाने लगी। हरे- भरे ऊंचे- ऊंचे वृक्ष आकाश से बातें करते दिखाई देते, कहीं सीढ़ीनुमा खेत मानो पहाड़ों की गोद में सजे हुए हों। दूर-दूर तक फैली हरियाली मन को अनायास ही मोह लेती थी।

यात्रा अभी आगे बढ़ ही रही थी कि अचानक एक अप्रत्याशित घटना हो गई। वीर भट्टी (नैनीताल) के पास बस खराब हो गई। सभी यात्रियों को उतरना पड़ा। पहाड़ों के बीच सुनसान सड़क पर लगभग एक घंटे तक नई बस की प्रतीक्षा करनी पड़ी। शुरू- शुरू में सभी के चेहरे पर चिंता और झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी। दिनभर का लंबा सफर सामने था और यह विलंब बेचैन कर रहा था। परंतु पहाड़ शायद धैर्य सिखाना जानते हैं। थोड़ी देर बाद जब नई बस आई तो सभी यात्रियों के चेहरों पर फिर से मुस्कान लौट आई। ऐसा लगा मानो यात्रा ने एक बार फिर गति पकड़ ली हो।

जून का महीना था। जैसे- जैसे बस अल्मोड़ा की ओर बढ़ी, मौसम ने अचानक करवट ली। घने बादल उमड़ आए और फिर मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। वर्षा थमने के बाद चारों ओर कोहरा छा गया। देवदार के वृक्ष धुंध की चादर में ऐसे लिपट गए थे मानो प्रकृति ने उन्हें अपने आंचल में छिपा लिया हो।

उस समय बस की खिड़की से बाहर झांकते हुए मुझे सचमुच ऐसा लग रहा था कि हमारी बस सड़क पर नहीं, बल्कि बादलों के बीच चल रही है। कभी नीचे गहरी घाटियां दिखाई देती, तो अगले ही क्षण सब कुछ सफेद धुंध में विलीन हो जाता। वह दृश्य इतना मोहक था कि आंखें झपकाने का भी मन नहीं करता था।

दोपहर के समय भोजन के लिए बस सेराघाट में रुकी। वहां अधिकांश होटलों में मांसाहारी भोजन बनता था। मैं शुद्ध शाकाहारी हूं, इसलिए थोड़ा संकोच हुआ। तभी किसी स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि पास में एक छोटा- सा भोजनालय है जहां शुद्ध शाकाहारी भोजन बनता है। मैंने अपना मनपसंद खाना आलू के गुटके, गरमागरम रोटियां मंगाई, भोजन के बाद गरमागरम जलेबी और दही खाया, मन तृप्त हो गया। पहाड़ की ठंडी हवा में दही और गरम जलेबी का स्वाद आज भी स्मृतियों में उतना ही ताज़ा है।

शाम को लगभग साढ़े सात बजे हम डायट यूनिवर्सिटी डीडीहाट पहुंचे। सुबह छह बजे शुरू हुई यात्रा रात तक चलती रही थी। शरीर थक चुका था, पर मन उत्साह से भरा था। 

डायट पर पहुंचते ही सम्मेलन के आयोजक और कुछ साहित्यकार हमारा स्वागत करने के लिए पहले से उपस्थित थे। उनके आत्मीय व्यवहार ने दिनभर की सारी थकान पलभर में दूर कर दी। ऐसा लगा जैसे किसी अपरिचित स्थान पर नहीं, बल्कि अपने ही लोगों के बीच आ पहुंची हूं।

डायट पर पहुंचने के बाद मुझे रूम नंबर 23 दिया गया, उसमें तीन बेड लगे हुए थे, उस कमरे में मेरे साथ दो अन्य नवोदित महिला रचनाकार थीं। साहित्यिक आयोजनों में प्रायः यह संकोच रहता है कि कहीं बड़े- बड़े साहित्यकारों के बीच स्वयं को छोटा न महसूस करना पड़े, पर यहां ऐसा कुछ भी नहीं था। हमारे बीच किसी प्रकार का औपचारिक दबाव नहीं था। बातचीत सहज थी, व्यवहार आत्मीय था और वातावरण बिल्कुल पारिवारिक। हम तीनों अलग- अलग स्थानों से आई थीं, पर साहित्य ने हमें एक ही सूत्र में बांध दिया था।

रात्रि भोजन के बाद एक परिचय- गोष्ठी आयोजित की गई। बाल साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकार और संपादक उदय सिंह किरौला जी ने उत्तराखंड के सभी आमंत्रित साहित्यकारों को एक साथ बैठाकर परिचय कराया। वह दृश्य मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक था। वहां वरिष्ठ साहित्यकार भी थे, युवा रचनाकार भी और हम जैसे नवोदित लेखक भी। किसी के चेहरे पर अहंकार नहीं था; केवल साहित्य के प्रति समर्पण और एक- दूसरे के प्रति सम्मान दिखाई दे रहा था।

उस गोष्ठी में अनेक साहित्यकारों से पहली बार मिलने का अवसर मिला। रेखा जी, मंजू पांडे उदिता जी, रेखा बिष्ट जी, हयात सिंह जी, धारा बल्लभ पांडे जी, नीरज पंत जी तथा कई अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों का सहज और स्नेहपूर्ण व्यवहार मेरे मन को गहराई से छू गया। मैंने अनुभव किया कि किसी व्यक्ति की महानता केवल उसके लेखन से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से भी पहचानी जाती है। उन सबके बीच बैठकर ऐसा लगा मानो वर्षों से परिचित लोगों के बीच हूं।

अगली सुबह बच्चों का सांस्कृतिक कार्यक्रम होना था, पर प्रकृति की अपनी ही योजना थी। सुबह से घनघोर वर्षा आरंभ हो गई। पहाड़ों पर बरसती वर्षा का सौंदर्य शब्दों में बांधना कठिन है। बादल कभी पहाड़ियों को ढंक लेते, कभी हवा का एक झोंका आता और सामने दूर तक फैली हरियाली अचानक दिखाई देने लगती। वर्षा इतनी तेज़ थी कि हम बच्चों के कार्यक्रम में नहीं जा पाये, जिसका मुझे बहुत अफसोस भी हुआ। 

दोपहर में साहित्यिक गोष्ठी आरंभ हुई। देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों ने भाषा, साहित्य, संस्कृति और बाल साहित्य पर अपने विचार रखे। विचारों की विविधता देखकर बार- बार यह अनुभूति होती रही कि भारत सचमुच अनेक भाषाओं और संस्कृतियों का विराट देश है, और साहित्य उन सबको जोड़ने वाला सबसे सुंदर सेतु है।

इसी सम्मेलन में मैंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने मुझे भीतर तक प्रभावित किया। कवि सम्मेलन के एक सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया, किंतु उनकी समीक्षा करने के लिए बच्चों को मंच पर आमंत्रित किया गया। छोटे-छोटे बाल समीक्षक पूरे आत्मविश्वास के साथ कविता की भाषा, भाव और प्रस्तुति पर अपने विचार रख रहे थे। यह मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। मैंने पहले कभी किसी साहित्यिक आयोजन में ऐसा प्रयोग नहीं देखा था। उस क्षण लगा कि यदि बचपन से ही बच्चों को साहित्य को समझने और उस पर विचार व्यक्त करने का अवसर मिले, तो भविष्य में संवेदनशील पाठकों और श्रेष्ठ साहित्यकारों की एक नई पीढ़ी तैयार होगी।

उस दिन मैंने जाना कि साहित्य केवल लिखने और सुनाने की विधा नहीं है; वह संवाद की संस्कृति भी है, जहां आयु नहीं, विचारों का महत्व होता है।

शाम 5 बजे से कवि सम्मेलन आरंभ हुआ। सभागार में उत्सुकता का वातावरण था। एक- एक कर कवि मंच पर आ रहे थे और अपनी रचनाएं सुना रहे थे। मैं भी अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी। मन में हल्का-सा कंपन था, पर उससे कहीं अधिक गर्व था, क्योंकि मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं अपनी मातृभाषा में ही कविता सुनाऊंगी।

 सभागार में देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकार, शिक्षक और विद्यार्थी उत्सुकता से कवि सम्मेलन का आनंद ले रहे थे। किसी की कविता में देशभक्ति थी, किसी में प्रकृति का सौंदर्य, तो किसी में समाज की विडंबनाओं का चित्रण। 

जब संचालिका ने मेरा नाम पुकारा, तो मैंने मंच पर पहुंचकर सबसे पहले देवभूमि और आयोजकों को प्रणाम किया। फिर मैंने उत्तराखंड की अपनी लोकभाषा में रचित कविता "गोपी" का पाठ प्रारंभ किया।

यह केवल एक कविता नहीं थी, यह संयुक्त परिवार की आत्मीयता, दादा- दादी का स्नेह, चाचा- चाची व माता- पिता के कर्तव्य तथा भारतीय पारिवारिक संस्कारों का जीवंत चित्र थी। कविता आगे बढ़ती गई और सभागार में एकाग्रता बढ़ती गई। बहुत से श्रोता भाषा नहीं समझ रहे थे, पर भावों की भाषा सब समझ रहे थे। कविता समाप्त होते ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों ने आकर कहा, "भाषा हमारे लिए नई थी, लेकिन भाव सीधे हृदय तक पहुंचे।"

उन शब्दों ने मेरे मन को गहराई तक छू लिया। उस क्षण मुझे अनुभव हुआ कि भाषा का वास्तविक सौंदर्य उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनाओं में बसता है। मेरी मातृभाषा उस दिन केवल मेरे गांव या मेरे प्रदेश की भाषा नहीं रही; वह पूरे सभागार की साझा अनुभूति बन गई। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे यह सम्मान केवल मेरा ही नहीं हुआ, मेरे साथ मेरी मातृभाषा, मेरी संस्कृति और मेरे उत्तराखंड का भी सम्मान हुआ है।

रात्रि में हमें सूचना दी गई कि प्रातः पांच बजे पक्षी- दर्शन के लिए जंगल की सैर पर निकलना है। यह सुनकर मन में सहज ही विचार आया, जंगल तो पहले भी कई बार देखे हैं और पक्षियों को भी, फिर इतनी सुबह, वह भी ठंड में उठने की क्या आवश्यकता है? यही सोचकर मैंने निश्चिंत होकर सो जाना ही उचित समझा।

किन्तु प्रातः जब आंख खुली, तो देखा कि लगभग सभी साथी जंगल की सैर के लिए बड़े उत्साह के साथ तैयार हो चुके थे। उनके चेहरे का उल्लास देखकर मैंने स्वयं से कहा,"अरे आलसी! सोना तो रोज़ ही होता है, आज उठ, कुछ नया देख, कुछ नया सीख।"

बस फिर क्या था, मैं तुरंत उठी, स्नान कर तैयार हुई। इतने में किरौला जी सभी के लिए गरमागरम ब्लैक टी लेकर आ गए। उस सर्द सुबह में ब्लैक टी की चुस्कियों ने मानो नई ऊर्जा भर दी। चाय समाप्त करते ही मैं भी पूरे उत्साह के साथ समूह में शामिल हो गई और प्रकृति की उस अनूठी यात्रा पर निकल पड़ी।

वहां पहुंचकर समझ में आया कि प्रकृति को देखना और प्रकृति को पहचानना दो अलग बातें हैं। जिम कॉर्बेट क्षेत्र से आए विशेषज्ञ हमारे साथ थे। उन्होंने विभिन्न पक्षियों की आवाज़ों की इतनी सजीव नकल की कि क्षणभर के लिए लगा मानो पूरा जंगल हमारे स्वागत में गा उठा हो। दूरबीन से रंग-बिरंगे पक्षियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखना मेरे लिए एक नया अनुभव था। वर्षों से उत्तराखंड में रहते हुए भी जिन पक्षियों को केवल उड़ते हुए देखा था, उस दिन पहली बार उनके नाम, स्वभाव और विशेषताओं को जानने का अवसर मिला। मुझे लगा कि प्रकृति एक खुली हुई पुस्तक है। उसे पढ़ने के लिए केवल आंखें नहीं, संवेदनशील मन भी चाहिए।

इसी बीच अवसर मिला तो हमारे समूह की तीन कवयित्रियों ने मलयनाथ महादेव के दर्शन का निश्चय किया। डायट विश्वविद्यालय से मंदिर की दूरी अधिक होने के कारण हमने एक वाहन बुक किया और मलयनाथ महादेव मंदिर की ओर प्रस्थान किया।

मंदिर एक ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थित था। वहां तक पहुंचने के लिए लगभग 325 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थीं। यह चढ़ाई बिल्कुल भी सरल नहीं थी। कुछ दूर बढ़ते ही सांसें तेज हो जातीं, फिर कुछ क्षण विश्राम कर हम पुनः आगे बढ़ जाते। शरीर थकान का अनुभव कर रहा था, किन्तु शिव- दर्शन की अटूट आस्था और मन की श्रद्धा उस थकान पर भारी पड़ रही थी। हर सीढ़ी के साथ ऐसा लगता मानो हम केवल पर्वत की ऊंचाई ही नहीं, बल्कि अपनी आस्था की ऊंचाइयों को भी स्पर्श कर रहे हों।

आखिरकार हम मलयनाथ महादेव मंदिर पहुंच ही गए। गर्भगृह में विराजमान भगवान शिव के दर्शन करते ही मन को गहरा सुकून मिला। ऐसा लगा जैसे सारी थकान पल भर में दूर हो गई हो और तन-मन नई ऊर्जा से भर गया हो।

मंदिर से बाहर निकले तो सामने हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां सूर्य की किरणों में चांदी की तरह चमक रही थीं। ऐसा मनमोहक दृश्य जीवन में बार- बार देखने को नहीं मिलता। हम तीनों कुछ देर वहीं बैठकर उस अद्भुत नज़ारे को निहारते रहे। सूर्य की किरणें जब बर्फ से ढकी चोटियों पर पड़तीं, तो वे और भी सुंदर दिखाई देती। उस पल प्रकृति का सौंदर्य मन को मंत्रमुग्ध कर रहा था। कुछ देर बाद हम सीढ़ियां उतरकर नीचे अपनी गाड़ी के पास पहुंचे। तभी अचानक ध्यान आया कि मैं अपना स्वेटर मंदिर परिसर में ही भूल आई हूं। यह याद आते ही मन उदास हो गया। उस समय फिर से 325 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाना संभव नहीं था।

पास ही एक स्थानीय दुकानदार से मैंने अपनी समस्या कही। उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़े विश्वास से कहा, "चिंता मत कीजिए, आपकी स्वेटर आपको मिल जाएगी। उनकी सहजता ने मेरे मन का आधा बोझ उसी क्षण हल्का कर दिया।, उनका मोबाइल नंबर लेकर हम वापस आ गए। 

शाम को मैंने उन्हें फोन किया। उन्होंने बताया कि किसी श्रद्धालु ने स्वेटर सुरक्षित उनके पास पहुंचा दी है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने एक परिचित के माध्यम से वह स्वेटर हमारे ठहरने के स्थान डायट तक भिजवा भी दी।

रात्रि में जब मैंने अपनी स्वेटर सुरक्षित अपने सामने रखी देखी तो मन अनायास ही भर आया। वह केवल एक ऊनी वस्त्र नहीं था; वह उत्तराखंड के लोगों की ईमानदारी, संवेदनशीलता और आत्मीयता का सजीव प्रमाण था।

गाजियाबाद में किसी वस्तु के खो जाने पर उसके वापस मिलने की आशा बहुत कम रह जाती है, और यहां अनजान लोगों ने बिना किसी स्वार्थ के केवल मानवीय संवेदना के कारण इतना प्रयास किया। वाकई में हमारी देवभूमि उत्तराखंड के लोग बहुत सरल और सच्चे होते हैं। 

यात्रा का अंतिम दिन भी अनेक सुखद स्मृतियां लेकर आया। समापन समारोह में विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों की उपस्थिति में प्रतिभागियों का सम्मान किया गया। 

सम्मान-चिह्न हाथ में लेते समय मुझे लगा कि यह पुरस्कार केवल मेरे लिए नहीं है। यह मेरी मातृभाषा, मेरे गांव, मेरी संस्कृति और उन लोक परंपराओं का सम्मान है, जिन्होंने मुझे लिखना सिखाया। उस क्षण मन गर्व से भर उठा।

विदा का समय हमेशा थोड़ा उदास करता है। जब डीडीहाट से लौटने के लिए बस चली तो खिड़की से बाहर दूर तक फैले पर्वत, चीड़, देवदार के वन और बादलों में लिपटी घाटियां धीरे- धीरे पीछे छूटती चली गईं। ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ चुपचाप विदा दे रहे हों। मैं बार- बार मुड़कर उन पर्वतों को देखती रही।

वापसी की पूरी यात्रा में मैं सोचती रही कि इस प्रवास ने मुझे क्या दिया। एक साहित्यिक मंच मिला, अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों का सान्निध्य मिला, नवोदित रचनाकारों की आत्मीय मित्रता मिली, बच्चों की नई दृष्टि से साहित्य को देखने का अवसर मिला, प्रकृति को नए रूप में समझने का सौभाग्य मिला और सबसे बढ़कर अपनी मातृभाषा पर गर्व करने का नया आत्मविश्वास मिला।

आज भी जब आंखें बंद करती हूं तो बहुत- से दृश्य एक साथ मन में उतर आते हैं, हल्द्वानी बस अड्डे की वह भागती हुई सुबह, बस की आख़िरी खाली सीट, रास्ते में खराब हुई बस, नई बस आने पर यात्रियों के चेहरों पर लौटी मुस्कान, अल्मोड़ा और सेराघाट की वर्षा बादलों के बीच चलती बस, देवदार के भीगे वन, पहाड़ की ठंडी हवा, आलू के गुटकों, दही और गरमागरम जलेबी का स्वाद, साहित्यकारों का आत्मीय सान्निध्य, बच्चों की निष्पक्ष समीक्षा, अपनी लोकभाषा में गूंजती कविता, जंगल में पक्षियों का मधुर संगीत, मलयनाथ महादेव की दिव्य शांति, हिमालय की हिमाच्छादित चोटियां, और एक साधारण- सी स्वेटर के माध्यम से मिली असाधारण मानवीय संवेदना। इन सब स्मृतियों ने मिलकर मेरे जीवन की ऐसी निधि बना दी है जिसे समय कभी कम नहीं कर सकता।

सच ही कहा गया है, देवभूमि केवल अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण महान नहीं है; उसकी वास्तविक महिमा वहां के लोगों की सरलता, ईमानदारी, आत्मीयता और संवेदनशीलता में बसती है। मैं डीडीहाट से केवल लौटकर नहीं आई, मैं अपने साथ प्रकृति की हरियाली, साहित्य का संस्कार, मानवीय रिश्तों की ऊष्मा और जीवन भर साथ रहने वाली अनमोल स्मृतियां लेकर लौटी। 

यही मेरी डीडीहाट यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे अमूल्य स्मृति है।

स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हरेला पर्व: हिंदी कविता।

जब सावन की पहली आहट,

धरती मां का श्रृंगार बने।

तब देवभूमि के हर आंगन में,

हरेला बनकर प्यार खिले।।


सात अन्न की पावन माटी,

नौ दिन तक स्नेह से सींची जाए।

हर अंकुर में जीवन मुस्काए,

हरियाली का संदेश सुनाए।।


दसवें दिन शुभ घड़ी जो आए,

हरेला श्रद्धा से काटा जाए।

पहले अपने इष्ट को अर्पित हो,

फिर हर माथे पर सजाया जाए।।


बड़ों के शुभ आशीषों से,

जीवन में सुख- समृद्धि आए।

दीर्घायु, यश, वैभव और मंगल,

हर परिवार का भाग्य जगाए।।


रसोई में पकवान महकें,

घर- आंगन उत्सव बन जाए।

बेटी, बंधु, सखा, पड़ोसी,

सबमें प्रेम का प्रसाद बंट जाए।।


हरेला केवल पर्व नहीं,

यह प्रकृति का अभिनंदन है।

धरती, जल, वन और जीवन का,

सदियों पुराना वंदन है।।

आओ आज यह प्रण दोहराएं,

हर वर्ष एक पौधा लगाएं।

हरी- भरी हो अपनी धरती,

आने वाली पीढ़ियां मुस्काए।।


स्वरचित : मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

16/07/2026

मंगलवार, 2 जून 2026

दो जून की रोटी: हिंदी कविता।

बड़ी कठिनाई से मिलती है,

दो जून की रोटी।

अक्सर सुनने में आती है,

यह जीवन की सच्ची बात अनूठी।।


आज स्टेटस में देखा मैंने,

सबने यह संदेश लगाया था।

दो जून की रोटी लिख- लिख कर,

अपना भाव बतलाया था।।


तब मन में जिज्ञासा जागी,

क्या इसका मर्म सभी ने जाना है?

क्या केवल दो जून तिथि भर है,

या कोई गूढ़ खज़ाना है?


जब अर्थों की राह चली,

ज्ञान- द्वार पर पहुंची मैं।

तब खुला रहस्य इस मुहावरे का,

मिट गई मन की सारी दुविधा क्षण में।।


तब ज्ञात हुआ यह तिथि नहीं है,

न महीने का कोई संकेत।

दिन के दो बेला के भोजन का,

इसमें छिपा हुआ है हेत।।


दो जून की रोटी का मतलब,

दो समय भोजन पा जाना।

इतना श्रम और इतनी आय,

कि भूखा न सोये कहीं जमाना।।


पर इसका अर्थ रोटी भर नहीं,

इसमें संघर्षों का इतिहास छिपा है।

मजदूरों के श्रम- बिंदु में,

जीवन का विश्वास छिपा है।।


हर पसीने की बूंद कहती,

परिश्रम ही है पहचान हमारी।

कर्मभूमि पर हम डटे हुए हैं,

यहीं है जगत की सच्ची क्यारी।।


किसी के लिए यह सामान्य आवश्यकता,

किसी के लिए जीवन का स्वप्न महान।

कितने हाथ निरंतर श्रम करते,

तब मिलता है अन्न का सम्मान।।


इस छोटे से मुहावरे में,

जीवन- दर्शन गहरा बसता।

रोटी के प्रत्येक कण में,

मानव- श्रम का गौरव खिलता।।


तब समझ सकी मैं यह कारण,

क्यों कहते हैं सब दिन- राती।

बड़ी कठिनाई से मिलती है,

दो जून की रोटी।।


स्वरचित- मंजू बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सोमवार, 25 मई 2026

दश्यार: आलेख- कुमाऊनी भाषा।

गंगा दशहरा (दश्यार) जेठक महैण शुक्ल पक्ष दशमी दिन मणै जांछ। दश्यार पर्व मां गंगा नदीक धरती में औणक दिनक रूप में मणै जांछ। हमरि पहाड़ेकि सांस्कृतिक विरासतों में दश्यार कै पारंपरिक पर्वक रूप मणौनी, पहाड़ में आजक दिन देली लिपण, ऐपण दिण और पुरोहित द्वारा यजमान कै दश्यार पत्र दी बेर दक्षिणा ल्यी कृतार्थ हुनेकि परम्परा प्रचलित छौ, पैलि दिनों में पंडित ज्यू खुद आपणी हाथोंल चित्र उकेर बेर दिन- रात एक कर बेर दश्यार बणौंछी, और आपण हर यजमानक धेलिम जै बेर शुभ आशीष दीछी, आज टैम बदल गौ, बाजार में रेडीमेड दश्यार मिलणईं, लेकिन श्रद्धा भाव आज लै उई छौ, जो बरसों पैली छी।

 गौंफन त आज लै पुराण रीति- रिवाजल दश्यार मणौनी, आजक दिन तीर्थो में नहानैल और दानैल कई गुना सकर पुण्य मिलौं।

आवो हम सब व्हाट्सएपक जरियल एक मुच्छाव जगौणूं दश्यारक यौ पावन पर्व कै धूमधामल मणौंनू। एक बार फिर आपूं सबूं कै दश्यार त्यारकि भौत- भौत बधै।🙏🙏💐💐😊😊

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

बारीश का कहर: कविता।

 बसंत ऋतु जा रही है, और ग्रीष्म ऋतु आ रही है 

किसान के खेत में गेंहू की फसल, सोना बन लहरा रही है।।


गेहूं की हर बाली में, किसान का सपना सज रहा है।

देख- देखकर उसका मन, रोमांचित हो रहा है।।


साल भर की उसकी मेहनत, अब खुशियां लाने वाली हैं।

सपना सजा है उसकी आंखों में, वह पूरी होने वाली हैं।।


आज अचानक! मौसम बदलने से, एक अनहोनी हो गई।

बादल गरजे, बिजली चमकी, और बेमौसम बारसात हो गई।।


शाम ढले, जो गेहूं खड़ा था गर्व से, वो औंधे मुंह लटक रहा है।

काटकर बधां हुआ गेंहू, पानी में पड़ा रो रहा है।।


किसान खड़ा खेत में अपने, उसकी आंखों में बस पानी है।

साल भर की मेहनत बर्बाद देखकर, छाई जीवन में वीरानी है।।


हे बादल! तू क्यों बरसा आज, खुशियां आने वाली थी मेरे द्वार।

छीनी तूने मेरी खुशियां, देख! बेबस है आज मेरा परिवार।।


ना कोई सुनता दर्द किसान का, ना कोई पूछे उसका हाल।

बस चुपचाप वो सहता जाए, कुदरत के जख्म सहता हर साल।।


ये बारिश नहीं कहर है, जो किसान पर टूट पड़ा है।

जो सबको रोटी देता है, वो गेहूं के खेत में उदास खड़ा है।।


कुदरत तेरी मार से, अगर यूं ही अन्नदाता रोएगा।

तो कैसे देश पल्लवित होगा!, और कैसे आगे बढ़ेगा!!


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

मुनिया का सपना - कविता। 43

मेरे घर के सामने बस्ती में रहता था, कालूराम का परिवार।  

'पत्नी भूरी और बेटी मुनिया थे', 'उसके संसार'।।


शिक्षा से, अनभिज्ञ थे दोनों।

मेहनत- मजदूरी, करते थे दोनों।।


बस्ती से कुछ ही बच्चे, स्कूल जाते थे।

बाकी बच्चे डोलते- फिरते, और खेलते रहते थे।।


अपनी सोसाइटी से कपड़े इकट्ठे कर, मैं अक्सर बस्ती में जाती।

महिलाओं और बच्चों को, शिक्षा का महत्व समझाती।।


छोटी- छोटी बच्चियों को, गुड टच- बैड टच का अंतर समझाती।

इसलिए बस्ती की महिलाएं और बच्चियां, टीचर दीदी कहकर बुलाती।।


उन बच्चों में, मुनिया मुझे बेहद प्रिय थी।

क्योंकि उसे, पढ़ने की बड़ी ललक थी।।


मुनिया हमेशा स्कूल जाते, बच्चों को देखती।

काश! "मैं भी स्कूल जाती," वह अक्सर सोचती।।


भूरी से मुनिया कहती, "मां मुझे भी स्कूल जाना है।"

भूरी कहती, "बेटी स्कूल जाकर क्या करना है?"


 "बड़ी होकर तूने, चूल्हा- चौका करना है।"

 "और शादी हो जाने पर, अपना घर संभालना है।।"


मां की बातें सुनकर मुनिया का, कोमल मन टूटता था।

पर स्कूल जाने का, उसका सपना हमेशा जिंदा रहता था।।


मजदूरी से लौटकर शाम को, सभी मजदूर इकट्ठे होते।

कच्ची देशी शराब पीकर, आपस में लड़ते- भिड़ते।।


पड़ोस के गुनेमू चाचा, कालूराम के घर आते- जाते।

मीठी- मीठी बातें करके, अपनापन जताते रहते।।


कभी वो कुरकुरे लाते, कभी टॉफियां लाते।

और आकर मुनिया से, खूब सारा लाड़- लड़ाते।।


एक दिन मुनिया घर में, अकेले ही खेल रही थी।

दुनिया से वो, बिल्कुल ही बेखबर थी।।


रोजाना की भांति, गुनेमू चाचा घर पर आये।

मुनिया को अकेली देख, कुकृत्य के कीड़े कुलबुलाये।।


बोले! चल मुनिया बेटा, तुझे आइसक्रीम खिलाऊंगा।

संग में एक चटपटा सा, कुरकरा भी दिलाऊंगा।।


छुपा हुआ था, धोखा उसकी बातों में।

विकृत मानसिकता छुपाई थी, शांत चेहरे में।।


आइसक्रीम- कुरकुरे दिलाकर, मुनिया को अपने घर ले गया।

गोद में बैठाकर नन्ही मासूम को, वह कुकृत्य को तैयार हुआ।।


गुनेमू चाचा के छूने पर, मुनिया को असहज महसूस हुआ। 

देखते ही देखते गुनेमू चाचा, राक्षस सा प्रतीत हुआ।।


मुनिया को झट से, टीचर दीदी की बात याद आ गई।

गुनेमू चाचा की हरकतें गंदी हैं, यह बात उसके समझ में आ गई।।


“कोई भी छुए, अगर गलत तरीके से।

तो मना करना है, दूर रहना हर हाल में।।”


तभी “अंकल छोड़ो मुझे,” मुनिया चिल्लाई।

मम्मी- पापा बचाओ मुझे, उसने पूरी ताकत से आवाज लगाई।।


सुन मुनिया की आवाज, पास- पड़ोसी दौड़ कर आए।

गुनेमू चाचा की हरकत देखकर, सभी लोग स्तब्ध हुए।।


मुनिया ने रो- रोकर, सारा हाल बताया।

पड़ोसियों ने पुलिस बुलाकर, गुनेमू चाचा को अरेस्ट कराया।।


सुनी खबर कालू- भूरी ने, वो बेतहाशा घर को दौड़े।

कोई अनहोनी ना हो प्रभु, दोनों ने हाथ जोड़े।।


देख मुनिया को भूरी ने, अपने सीने से चिपका लिया।

सकुशल देख बिटिया को, कालू ने प्रभु का धन्यवाद किया।।


कालू- भूरी को मुनिया ने, गनेमू चाचा की सारी करतूत बताई।

टीचर दीदी की बात याद आने पर, खुद को कैसे बचाया बात दोहराई।।


कालू- भूरी अन्य सभी अब, शिक्षा का महत्व समझ गये।

अगले दिन ही मुनिया और अन्य बच्चों को, स्कूल में दाखिला के लिए ले गये।।


मुनिया और बच्चे गये, पहली बार स्कूल के द्वार।

खुल गया सभी बच्चों का, ज्ञान का सुंदर संसार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

गुरुवार, 19 मार्च 2026

मां दुर्गा के नौ रूप नारी का स्वरूप।42

 हिंदू नववर्ष की पहली सुबह, नव आशा का प्रकाश।

मां दुर्गा के चरणों में झुका, हर मन का विश्वास।।


नवरात्रि का स्वागत, शक्ति का संचार।

हर मन हो जागृत, हर सपना हो साकार।।


शंख- घंटों की गूंज में, आस्था का आह्वान।

हर घर- मंदिरों में हो रहा, शक्ति का पावन गान।।


नारी स्वयं है शक्ति, नारी में स्नेह अपार।

मां दुर्गा का स्वरूप, यही जगत का आधार।।


शैलपुत्री सी अडिग है, हर नारी की पहचान।

संघर्षों की राह में, रखती अटल सम्मान।।


ब्रह्मचारिणी सा तप है, उसके हर विचार में।

अपने सपनों को सींचती वह, अपनों के सत्कार में।।


चंद्रघंटा सी निर्भीक, जब अन्याय से लड़े।

अपनी ही शक्ति से, हर भय को दूर करे।।


कूष्मांडा सी सृजन करे, जीवन करे उजियार।

अंधियारे को हराकर, रच दे नया संसार।।


स्कंदमाता सी ममता, आंचल में वो सजाए।

संस्कारों के दीप, घर- परिवार में वो जगाए।।


कात्यायनी सी साहसी, अन्याय को हराती।

रूढ़ियों- बेड़ियों से मुक्त होकर, वह आगे बढ़ती जाती।।


कालरात्रि सी प्रचंड, जब विपदा आए पास।

डरकर नहीं झुकती, बन जाती है प्रकाश।।


महागौरी सी कोमल, मन में प्रेम अपार।

सरलता में बसता है, उसका सच्चा संसार।।


सिद्धिदात्री सा वरदान, हर रूप में समाई।

नारी ही तो शक्ति है, जग ने यह सच्चाई पाई।।


नवरात्रि का यह पर्व, केवल पूजा नहीं मानो।

नारी के सम्मान का, यह सजीव रूप है पहचानो।।


हर घर की दीपशिखा, हर आंगन की शान।

नारी से ही सजे, यह सारा हिंदुस्तान।।


भक्ति में है शक्ति, और शक्ति में नारी।

यही सृष्टि का सत्य, यही जग की फुलवारी।।


आओ मिलकर करें, नारी का सदा सम्मान।

हर नारी में दुर्गा बसी है, मन की आंखों से पहचान।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

रविवार, 15 मार्च 2026

फूलदेई: कविता।41

जब मेरे पहाड़ों में बसंत आता है,

धरती का कण- कण मुस्काता है।

डालियों पर सजे रंग- बिरंगे फूल,

खुशियों की मधुर बहार ले आता है।।


नन्हे-नन्हे हाथों में फूलों की टोकरी लेकर, 

जब बच्चे देहलीज पर आते हैं।

“फूल देई, छम्मा देई” गाते हुए,

हर आंगन को आशीष दे जाते हैं।।


देहलीज पर बिखरे वो नन्हे-नन्हे फूल,

सिर्फ फूल नहीं, स्नेह से भरे अनमोल फूल।

इनमें छिपा रहता है अपनापन और प्यार,

दुआओं की गर्माहट, मेरे पहाड़ का सत्कार।। 


छोटे- छोटे बच्चों की मासूम हंसी में, 

 मेरे पहाड़ की सादगी बसती है।

उनकी चमकती आंखों में, 

नई उम्मीदों की रोशनी दिखती है।।


फूलदेई का यह प्यारा त्योहार,

देहलीज पर बिखेरता खुशियों की बहार।

सिर्फ फूल ही नहीं बरसाता हर द्वार,

दिलों में प्रेम जगाता, रिश्तों में घोलता मिठास अपार।। 


जैसे! मंजू बसंत की नरम हवा, 

थके हुए मन को सहला जाती है।

वैसे ही फूलदेई हर दिल में फिर से, 

खुशियों की कोपलें खिला जाती हैं।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।



शनिवार, 7 मार्च 2026

धूप छाँव के रिश्ते: धारावाहिक।

एपिसोड 3 – “दिल की उलझन”

गांव में सुबह की धूप फैली हुई थी, लेकिन राधिका के दिल में आज भी रात का अंधेरा ही छाया हुआ था।

रात भर वह ठीक से सो नहीं पाई थी।

राघव का फोन न उठाना,

विनय की बातें,

और मन में उठते हजार सवाल!

राधिका ने आंगन में बैठकर चाय का कप हाथ में लिया।

तभी आदित्य उसके पास आकर बैठ गया।

“मा, तुम फिर से उदास लग रही हो।”

बच्चे की बात सुनकर राधिका हल्का मुस्कुराई-

“नहीं बेटा, बस थोड़ा सिर दर्द है।”

आदित्य ने मासूमियत से कहा-

“मां, अगर पापा हमें छोड़कर चले गए तो?”

यह सवाल राधिका के दिल में तीर की तरह लगा।

वह कुछ देर चुप रही।

फिर बेटे का हाथ पकड़कर बोली-

“ऐसा कभी मत सोचना।”

लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।

उस दिन गांव में हाट लगा था।

राधिका कुछ सब्जियाँ खरीदने हाट की तरफ चली गई।

वहां उसकी मुलाकात कमला दादी से हुई।

कमला दादी ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

“बहू, तू बहुत परेशान लग रही है।”

राधिका ने झूठी मुस्कान दी-

“नहीं दादी, मैं ठीक हूं।”

दादी ने धीरे से कहा-

“सच छिपाने की कोशिश मत कर। दर्द अंदर ही अंदर बढ़ जाता है।”

राधिका चुप रही।

उसी समय उसे दूर से वही अजनबी आदमी विनय दिखा।

विनय उसके पास आया।

“मैंने सोचा था कि आप मुझसे फिर बात करेंगी।”

राधिका ने कहा-

“मैं क्या पूछूं?”

विनय कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला-

“रोहित पर लगा आरोप बहुत गंभीर है। अगर सच सामने आया तो उनका नौकरी से जाना तय है।”

राधिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“लेकिन ! राघव ऐसा नहीं कर सकते,” उसने धीरे से कहा।

विनय ने गहरी नजर से उसकी तरफ देखा —

“कभी-कभी हम जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं… वही हमें सबसे ज्यादा चोट देते हैं।”

यह सुनकर राधिका की आंखें भर आईं।

वह बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

घर पहुंचकर उसने दरवाजा बंद कर लिया।

उसके हाथ काँप रहे थे।

वह सोचने लगी-

क्या राघव सच में कुछ छिपा रहे हैं?

अगर राघव दोषी निकले तो?

आदित्य का क्या होगा?

उसका अपना भविष्य क्या होगा?

शाम होने लगी थी।

गाँव की पहाड़ी के पीछे सूरज छिप रहा था।

तभी अचानक घर के बाहर एक गाड़ी रुकी।

राधिका बाहर आई।...

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स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट,

 गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

धूप भी अपनी छांव भी अपनी: धारावाहिक।

 एपिसोड 2- अजनबी से मुलाकात।

सुबह गांव में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। पहाड़ों पर बादलों का झुंड ऐसे घूम रहा था जैसे किसी ने आसमान पर सफेद रुई बिखेर दी हो।
राधिका आज जल्दी उठ गई थी।
रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी।
बार-बार उसे गांव में आए उस अजनबी आदमी का चेहरा याद आ रहा था, उसे लग रहा था उसने उसे कहीं तो देखा है, लेकिन कहां देखा है यह याद नहीं आ रहा था।
उसकी अजनबी  की आंखों कौन देखकर लग रहा था कि, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो।
राधिका ने तुलसी के पौधे को पानी दिया और मन ही मन बोली - “पता नहीं, ये दिल इतना बेचैन  क्यों है।”
इतने में आदित्य स्कूल जाने के लिए तैयार होकर आ गया।
“मां, आज स्कूल में स्पोर्ट्स प्रैक्टिस है।”
राधिका मुस्कुराई और बोली- "ध्यान से खेलना और ज्यादा थकना मत।”
आदित्य ने मां का हाथ पकड़कर कहा- "मां, तुम तुम चिंता मत करो आपका बेटा बहुत होशियार जो है।”
बच्चे की बात सुनकर राधिका के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल गई। और अचानक उसकी आंखें नम हो गई, फिर  जबरदस्ती हंसते हुए कहने लगी आज आदित्य को स्कूल तक मम्मी छोड़ कर आयेगी,, "क्यों! चलें",,क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी आंखों की नमी बेटे को दिखाई दे।
आदित्य झट से बोला, "नहीं मम्मी वो देखो सामने तो स्कूल का गेट है मैं चला जाऊंगा।" और वह स्कूल बच्चों के साथ चला गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
आराधना रसोई में काम करने लगी, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।
दोपहर के करीब गांव के मुखिया का आदमी उसके घर आया।
“बहू, मुखिया जी ने आपको पंचायत घर बुलाया है।”
राधिका हैरान थी-
“मुझे क्यों?”
आदमी ने कहा —
“वह अजनबी आदमी जो सरकारी दफ्तर से आया है आपसे बात करना चाहता है।”
राधिका का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह अपने आंचल को ठीक करती हुई पंचायत घर की तरफ चल दी।
गांव की पगडंडी पर चलते हुए उसे राघव  के साथ बिताए हुए सारी बातें याद आने लगीं।
कैसे वह  पहली बार दुल्हन बनकर इस गांव में आई थी,
राघव के साथ उसने कई सपने देखे थे, जिससे उसकी जिंदगी खुशियों से भर जाएगी।
लेकिन समय ने जैसे सब कुछ बदल दिया।
पंचायत घर के बाहर वही अजनबी आदमी खड़ा था।
जैसे ही राधिका वहां पहुंची, वह आदमी उसकी तरफ बढ़ा।
“आप राधिका हैं?”
राधिका ने धीरे से कहा-
“जी! आप कौन हैं?”
आदमी ने गहरी सांस ली और बोला-
“मेरा नाम विनय है। मैं शहर से आया हूँ।”
राधिका चुप रही।
विनय ने आगे कहा —
“मैं राघव के ऑफिस का दोस्त हूं।”
राघव का नाम सुनते ही राधिका का दिल जैसे रुक गया।
“राघव, कैसे हैं वह?” उसने धीरे से पूछा।
विनय की आंखों में एक अजीब सा दर्द आ गया।
“यही बात करने आया हूं। रोहित पिछले तीन महीनों से परेशान हैं।”
राधिका चौंक गई-
“परेशान? किस बात से?”
विनय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला-
“रोहित पर ऑफिस में धोखाधड़ी का आरोप लगा है।”
राधिका को लगा जैसे जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
“यह, आप क्या कह रहे हैं?”
विनय ने फाइल निकालकर दिखाई।
“मैंने सोचा आपको सच पता होना चाहिए।”
राधिका की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।
राघव!
जिस पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसका अपना जीवन साथी जब वह मुसीबत में है तो उसने  राधिका को क्यों नहीं बताया, क्या वह सच में किसी मुसीबत में था?
या फिर यह भी कोई नया रहस्य था?
विनय ने धीरे से कहा-
“रोहित आपसे कुछ छिपा रहे हैं।”
राधिका कुछ बोल नहीं पाई।
उसका मन हजार सवालों से भर गया।
क्या रोहित का बदलता व्यवहार इसी वजह से था?
कि वह किसी बड़ी परेशानी में है?
या फिर कुछ और ही सच छिपा था?
सूरज ढलने लगा था।
गांव के ऊपर लालिमा फैल गई थी।
राधिका ने विनय से कहा, मैं हर मुसीबत में अपने पति के साथ खड़ी हूं। उन्होंने मुझे कुछ भी बताने के काबिल नहीं समझा।
उनसे कहना आप चिंता ना करें, सब ठीक हो जाएगा। और फिर राधिका घर लौट आई। और राघव को काॅल करने लगी और साथ ही घर के आंगन में बैठकर आदित्य का इंतज़ार करने लगी, राघव ने काॅल नहीं उठाया।
कुछ देर बाद आदित्य स्कूल से लौट आया।
उसने मां को उदास देखा तो पूछा-
“मां, क्या हुआ?”
राधिका मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली-
“कुछ नहीं बेटा।”
लेकिन आदित्य समझ गया कि मां कुछ छिपा रही है।
रात को राधिका ने फिर राघव को काॅल लगाया,
कॉल बजता रहा,
लेकिन राघव ने फोन नहीं उठाया। अब राधिका का सब्र का बांध टूट चुका था
राधिका की आंखों में झरझर आंसू बहने लगे। और फिर वह मुंह में कपड़ा ठूंस कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। की घंटे रोने के बाद वह लाचार आंखों से मोबाइल देखने लगी। लेकिन राघव का कोई काॅल नहीं आया। थक-हारकर वह खिड़की के पास बैठ गयी। और खिड़की के बाहर देखने लगी।
आसमान में चांद निकल आया था।
चांद की रोशनी गांव के घरों की छतों पर चुपचाप फैल रही थी।
राधिका ने मन ही मन कहा-
“सच चाहे कितना भी दर्दनाक हो, अब मुझे सच को जानना ही होगा, राघव आखिर क्यों बदल गया, वह कसूरवार है या बेगुनाह, जो भी हो, एक पत्नी होने के नाते इस समय उसका पहला फर्ज है अपने पति के साथ खड़े रहना और उसका साथ देना।”
उसी रात शहर में,
राघव किसी अंधेरे कमरे में बैठा था।
उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।
सामने टेबल पर कई फाइलें पड़ी थीं।
और उसके फोन की स्क्रीन पर राधिका का नाम चमक रहा था।
लेकिन वह फोन उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
क्योंकि सच बहुत भारी था,
और वह अच्छी तरह से जानता था, आने वाले दिनों में यह सच उसके सारे परिवार की जिंदगी को बदल सकता है। और टेंशन में उसने जाने कितनी सिगरेट पी ली, उसे पता ही नहीं था, और वह फिर नई सिगरेट निकालने लगा।
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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


शुक्रवार, 6 मार्च 2026

धूप छाँव के रिश्ते- धारावाहिक।

एपिसोड 2- अजनबी से मुलाकात।


सुबह गांव में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। पहाड़ों पर बादलों का झुंड ऐसे घूम रहा था जैसे किसी ने आसमान पर सफेद रुई बिखेर दी हो।
राधिका आज जल्दी उठ गई थी।
रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी।
बार-बार उसे गांव में आए उस अजनबी आदमी का चेहरा याद आ रहा था, उसे लग रहा था उसने उसे कहीं तो देखा है, लेकिन कहां देखा है यह याद नहीं आ रहा था।
उसकी अजनवी  की आंखों कौन देखकर लग रहा था कि, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो।
राधिका ने तुलसी के पौधे को पानी दिया और मन ही मन बोली - “पता नहीं, ये दिल इतना बेचैन  क्यों है।”
इतने में देवांश स्कूल जाने के लिए तैयार होकर आ गया।
“मां, आज स्कूल में स्पोर्ट्स प्रैक्टिस है।”
राधिका मुस्कुराई और बोली- "ध्यान से खेलना और ज्यादा थकना मत।”
आदित्य ने मां का हाथ पकड़कर कहा- "मां, तुम तुम चिंता मत करो आपका बेटा बहुत होशियार जो है।”
बच्चे की बात सुनकर राधिका के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल गई। और अचानक उसकी आंखें नम हो गई, फिर  जबरदस्ती हंसते हुए कहने लगी आज देवांश को स्कूल तक मम्मी छोड़ कर आयेगी,, "क्यों! चलें",,क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी आंखों की नमी बेटे को दिखाई दे।
देवांश झट से बोला, "नहीं मम्मी वो देखो सामने तो स्कूल का गेट है मैं चला जाऊंगा।" और वह स्कूल बच्चों के साथ चला गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
आराधना रसोई में काम करने लगी, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।
दोपहर के करीब गांव के मुखिया का आदमी उसके घर आया।
“बहू, मुखिया जी ने आपको पंचायत घर बुलाया है।”
राधिका हैरान थी-
“मुझे क्यों?”
आदमी ने कहा —
“वह अजनबी आदमी जो सरकारी दफ्तर से आया है आपसे बात करना चाहता है।”
राधिका का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह अपने आंचल को ठीक करती हुई पंचायत घर की तरफ चल दी।
गांव की पगडंडी पर चलते हुए उसे राघव  के साथ बिताए हुए सारी बातें याद आने लगीं।
कैसे वह  पहली बार दुल्हन बनकर इस गांव में आई थी,
राघव के साथ उसने कई सपने देखे थे, जिससे उसकी जिंदगी खुशियों से भर जाएगी।
लेकिन समय ने जैसे सब कुछ बदल दिया।
पंचायत घर के बाहर वही अजनबी आदमी खड़ा था।
जैसे ही राधिका वहां पहुंची, वह आदमी उसकी तरफ बढ़ा।
“आप राधिका हैं?”
राधिका ने धीरे से कहा-
“जी! आप कौन हैं?”
आदमी ने गहरी सांस ली और बोला-
“मेरा नाम विनय है। मैं शहर से आया हूँ।”
राधिका चुप रही।
विनय ने आगे कहा —
“मैं राघव के ऑफिस का दोस्त हूं।”
राघव का नाम सुनते ही राधिका का दिल जैसे रुक गया।
“राघव, कैसे हैं वह?” उसने धीरे से पूछा।
विनय की आँखों में एक अजीब सा दर्द आ गया।
“यही बात करने आया हूँ। रोहित पिछले तीन महीनों से परेशान हैं।”
राधिका चौंक गई-
“परेशान? किस बात से?”
विनय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला-
“रोहित पर ऑफिस में धोखाधड़ी का आरोप लगा है।”
राधिका को लगा जैसे जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
“यह, आप क्या कह रहे हैं?”
विनय ने फाइल निकालकर दिखाई।
“मैंने सोचा आपको सच पता होना चाहिए।”
राधिका की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।
राघव!
जिस पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसका अपना जीवन साथी जब वह मुसीबत में है तो उसने  राधिका को क्यों नहीं बताया, क्या वह सच में किसी मुसीबत में था?
या फिर यह भी कोई नया रहस्य था?
विनय ने धीरे से कहा-
“रोहित आपसे कुछ छिपा रहे हैं।”
राधिका कुछ बोल नहीं पाई।
उसका मन हजार सवालों से भर गया।
क्या रोहित का बदलता व्यवहार इसी वजह से था?
कि वह किसी बड़ी परेशानी में है?
या फिर कुछ और ही सच छिपा था?
सूरज ढलने लगा था।
गांव के ऊपर लालिमा फैल गई थी।
राधिका ने विनय से कहा, मैं हर मुसीबत में अपने पति के साथ खड़ी हूं। उन्होंने मुझे कुछ भी बताने के काबिल नहीं समझा।
उनसे कहना आप चिंता ना करें, सब ठीक हो जाएगा। और फिर राधिका घर लौट आई। और राघव को काॅल करने लगी और साथ ही घर के आंगन में बैठकर देवांश का इंतज़ार करने लगी‌, राघव ने काॅल नहीं उठाया।
कुछ देर बाद देवांश स्कूल से लौट आया।
उसने मां को उदास देखा तो पूछा-
“मां, क्या हुआ?”
राधिका मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली-
“कुछ नहीं बेटा।”
लेकिन देवांश समझ गया कि मां कुछ छिपा रही है।
रात को राधिका ने फिर राघव को काॅल लगाया,
कॉल बजता रहा,
लेकिन राघव ने फोन नहीं उठाया। अब राधिका का सब्र का बांध टूट चुका था
राधिका की आंखों में झरझर आंसू बहने लगे। और फिर वह मुंह में कपड़ा ठूंस कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। की घंटे रोने के बाद वह लाचार आंखों से मोबाइल देखने लगी। लेकिन राघव का कोई काॅल नहीं आया। थक-हारकर वह खिड़की के पास बैठ गयी। और खिड़की के बाहर देखने लगी।
आसमान में चांद निकल आया था।
चांद की रोशनी गांव के घरों की छतों पर चुपचाप फैल रही थी।
राधिका ने मन ही मन कहा-
“सच चाहे कितना भी दर्दनाक हो, अब मुझे सच को जानना ही होगा, राघव आखिर क्यों बदल गया, वह कसूरवार है या बेगुनाह, जो भी हो, एक पत्नी होने के नाते इस समय उसका पहला फर्ज है अपने पति के साथ खड़े रहना और उसका साथ देना।”
उसी रात शहर में,
राघव किसी अंधेरे कमरे में बैठा था।
उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।
सामने टेबल पर कई फाइलें पड़ी थीं।
और उसके फोन की स्क्रीन पर राधिका का नाम चमक रहा था।
लेकिन वह फोन उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
क्योंकि सच बहुत भारी था,
और वह अच्छी तरह से जानता था, आने वाले दिनों में यह सच उसके सारे परिवार की जिंदगी को बदल सकता है। और टेंशन में उसने जाने कितनी सिगरेट पी ली, उसे पता ही नहीं था, और वह फिर नई सिगरेट निकालने लगा।
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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।






हमारी जीवन यात्रा।- कविता।40

7 मार्च 2000 को उत्तराखंड की धरती पर, हमारा गठबंधन हो गया।

प्रेम और विश्वास भरे धागों से, जीवन का नया आंगन सज गया।।


पतिदेव, दुख- सुख की हर डगर पर, हमने हाथ थामकर चलना सीखा।

धैर्य, विश्वास और अपनापन से, जीवन को समझना सीखा।।


जब दुख के बादल गहराए, मन थोड़ा घबराया भी था।

पर आपने बेहद स्नेह से मुझे, गृहस्थ जीवन समझाया था।।


आज हमारे जीवन में, सबसे प्यारी खुशी हमारा बेटा है।

उसकी मुस्कान से घर- आंगन का, हर कोना प्रेम से महकता है।।


पतिदेव, मेरे शब्दों की उड़ान में, आपका स्नेह भरा आकाश मिलता है।

मेरे सपनों का हर दीप, आपके प्रेम से ही जलता- खिलता है।।


जो भी मैं लिख पाती हूं, उसमें आपका मार्सागदर्शन होता है।

मेरे हर संकल्प में आपका साथ, जीवन का सच्चा मोती होता है।।


आपको सालगिरह की, हार्दिक मंगलकामनाएं बार- बार।

ईश्वर करे हमारे जीवन में बना रहे, सदा प्रेम, शांति और प्यार।।


धन की चमक जीवन में, भले ही बहुत अधिक न आ पाए।

पतिदेव, प्रेम, सुख और संतोष से, हमारा छोटा संसार भर जाए।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

धूप भी अपनी, छांव भी अपनी। हिंदी धारावाहिक।

 एपिसोड 1- गांव की हवा में बसी खूशबू।

सुबह की हल्की- हल्की धूप पहाड़ों के पीछे से झांक रही थी। गांव की पगडंडी पर ओस की बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे धरती ने रात भर आसमान के आंसू समेट कर रखे हों।
कुनकुनी हवा में पहाड़ी फूलों की खुशबू घुली हुई थी। दूर कहीं से मंदिर की घंटी की आवाज आ रही थी और साथ ही सुनाई दे रहा था मुर्गों का बांग देना।
इसी गांव का नाम था- सूपी गांव।
सूपी गांव छोटा जरूर था, लेकिन यहां के लोगों के दिल बहुत बड़े थे। हर कोई एक-दूसरे के सुख- दुख में शामिल रहता था।
गांव के बीचों- बीच एक पुराना लेकिन सुंदर साफ सुथरा घर था। उसी घर के आंगन में खड़ी थी राधिका, उसकी उम्र बत्तीस साल है, उसने नयन- नक्श बेहद सुंदर हैं, गेरूआ कलर है, लंबे काले बाल हैं, स्वभाव से बेहद सरल और शांत है, उसे देखते ही लगता है कि वह अपनी  सजल आंखों में एक अनजाना सा दर्द छिपाए हुए है।
राधिका सुबह जल्दी उठना पसंद करती थी। प्रातः कालीन बेला में उठकर सर्व प्रथम वह घर में झाड़ू लगाती, गोशाला साफ करती, दूध दूहती, गाय को चारा देती थी, फिर नहा- धोकर सूर्य देव को अर्घ्य देती और तुलसी मां के सामने नियमित दीपक जलाती,  तत्पश्चात बेटे को उठाकर फिर वह नाश्ता बनाने रसोई में चली जाती।
आज भी  सुबह- सुबह नाश्ता बनाकर रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि आवाज आई- “मां मुझे स्कूल जाने में देर हो रही है।”
यह आवाज थी उसके दस साल के बेटे आदित्य की।
राधिका मुस्कुराई।
“अरे वाह आज तो बहुत जल्दी तैयार हो गया मेरा राजा बेटा। दो मिनट रुको बेटा, तुम्हारा टिफिन ला रही हूं।”
आदित्य बहुत समझदार और शांत बच्चा था। वह अपनी उम्र से ज्यादा होशियार और गंभीर था। कभी-कभी राधिका को लगता था कि उसके  बच्चे की आंखों में भी कुछ अनकहा दर्द बसता है।
राधिका ने टिफिन बैग में रखा और आदित्य का माथा चूम लिया। तब तक पास पड़ोस के बच्चे भी आ चुके थे, राधिका ने आदित्य से कहा, "मैं स्कूल तक छोड़ दूं क्या?" 

आदित्य कहने लगा, "मम्मी दो कदम पर तो स्कूल है, आप चिंता मत करो, मैं भईया लोगों के साथ चला जाऊंगा,"

राधिका मुस्कुराते हुए बोली, "अच्छा बाबा ठीक है, मन लगाकर पढ़ना और किसी से लड़ाई मत करना।”
"अच्छा मां" कहकर आदित्य बच्चों के साथ स्कूल के लिए निकल गया। स्कूल घर के पास में ही था। इसलिए देवांश अन्य बच्चों के साथ स्कूल चला जाता था।
घर में अब राधिका अकेली रह गई थी।
उसका घर, जो कभी खुशियों से भरा रहता था, अब सिर्फ यादों की आवाजें लिए खड़ा था।
राधिका की शादी ग्यारह साल पहले गांव के ही एक युवक राघव से हुई थी। राघव शहर में काम करता था। शुरू के कुछ साल सब ठीक रहे, लेकिन धीरे-धीरे रिश्ते में दूरी आने लगी।
राघव कई- कई महीने में घर आता था।
राघव राधिका से पहले बहुत प्यार करता था, लेकिन धीरे-धीरे उसने राधिका से बात करना कम कर दिया, अब तो ज्यातातर चुप ही रहता था, इधर कई महीनों से उन दोनों के बीच में हां- ना के सिवा कोई और बात नहीं हुई थी।


बच्चे पर कोई गलत असर ना पड़े, इसलिए वह राघव से कुछ नहीं कहती थी, लेकिन राघव का धीरे-धीरे बदलता व्यवहार देखकर राधिका अंदर से टूटने  लगी थी, अब अकेलापन धीरे-धीरे उसके दिल में घर करता चला जा रहा था।
आज भी राधिका ने मोबाइल देखा।
उसमें राघव का कोई मैसेज नही था, और नहीं कोई  मिस कॉल पड़ी थी।
उसने हल्की सांस छोड़ी और रसोई की तरफ बढ़ गई।  उसने  उठी रसोई साफ की, बर्तन धोये, कपड़े धोये, पौधों में पानी डाला। वह खुद को घर के काम में व्यस्त रखना चाहती थी, ताकि कोई भी ख्याल उसे कमजोर ना कर सके। घर का सारा काम निपटा कर राधिका ने प्लेट में थोड़ा सा नाश्ता लिया, प्लेट में रखा नाश्ता देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह सिर्फ जीने के लिए खा रही है, और नाश्ता करते समय वह राघव के बदलते व्यवहार के सवाल जवाबों में फिर घिर गई।
राधिका जब भी घर में बाहर निकलती, गांव की औरतें अक्सर कहते हुए मिल जाती थीं-
“राधिका बहू बहुत सहनशील है तू।”
लेकिन किसी को नहीं पता था कि सहनशीलता के पीछे कितना तूफान छिपा है।
आज दोपहर होते- होते गांव के चौक में हलचल बढ़ गई।
आज गांव में पंचायत की बैठक थी।
गांव के मुखिया ने घोषणा की थी कि गांव में एक नई योजना आने वाली है जिससे किसानों की मदद होगी। राधिका को जब यह बात पता चली थी, तब उसने भी सोचा था कि  पंचायत की बैठक में वह भी जायेंगी, किसानों की मदद के लिए जो नई योजना आ रही है उसकी जानकारी वह भी लेगी इसलिए राधिका भी पंचायत में गई।
चौक पर बैठी बूढ़ी दादी कमला देवी ने राधिका का हाथ पकड़ लिया।
“बहू, तू इतनी दुबली क्यों होती जा रही है? ठीक से खाया कर।”
राधिका मुस्कुराई-
“दादी, मैं ठीक हूं।”
कमला देवी ने उसकी आंखों में देखा और धीरे से कहा-
“झूठ मत बोल बहू। आंखें सब सच बता देती हैं।”
राधिका चुप हो गई।
उसी समय दूर से एक गाड़ी गांव में दाखिल हुई।
गाड़ी से उतरा एक आदमी, शहर का लगता था। काला कोट, हाथ में फाइल, और चेहरे पर गंभीरता।
गांव के मुखिया उसके साथ बात करने लगे।
राधिका को पता नहीं क्यों उस आदमी को देखकर अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। मीटिंग में 3- 4 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला, शाम होने को लगी थी,
सूरज पहाड़ों के पीछे छिपने लगा और आसमान नारंगी रंग में रंग गया। तेज कदमों से राधिका घर आई, उसने देखा आदित्य स्कूल से घर पहुंचा ही था। उसने चैन की एक लंबी सांस ली, आदित्य को अपनी बाहों में लेकर उसे लाड़ लड़ाने लगी, आदित्य को अपनी ममता की छांव देते समय उसे याद आया- शादी के शुरुआती दिन,,,,
राघव का प्यार,
उसके साथ गांव की पगडंडियों पर घूमना,
और सपनों की बातें करना।
लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया।
राधिका यादों के  बंधन से बाहर निकली, फिर अपने रोजमर्रा के काम में जुट गई। रात को सारा काम निपटा कर जब वह आदित्य को सुलाने लगी। आदित्य ने राधिका से पूछा-
“मां, क्या पापा हमसे प्यार नहीं करते?”
राधिका का दिल कांप गया।
उसने बेटे को गले लगा लिया-
“ऐसा नहीं बोलते बेटा। पापा बस काम में व्यस्त रहते हैं।”
लेकिन उसके शब्द खुद उसके दिल को ही झूठ लग रहे थे।
रात बहुत शांत थी। लेकिन राधिका के मन के अंदर बहुत शोर हो रहा था।
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।
राधिका खिड़की के पास खड़ी थी।
उसकी आंखों में आंसू नहीं थे,
बस एक गहरा सन्नाटा था।
उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला है जो उसके रिश्तों की सच्चाई सामने लाएगा।
गांव में आया हुआ वह अजनबी आदमी,
और राघव का अचानक बदलता व्यवहार,
इन सबके बीच छिपा था एक रहस्य, जो राधिका की जिंदगी बदलने वाला था।
लेकिन अभी कहानी शुरू हुई है
अभी तो रिश्तों की असली परीक्षा बाकी है।...


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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

होली: रंगों का त्योहार। कविता।39

फाल्गुन के महीने में, हवा बांहें फैलाए जब आती है।

धरती पर रंगों की, चादर सी बिछ जाती है।।


पास और दूर के सभी यार, जाने और अनजाने परिवार।

सब मिलकर मनाते हैं, होली में रंगों का यह खूबसूरत त्योहार।।


होली में, गुलाल के बादल, छाते हैं आसमान में।

मस्ती की लहरें, दौड़ती हैं सबके मनों में।।


ढोलक की थाप पर, डीजे की धुन पर, थिरकते सबके पांव।

खुशियों से भर जाए जीवन, सखी शहर हो या गांव।।


पीले गुलाल में दिखे मुझे, सूरज का मधुर दुलार।

हरे रंग में झलके सखी, धरती का असीम उपकार।।


लाल रंग छूते ही, जागे हृदय में नव-ओज।

रग- रग में रोमांच उठे, सखी मिट जाए हर संकोच।।


होली में, भाभी करती हंसी- ठिठोली, देवर करते शरारत।

बुजुर्ग देते हैं आशीर्वाद तो, घर में आती है बरकत।।


जब ठंडाई की मिठास, होठों पर घुल जाती है।

सखी, पुरानी सारी रंजिशें, दिल से निकल जाती हैं।।


होली में, बच्चों की किलकारियां, गूंजती चहुं दिसाओं ओर।

होली है भाई होली है, मच जाए गली- गली में शोर।।


होली में, एक ही रंग में, रंग जाता है सारा संसार।

भेद- भाव सब मिट जाए, सिर्फ प्रेम बने आधार।।


फागुन आया है सखी, फिर नई उम्मीदें लेकर।

खिलखिला, गले लगे लगा, सभी सखियों को बाहों में भरकर।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

प्रवास में पहाड़। कविता। 38

अक्सर मन की दहलीज़ पर एक सपना दस्तक देता था, हम सब प्रवासी मिलकर एक संसार बसाएं।
इस परदेस की अपरिचित गलियों में, अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू फिर से महकाएं।।

सोचा था ! क्यों न दूर वादियों की स्मृतियों को, दिलों के आंगन में उतार लें।
क्यों न इस अजनबी शहर में, अपना सा एक छोटा उत्तराखंड संवार लें।।

बिखरे चेहरों में अपनापन खोजा, संकोच की दीवारें धीरे-धीरे गिराईं।
उत्रैणी–मक्रैणी के पावन अवसर पर, मिलन की दीप शिखाएं जगमगाईं।।

ढूंढ-ढूंढ कर सबको जोड़ा, स्नेह के धागों में विश्वास पिरोया।
बोली भले अलग-अलग थी, पर हर हृदय ने पहाड़ों का प्रेम संजोया।।

धीरे-धीरे मुस्कानों ने रिश्तों को आकार दिया, विश्वास ने जड़ों को गहरा किया।
एक छोटे से मंच से आरंभ हुआ सफ़र, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में नव इतिहास रच दिया।।

हां, राह में मतभेद भी आए, कुछ क्षणों ने मन को डगमगाया।
पर हमने साहस की ज्योति थामे रखी, हर तूफ़ान को हंसकर अपनाया।।

जीवन ने सिखाया, दुख की छाया में भी सुख का सूरज छिपा होता है।
बस धैर्य से ढूंढो तो, हर अंधेरा उजाले में बदला होता है।।

अब हौसलों के पंख लगाकर, आकाश को छूना है।
दोस्तों का हाथ थामे, साथ-साथ आगे बढ़ना है।।

मंजू, इस परदेस की धरती पर, अपनत्व का दीप जलाना है।
अपने इस मिनी उत्तराखंड को, एक सजीव परिवार बनाना है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।