मंगलवार, 2 जून 2026

दो जून की रोटी: हिंदी कविता।

बड़ी कठिनाई से मिलती है,

दो जून की रोटी।

अक्सर सुनने में आती है,

यह जीवन की सच्ची बात अनूठी।।


आज स्टेटस में देखा मैंने,

सबने यह संदेश लगाया था।

दो जून की रोटी लिख- लिख कर,

अपना भाव बतलाया था।।


तब मन में जिज्ञासा जागी,

क्या इसका मर्म सभी ने जाना है?

क्या केवल दो जून तिथि भर है,

या कोई गूढ़ खज़ाना है?


जब अर्थों की राह चली,

ज्ञान- द्वार पर पहुंची मैं।

तब खुला रहस्य इस मुहावरे का,

मिट गई मन की सारी दुविधा क्षण में।।


तब ज्ञात हुआ यह तिथि नहीं है,

न महीने का कोई संकेत।

दिन के दो बेला के भोजन का,

इसमें छिपा हुआ है हेत।।


दो जून की रोटी का मतलब,

दो समय भोजन पा जाना।

इतना श्रम और इतनी आय,

कि भूखा न सोये कहीं जमाना।।


पर इसका अर्थ रोटी भर नहीं,

इसमें संघर्षों का इतिहास छिपा है।

मजदूरों के श्रम- बिंदु में,

जीवन का विश्वास छिपा है।।


हर पसीने की बूंद कहती,

परिश्रम ही है पहचान हमारी।

कर्मभूमि पर हम डटे हुए हैं,

यहीं है जगत की सच्ची क्यारी।।


किसी के लिए यह सामान्य आवश्यकता,

किसी के लिए जीवन का स्वप्न महान।

कितने हाथ निरंतर श्रम करते,

तब मिलता है अन्न का सम्मान।।


इस छोटे से मुहावरे में,

जीवन- दर्शन गहरा बसता।

रोटी के प्रत्येक कण में,

मानव- श्रम का गौरव खिलता।।


तब समझ सकी मैं यह कारण,

क्यों कहते हैं सब दिन- राती।

बड़ी कठिनाई से मिलती है,

दो जून की रोटी।।


स्वरचित- मंजू बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सोमवार, 25 मई 2026

दश्यार: आलेख- कुमाऊनी भाषा।

गंगा दशहरा (दश्यार) जेठक महैण शुक्ल पक्ष दशमी दिन मणै जांछ। दश्यार पर्व मां गंगा नदीक धरती में औणक दिनक रूप में मणै जांछ। हमरि पहाड़ेकि सांस्कृतिक विरासतों में दश्यार कै पारंपरिक पर्वक रूप मणौनी, पहाड़ में आजक दिन देली लिपण, ऐपण दिण और पुरोहित द्वारा यजमान कै दश्यार पत्र दी बेर दक्षिणा ल्यी कृतार्थ हुनेकि परम्परा प्रचलित छौ, पैलि दिनों में पंडित ज्यू खुद आपणी हाथोंल चित्र उकेर बेर दिन- रात एक कर बेर दश्यार बणौंछी, और आपण हर यजमानक धेलिम जै बेर शुभ आशीष दीछी, आज टैम बदल गौ, बाजार में रेडीमेड दश्यार मिलणईं, लेकिन श्रद्धा भाव आज लै उई छौ, जो बरसों पैली छी।

 गौंफन त आज लै पुराण रीति- रिवाजल दश्यार मणौनी, आजक दिन तीर्थो में नहानैल और दानैल कई गुना सकर पुण्य मिलौं।

आवो हम सब व्हाट्सएपक जरियल एक मुच्छाव जगौणूं दश्यारक यौ पावन पर्व कै धूमधामल मणौंनू। एक बार फिर आपूं सबूं कै दश्यार त्यारकि भौत- भौत बधै।🙏🙏💐💐😊😊

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

बारीश का कहर: कविता।

 बसंत ऋतु जा रही है, और ग्रीष्म ऋतु आ रही है 

किसान के खेत में गेंहू की फसल, सोना बन लहरा रही है।।


गेहूं की हर बाली में, किसान का सपना सज रहा है।

देख- देखकर उसका मन, रोमांचित हो रहा है।।


साल भर की उसकी मेहनत, अब खुशियां लाने वाली हैं।

सपना सजा है उसकी आंखों में, वह पूरी होने वाली हैं।।


आज अचानक! मौसम बदलने से, एक अनहोनी हो गई।

बादल गरजे, बिजली चमकी, और बेमौसम बारसात हो गई।।


शाम ढले, जो गेहूं खड़ा था गर्व से, वो औंधे मुंह लटक रहा है।

काटकर बधां हुआ गेंहू, पानी में पड़ा रो रहा है।।


किसान खड़ा खेत में अपने, उसकी आंखों में बस पानी है।

साल भर की मेहनत बर्बाद देखकर, छाई जीवन में वीरानी है।।


हे बादल! तू क्यों बरसा आज, खुशियां आने वाली थी मेरे द्वार।

छीनी तूने मेरी खुशियां, देख! बेबस है आज मेरा परिवार।।


ना कोई सुनता दर्द किसान का, ना कोई पूछे उसका हाल।

बस चुपचाप वो सहता जाए, कुदरत के जख्म सहता हर साल।।


ये बारिश नहीं कहर है, जो किसान पर टूट पड़ा है।

जो सबको रोटी देता है, वो गेहूं के खेत में उदास खड़ा है।।


कुदरत तेरी मार से, अगर यूं ही अन्नदाता रोएगा।

तो कैसे देश पल्लवित होगा!, और कैसे आगे बढ़ेगा!!


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

मुनिया का सपना - कविता। 43

मेरे घर के सामने बस्ती में रहता था, कालूराम का परिवार।  

'पत्नी भूरी और बेटी मुनिया थे', 'उसके संसार'।।


शिक्षा से, अनभिज्ञ थे दोनों।

मेहनत- मजदूरी, करते थे दोनों।।


बस्ती से कुछ ही बच्चे, स्कूल जाते थे।

बाकी बच्चे डोलते- फिरते, और खेलते रहते थे।।


अपनी सोसाइटी से कपड़े इकट्ठे कर, मैं अक्सर बस्ती में जाती।

महिलाओं और बच्चों को, शिक्षा का महत्व समझाती।।


छोटी- छोटी बच्चियों को, गुड टच- बैड टच का अंतर समझाती।

इसलिए बस्ती की महिलाएं और बच्चियां, टीचर दीदी कहकर बुलाती।।


उन बच्चों में, मुनिया मुझे बेहद प्रिय थी।

क्योंकि उसे, पढ़ने की बड़ी ललक थी।।


मुनिया हमेशा स्कूल जाते, बच्चों को देखती।

काश! "मैं भी स्कूल जाती," वह अक्सर सोचती।।


भूरी से मुनिया कहती, "मां मुझे भी स्कूल जाना है।"

भूरी कहती, "बेटी स्कूल जाकर क्या करना है?"


 "बड़ी होकर तूने, चूल्हा- चौका करना है।"

 "और शादी हो जाने पर, अपना घर संभालना है।।"


मां की बातें सुनकर मुनिया का, कोमल मन टूटता था।

पर स्कूल जाने का, उसका सपना हमेशा जिंदा रहता था।।


मजदूरी से लौटकर शाम को, सभी मजदूर इकट्ठे होते।

कच्ची देशी शराब पीकर, आपस में लड़ते- भिड़ते।।


पड़ोस के गुनेमू चाचा, कालूराम के घर आते- जाते।

मीठी- मीठी बातें करके, अपनापन जताते रहते।।


कभी वो कुरकुरे लाते, कभी टॉफियां लाते।

और आकर मुनिया से, खूब सारा लाड़- लड़ाते।।


एक दिन मुनिया घर में, अकेले ही खेल रही थी।

दुनिया से वो, बिल्कुल ही बेखबर थी।।


रोजाना की भांति, गुनेमू चाचा घर पर आये।

मुनिया को अकेली देख, कुकृत्य के कीड़े कुलबुलाये।।


बोले! चल मुनिया बेटा, तुझे आइसक्रीम खिलाऊंगा।

संग में एक चटपटा सा, कुरकरा भी दिलाऊंगा।।


छुपा हुआ था, धोखा उसकी बातों में।

विकृत मानसिकता छुपाई थी, शांत चेहरे में।।


आइसक्रीम- कुरकुरे दिलाकर, मुनिया को अपने घर ले गया।

गोद में बैठाकर नन्ही मासूम को, वह कुकृत्य को तैयार हुआ।।


गुनेमू चाचा के छूने पर, मुनिया को असहज महसूस हुआ। 

देखते ही देखते गुनेमू चाचा, राक्षस सा प्रतीत हुआ।।


मुनिया को झट से, टीचर दीदी की बात याद आ गई।

गुनेमू चाचा की हरकतें गंदी हैं, यह बात उसके समझ में आ गई।।


“कोई भी छुए, अगर गलत तरीके से।

तो मना करना है, दूर रहना हर हाल में।।”


तभी “अंकल छोड़ो मुझे,” मुनिया चिल्लाई।

मम्मी- पापा बचाओ मुझे, उसने पूरी ताकत से आवाज लगाई।।


सुन मुनिया की आवाज, पास- पड़ोसी दौड़ कर आए।

गुनेमू चाचा की हरकत देखकर, सभी लोग स्तब्ध हुए।।


मुनिया ने रो- रोकर, सारा हाल बताया।

पड़ोसियों ने पुलिस बुलाकर, गुनेमू चाचा को अरेस्ट कराया।।


सुनी खबर कालू- भूरी ने, वो बेतहाशा घर को दौड़े।

कोई अनहोनी ना हो प्रभु, दोनों ने हाथ जोड़े।।


देख मुनिया को भूरी ने, अपने सीने से चिपका लिया।

सकुशल देख बिटिया को, कालू ने प्रभु का धन्यवाद किया।।


कालू- भूरी को मुनिया ने, गनेमू चाचा की सारी करतूत बताई।

टीचर दीदी की बात याद आने पर, खुद को कैसे बचाया बात दोहराई।।


कालू- भूरी अन्य सभी अब, शिक्षा का महत्व समझ गये।

अगले दिन ही मुनिया और अन्य बच्चों को, स्कूल में दाखिला के लिए ले गये।।


मुनिया और बच्चे गये, पहली बार स्कूल के द्वार।

खुल गया सभी बच्चों का, ज्ञान का सुंदर संसार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

गुरुवार, 19 मार्च 2026

मां दुर्गा के नौ रूप नारी का स्वरूप।42

 हिंदू नववर्ष की पहली सुबह, नव आशा का प्रकाश।

मां दुर्गा के चरणों में झुका, हर मन का विश्वास।।


नवरात्रि का स्वागत, शक्ति का संचार।

हर मन हो जागृत, हर सपना हो साकार।।


शंख- घंटों की गूंज में, आस्था का आह्वान।

हर घर- मंदिरों में हो रहा, शक्ति का पावन गान।।


नारी स्वयं है शक्ति, नारी में स्नेह अपार।

मां दुर्गा का स्वरूप, यही जगत का आधार।।


शैलपुत्री सी अडिग है, हर नारी की पहचान।

संघर्षों की राह में, रखती अटल सम्मान।।


ब्रह्मचारिणी सा तप है, उसके हर विचार में।

अपने सपनों को सींचती वह, अपनों के सत्कार में।।


चंद्रघंटा सी निर्भीक, जब अन्याय से लड़े।

अपनी ही शक्ति से, हर भय को दूर करे।।


कूष्मांडा सी सृजन करे, जीवन करे उजियार।

अंधियारे को हराकर, रच दे नया संसार।।


स्कंदमाता सी ममता, आंचल में वो सजाए।

संस्कारों के दीप, घर- परिवार में वो जगाए।।


कात्यायनी सी साहसी, अन्याय को हराती।

रूढ़ियों- बेड़ियों से मुक्त होकर, वह आगे बढ़ती जाती।।


कालरात्रि सी प्रचंड, जब विपदा आए पास।

डरकर नहीं झुकती, बन जाती है प्रकाश।।


महागौरी सी कोमल, मन में प्रेम अपार।

सरलता में बसता है, उसका सच्चा संसार।।


सिद्धिदात्री सा वरदान, हर रूप में समाई।

नारी ही तो शक्ति है, जग ने यह सच्चाई पाई।।


नवरात्रि का यह पर्व, केवल पूजा नहीं मानो।

नारी के सम्मान का, यह सजीव रूप है पहचानो।।


हर घर की दीपशिखा, हर आंगन की शान।

नारी से ही सजे, यह सारा हिंदुस्तान।।


भक्ति में है शक्ति, और शक्ति में नारी।

यही सृष्टि का सत्य, यही जग की फुलवारी।।


आओ मिलकर करें, नारी का सदा सम्मान।

हर नारी में दुर्गा बसी है, मन की आंखों से पहचान।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

रविवार, 15 मार्च 2026

फूलदेई: कविता।41

जब मेरे पहाड़ों में बसंत आता है,

धरती का कण- कण मुस्काता है।

डालियों पर सजे रंग- बिरंगे फूल,

खुशियों की मधुर बहार ले आता है।।


नन्हे-नन्हे हाथों में फूलों की टोकरी लेकर, 

जब बच्चे देहलीज पर आते हैं।

“फूल देई, छम्मा देई” गाते हुए,

हर आंगन को आशीष दे जाते हैं।।


देहलीज पर बिखरे वो नन्हे-नन्हे फूल,

सिर्फ फूल नहीं, स्नेह से भरे अनमोल फूल।

इनमें छिपा रहता है अपनापन और प्यार,

दुआओं की गर्माहट, मेरे पहाड़ का सत्कार।। 


छोटे- छोटे बच्चों की मासूम हंसी में, 

 मेरे पहाड़ की सादगी बसती है।

उनकी चमकती आंखों में, 

नई उम्मीदों की रोशनी दिखती है।।


फूलदेई का यह प्यारा त्योहार,

देहलीज पर बिखेरता खुशियों की बहार।

सिर्फ फूल ही नहीं बरसाता हर द्वार,

दिलों में प्रेम जगाता, रिश्तों में घोलता मिठास अपार।। 


जैसे! मंजू बसंत की नरम हवा, 

थके हुए मन को सहला जाती है।

वैसे ही फूलदेई हर दिल में फिर से, 

खुशियों की कोपलें खिला जाती हैं।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।



शनिवार, 7 मार्च 2026

धूप छाँव के रिश्ते: धारावाहिक।

एपिसोड 3 – “दिल की उलझन”

गांव में सुबह की धूप फैली हुई थी, लेकिन राधिका के दिल में आज भी रात का अंधेरा ही छाया हुआ था।

रात भर वह ठीक से सो नहीं पाई थी।

राघव का फोन न उठाना,

विनय की बातें,

और मन में उठते हजार सवाल!

राधिका ने आंगन में बैठकर चाय का कप हाथ में लिया।

तभी आदित्य उसके पास आकर बैठ गया।

“मा, तुम फिर से उदास लग रही हो।”

बच्चे की बात सुनकर राधिका हल्का मुस्कुराई-

“नहीं बेटा, बस थोड़ा सिर दर्द है।”

आदित्य ने मासूमियत से कहा-

“मां, अगर पापा हमें छोड़कर चले गए तो?”

यह सवाल राधिका के दिल में तीर की तरह लगा।

वह कुछ देर चुप रही।

फिर बेटे का हाथ पकड़कर बोली-

“ऐसा कभी मत सोचना।”

लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।

उस दिन गांव में हाट लगा था।

राधिका कुछ सब्जियाँ खरीदने हाट की तरफ चली गई।

वहां उसकी मुलाकात कमला दादी से हुई।

कमला दादी ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

“बहू, तू बहुत परेशान लग रही है।”

राधिका ने झूठी मुस्कान दी-

“नहीं दादी, मैं ठीक हूं।”

दादी ने धीरे से कहा-

“सच छिपाने की कोशिश मत कर। दर्द अंदर ही अंदर बढ़ जाता है।”

राधिका चुप रही।

उसी समय उसे दूर से वही अजनबी आदमी विनय दिखा।

विनय उसके पास आया।

“मैंने सोचा था कि आप मुझसे फिर बात करेंगी।”

राधिका ने कहा-

“मैं क्या पूछूं?”

विनय कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला-

“रोहित पर लगा आरोप बहुत गंभीर है। अगर सच सामने आया तो उनका नौकरी से जाना तय है।”

राधिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“लेकिन ! राघव ऐसा नहीं कर सकते,” उसने धीरे से कहा।

विनय ने गहरी नजर से उसकी तरफ देखा —

“कभी-कभी हम जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं… वही हमें सबसे ज्यादा चोट देते हैं।”

यह सुनकर राधिका की आंखें भर आईं।

वह बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

घर पहुंचकर उसने दरवाजा बंद कर लिया।

उसके हाथ काँप रहे थे।

वह सोचने लगी-

क्या राघव सच में कुछ छिपा रहे हैं?

अगर राघव दोषी निकले तो?

आदित्य का क्या होगा?

उसका अपना भविष्य क्या होगा?

शाम होने लगी थी।

गाँव की पहाड़ी के पीछे सूरज छिप रहा था।

तभी अचानक घर के बाहर एक गाड़ी रुकी।

राधिका बाहर आई।...

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स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट,

 गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

धूप भी अपनी छांव भी अपनी: धारावाहिक।

 एपिसोड 2- अजनबी से मुलाकात।

सुबह गांव में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। पहाड़ों पर बादलों का झुंड ऐसे घूम रहा था जैसे किसी ने आसमान पर सफेद रुई बिखेर दी हो।
राधिका आज जल्दी उठ गई थी।
रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी।
बार-बार उसे गांव में आए उस अजनबी आदमी का चेहरा याद आ रहा था, उसे लग रहा था उसने उसे कहीं तो देखा है, लेकिन कहां देखा है यह याद नहीं आ रहा था।
उसकी अजनबी  की आंखों कौन देखकर लग रहा था कि, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो।
राधिका ने तुलसी के पौधे को पानी दिया और मन ही मन बोली - “पता नहीं, ये दिल इतना बेचैन  क्यों है।”
इतने में आदित्य स्कूल जाने के लिए तैयार होकर आ गया।
“मां, आज स्कूल में स्पोर्ट्स प्रैक्टिस है।”
राधिका मुस्कुराई और बोली- "ध्यान से खेलना और ज्यादा थकना मत।”
आदित्य ने मां का हाथ पकड़कर कहा- "मां, तुम तुम चिंता मत करो आपका बेटा बहुत होशियार जो है।”
बच्चे की बात सुनकर राधिका के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल गई। और अचानक उसकी आंखें नम हो गई, फिर  जबरदस्ती हंसते हुए कहने लगी आज आदित्य को स्कूल तक मम्मी छोड़ कर आयेगी,, "क्यों! चलें",,क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी आंखों की नमी बेटे को दिखाई दे।
आदित्य झट से बोला, "नहीं मम्मी वो देखो सामने तो स्कूल का गेट है मैं चला जाऊंगा।" और वह स्कूल बच्चों के साथ चला गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
आराधना रसोई में काम करने लगी, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।
दोपहर के करीब गांव के मुखिया का आदमी उसके घर आया।
“बहू, मुखिया जी ने आपको पंचायत घर बुलाया है।”
राधिका हैरान थी-
“मुझे क्यों?”
आदमी ने कहा —
“वह अजनबी आदमी जो सरकारी दफ्तर से आया है आपसे बात करना चाहता है।”
राधिका का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह अपने आंचल को ठीक करती हुई पंचायत घर की तरफ चल दी।
गांव की पगडंडी पर चलते हुए उसे राघव  के साथ बिताए हुए सारी बातें याद आने लगीं।
कैसे वह  पहली बार दुल्हन बनकर इस गांव में आई थी,
राघव के साथ उसने कई सपने देखे थे, जिससे उसकी जिंदगी खुशियों से भर जाएगी।
लेकिन समय ने जैसे सब कुछ बदल दिया।
पंचायत घर के बाहर वही अजनबी आदमी खड़ा था।
जैसे ही राधिका वहां पहुंची, वह आदमी उसकी तरफ बढ़ा।
“आप राधिका हैं?”
राधिका ने धीरे से कहा-
“जी! आप कौन हैं?”
आदमी ने गहरी सांस ली और बोला-
“मेरा नाम विनय है। मैं शहर से आया हूँ।”
राधिका चुप रही।
विनय ने आगे कहा —
“मैं राघव के ऑफिस का दोस्त हूं।”
राघव का नाम सुनते ही राधिका का दिल जैसे रुक गया।
“राघव, कैसे हैं वह?” उसने धीरे से पूछा।
विनय की आंखों में एक अजीब सा दर्द आ गया।
“यही बात करने आया हूं। रोहित पिछले तीन महीनों से परेशान हैं।”
राधिका चौंक गई-
“परेशान? किस बात से?”
विनय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला-
“रोहित पर ऑफिस में धोखाधड़ी का आरोप लगा है।”
राधिका को लगा जैसे जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
“यह, आप क्या कह रहे हैं?”
विनय ने फाइल निकालकर दिखाई।
“मैंने सोचा आपको सच पता होना चाहिए।”
राधिका की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।
राघव!
जिस पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसका अपना जीवन साथी जब वह मुसीबत में है तो उसने  राधिका को क्यों नहीं बताया, क्या वह सच में किसी मुसीबत में था?
या फिर यह भी कोई नया रहस्य था?
विनय ने धीरे से कहा-
“रोहित आपसे कुछ छिपा रहे हैं।”
राधिका कुछ बोल नहीं पाई।
उसका मन हजार सवालों से भर गया।
क्या रोहित का बदलता व्यवहार इसी वजह से था?
कि वह किसी बड़ी परेशानी में है?
या फिर कुछ और ही सच छिपा था?
सूरज ढलने लगा था।
गांव के ऊपर लालिमा फैल गई थी।
राधिका ने विनय से कहा, मैं हर मुसीबत में अपने पति के साथ खड़ी हूं। उन्होंने मुझे कुछ भी बताने के काबिल नहीं समझा।
उनसे कहना आप चिंता ना करें, सब ठीक हो जाएगा। और फिर राधिका घर लौट आई। और राघव को काॅल करने लगी और साथ ही घर के आंगन में बैठकर आदित्य का इंतज़ार करने लगी, राघव ने काॅल नहीं उठाया।
कुछ देर बाद आदित्य स्कूल से लौट आया।
उसने मां को उदास देखा तो पूछा-
“मां, क्या हुआ?”
राधिका मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली-
“कुछ नहीं बेटा।”
लेकिन आदित्य समझ गया कि मां कुछ छिपा रही है।
रात को राधिका ने फिर राघव को काॅल लगाया,
कॉल बजता रहा,
लेकिन राघव ने फोन नहीं उठाया। अब राधिका का सब्र का बांध टूट चुका था
राधिका की आंखों में झरझर आंसू बहने लगे। और फिर वह मुंह में कपड़ा ठूंस कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। की घंटे रोने के बाद वह लाचार आंखों से मोबाइल देखने लगी। लेकिन राघव का कोई काॅल नहीं आया। थक-हारकर वह खिड़की के पास बैठ गयी। और खिड़की के बाहर देखने लगी।
आसमान में चांद निकल आया था।
चांद की रोशनी गांव के घरों की छतों पर चुपचाप फैल रही थी।
राधिका ने मन ही मन कहा-
“सच चाहे कितना भी दर्दनाक हो, अब मुझे सच को जानना ही होगा, राघव आखिर क्यों बदल गया, वह कसूरवार है या बेगुनाह, जो भी हो, एक पत्नी होने के नाते इस समय उसका पहला फर्ज है अपने पति के साथ खड़े रहना और उसका साथ देना।”
उसी रात शहर में,
राघव किसी अंधेरे कमरे में बैठा था।
उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।
सामने टेबल पर कई फाइलें पड़ी थीं।
और उसके फोन की स्क्रीन पर राधिका का नाम चमक रहा था।
लेकिन वह फोन उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
क्योंकि सच बहुत भारी था,
और वह अच्छी तरह से जानता था, आने वाले दिनों में यह सच उसके सारे परिवार की जिंदगी को बदल सकता है। और टेंशन में उसने जाने कितनी सिगरेट पी ली, उसे पता ही नहीं था, और वह फिर नई सिगरेट निकालने लगा।
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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


शुक्रवार, 6 मार्च 2026

धूप छाँव के रिश्ते- धारावाहिक।

एपिसोड 2- अजनबी से मुलाकात।


सुबह गांव में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। पहाड़ों पर बादलों का झुंड ऐसे घूम रहा था जैसे किसी ने आसमान पर सफेद रुई बिखेर दी हो।
राधिका आज जल्दी उठ गई थी।
रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी।
बार-बार उसे गांव में आए उस अजनबी आदमी का चेहरा याद आ रहा था, उसे लग रहा था उसने उसे कहीं तो देखा है, लेकिन कहां देखा है यह याद नहीं आ रहा था।
उसकी अजनवी  की आंखों कौन देखकर लग रहा था कि, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो।
राधिका ने तुलसी के पौधे को पानी दिया और मन ही मन बोली - “पता नहीं, ये दिल इतना बेचैन  क्यों है।”
इतने में देवांश स्कूल जाने के लिए तैयार होकर आ गया।
“मां, आज स्कूल में स्पोर्ट्स प्रैक्टिस है।”
राधिका मुस्कुराई और बोली- "ध्यान से खेलना और ज्यादा थकना मत।”
आदित्य ने मां का हाथ पकड़कर कहा- "मां, तुम तुम चिंता मत करो आपका बेटा बहुत होशियार जो है।”
बच्चे की बात सुनकर राधिका के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल गई। और अचानक उसकी आंखें नम हो गई, फिर  जबरदस्ती हंसते हुए कहने लगी आज देवांश को स्कूल तक मम्मी छोड़ कर आयेगी,, "क्यों! चलें",,क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी आंखों की नमी बेटे को दिखाई दे।
देवांश झट से बोला, "नहीं मम्मी वो देखो सामने तो स्कूल का गेट है मैं चला जाऊंगा।" और वह स्कूल बच्चों के साथ चला गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
आराधना रसोई में काम करने लगी, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।
दोपहर के करीब गांव के मुखिया का आदमी उसके घर आया।
“बहू, मुखिया जी ने आपको पंचायत घर बुलाया है।”
राधिका हैरान थी-
“मुझे क्यों?”
आदमी ने कहा —
“वह अजनबी आदमी जो सरकारी दफ्तर से आया है आपसे बात करना चाहता है।”
राधिका का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह अपने आंचल को ठीक करती हुई पंचायत घर की तरफ चल दी।
गांव की पगडंडी पर चलते हुए उसे राघव  के साथ बिताए हुए सारी बातें याद आने लगीं।
कैसे वह  पहली बार दुल्हन बनकर इस गांव में आई थी,
राघव के साथ उसने कई सपने देखे थे, जिससे उसकी जिंदगी खुशियों से भर जाएगी।
लेकिन समय ने जैसे सब कुछ बदल दिया।
पंचायत घर के बाहर वही अजनबी आदमी खड़ा था।
जैसे ही राधिका वहां पहुंची, वह आदमी उसकी तरफ बढ़ा।
“आप राधिका हैं?”
राधिका ने धीरे से कहा-
“जी! आप कौन हैं?”
आदमी ने गहरी सांस ली और बोला-
“मेरा नाम विनय है। मैं शहर से आया हूँ।”
राधिका चुप रही।
विनय ने आगे कहा —
“मैं राघव के ऑफिस का दोस्त हूं।”
राघव का नाम सुनते ही राधिका का दिल जैसे रुक गया।
“राघव, कैसे हैं वह?” उसने धीरे से पूछा।
विनय की आँखों में एक अजीब सा दर्द आ गया।
“यही बात करने आया हूँ। रोहित पिछले तीन महीनों से परेशान हैं।”
राधिका चौंक गई-
“परेशान? किस बात से?”
विनय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला-
“रोहित पर ऑफिस में धोखाधड़ी का आरोप लगा है।”
राधिका को लगा जैसे जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
“यह, आप क्या कह रहे हैं?”
विनय ने फाइल निकालकर दिखाई।
“मैंने सोचा आपको सच पता होना चाहिए।”
राधिका की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।
राघव!
जिस पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसका अपना जीवन साथी जब वह मुसीबत में है तो उसने  राधिका को क्यों नहीं बताया, क्या वह सच में किसी मुसीबत में था?
या फिर यह भी कोई नया रहस्य था?
विनय ने धीरे से कहा-
“रोहित आपसे कुछ छिपा रहे हैं।”
राधिका कुछ बोल नहीं पाई।
उसका मन हजार सवालों से भर गया।
क्या रोहित का बदलता व्यवहार इसी वजह से था?
कि वह किसी बड़ी परेशानी में है?
या फिर कुछ और ही सच छिपा था?
सूरज ढलने लगा था।
गांव के ऊपर लालिमा फैल गई थी।
राधिका ने विनय से कहा, मैं हर मुसीबत में अपने पति के साथ खड़ी हूं। उन्होंने मुझे कुछ भी बताने के काबिल नहीं समझा।
उनसे कहना आप चिंता ना करें, सब ठीक हो जाएगा। और फिर राधिका घर लौट आई। और राघव को काॅल करने लगी और साथ ही घर के आंगन में बैठकर देवांश का इंतज़ार करने लगी‌, राघव ने काॅल नहीं उठाया।
कुछ देर बाद देवांश स्कूल से लौट आया।
उसने मां को उदास देखा तो पूछा-
“मां, क्या हुआ?”
राधिका मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली-
“कुछ नहीं बेटा।”
लेकिन देवांश समझ गया कि मां कुछ छिपा रही है।
रात को राधिका ने फिर राघव को काॅल लगाया,
कॉल बजता रहा,
लेकिन राघव ने फोन नहीं उठाया। अब राधिका का सब्र का बांध टूट चुका था
राधिका की आंखों में झरझर आंसू बहने लगे। और फिर वह मुंह में कपड़ा ठूंस कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। की घंटे रोने के बाद वह लाचार आंखों से मोबाइल देखने लगी। लेकिन राघव का कोई काॅल नहीं आया। थक-हारकर वह खिड़की के पास बैठ गयी। और खिड़की के बाहर देखने लगी।
आसमान में चांद निकल आया था।
चांद की रोशनी गांव के घरों की छतों पर चुपचाप फैल रही थी।
राधिका ने मन ही मन कहा-
“सच चाहे कितना भी दर्दनाक हो, अब मुझे सच को जानना ही होगा, राघव आखिर क्यों बदल गया, वह कसूरवार है या बेगुनाह, जो भी हो, एक पत्नी होने के नाते इस समय उसका पहला फर्ज है अपने पति के साथ खड़े रहना और उसका साथ देना।”
उसी रात शहर में,
राघव किसी अंधेरे कमरे में बैठा था।
उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।
सामने टेबल पर कई फाइलें पड़ी थीं।
और उसके फोन की स्क्रीन पर राधिका का नाम चमक रहा था।
लेकिन वह फोन उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
क्योंकि सच बहुत भारी था,
और वह अच्छी तरह से जानता था, आने वाले दिनों में यह सच उसके सारे परिवार की जिंदगी को बदल सकता है। और टेंशन में उसने जाने कितनी सिगरेट पी ली, उसे पता ही नहीं था, और वह फिर नई सिगरेट निकालने लगा।
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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।






हमारी जीवन यात्रा।- कविता।40

7 मार्च 2000 को उत्तराखंड की धरती पर, हमारा गठबंधन हो गया।

प्रेम और विश्वास भरे धागों से, जीवन का नया आंगन सज गया।।


पतिदेव, दुख- सुख की हर डगर पर, हमने हाथ थामकर चलना सीखा।

धैर्य, विश्वास और अपनापन से, जीवन को समझना सीखा।।


जब दुख के बादल गहराए, मन थोड़ा घबराया भी था।

पर आपने बेहद स्नेह से मुझे, गृहस्थ जीवन समझाया था।।


आज हमारे जीवन में, सबसे प्यारी खुशी हमारा बेटा है।

उसकी मुस्कान से घर- आंगन का, हर कोना प्रेम से महकता है।।


पतिदेव, मेरे शब्दों की उड़ान में, आपका स्नेह भरा आकाश मिलता है।

मेरे सपनों का हर दीप, आपके प्रेम से ही जलता- खिलता है।।


जो भी मैं लिख पाती हूं, उसमें आपका मार्सागदर्शन होता है।

मेरे हर संकल्प में आपका साथ, जीवन का सच्चा मोती होता है।।


आपको सालगिरह की, हार्दिक मंगलकामनाएं बार- बार।

ईश्वर करे हमारे जीवन में बना रहे, सदा प्रेम, शांति और प्यार।।


धन की चमक जीवन में, भले ही बहुत अधिक न आ पाए।

पतिदेव, प्रेम, सुख और संतोष से, हमारा छोटा संसार भर जाए।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

धूप भी अपनी, छांव भी अपनी। हिंदी धारावाहिक।

 एपिसोड 1- गांव की हवा में बसी खूशबू।

सुबह की हल्की- हल्की धूप पहाड़ों के पीछे से झांक रही थी। गांव की पगडंडी पर ओस की बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे धरती ने रात भर आसमान के आंसू समेट कर रखे हों।
कुनकुनी हवा में पहाड़ी फूलों की खुशबू घुली हुई थी। दूर कहीं से मंदिर की घंटी की आवाज आ रही थी और साथ ही सुनाई दे रहा था मुर्गों का बांग देना।
इसी गांव का नाम था- सूपी गांव।
सूपी गांव छोटा जरूर था, लेकिन यहां के लोगों के दिल बहुत बड़े थे। हर कोई एक-दूसरे के सुख- दुख में शामिल रहता था।
गांव के बीचों- बीच एक पुराना लेकिन सुंदर साफ सुथरा घर था। उसी घर के आंगन में खड़ी थी राधिका, उसकी उम्र बत्तीस साल है, उसने नयन- नक्श बेहद सुंदर हैं, गेरूआ कलर है, लंबे काले बाल हैं, स्वभाव से बेहद सरल और शांत है, उसे देखते ही लगता है कि वह अपनी  सजल आंखों में एक अनजाना सा दर्द छिपाए हुए है।
राधिका सुबह जल्दी उठना पसंद करती थी। प्रातः कालीन बेला में उठकर सर्व प्रथम वह घर में झाड़ू लगाती, गोशाला साफ करती, दूध दूहती, गाय को चारा देती थी, फिर नहा- धोकर सूर्य देव को अर्घ्य देती और तुलसी मां के सामने नियमित दीपक जलाती,  तत्पश्चात बेटे को उठाकर फिर वह नाश्ता बनाने रसोई में चली जाती।
आज भी  सुबह- सुबह नाश्ता बनाकर रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि आवाज आई- “मां मुझे स्कूल जाने में देर हो रही है।”
यह आवाज थी उसके दस साल के बेटे आदित्य की।
राधिका मुस्कुराई।
“अरे वाह आज तो बहुत जल्दी तैयार हो गया मेरा राजा बेटा। दो मिनट रुको बेटा, तुम्हारा टिफिन ला रही हूं।”
आदित्य बहुत समझदार और शांत बच्चा था। वह अपनी उम्र से ज्यादा होशियार और गंभीर था। कभी-कभी राधिका को लगता था कि उसके  बच्चे की आंखों में भी कुछ अनकहा दर्द बसता है।
राधिका ने टिफिन बैग में रखा और आदित्य का माथा चूम लिया। तब तक पास पड़ोस के बच्चे भी आ चुके थे, राधिका ने आदित्य से कहा, "मैं स्कूल तक छोड़ दूं क्या?" 

आदित्य कहने लगा, "मम्मी दो कदम पर तो स्कूल है, आप चिंता मत करो, मैं भईया लोगों के साथ चला जाऊंगा,"

राधिका मुस्कुराते हुए बोली, "अच्छा बाबा ठीक है, मन लगाकर पढ़ना और किसी से लड़ाई मत करना।”
"अच्छा मां" कहकर आदित्य बच्चों के साथ स्कूल के लिए निकल गया। स्कूल घर के पास में ही था। इसलिए देवांश अन्य बच्चों के साथ स्कूल चला जाता था।
घर में अब राधिका अकेली रह गई थी।
उसका घर, जो कभी खुशियों से भरा रहता था, अब सिर्फ यादों की आवाजें लिए खड़ा था।
राधिका की शादी ग्यारह साल पहले गांव के ही एक युवक राघव से हुई थी। राघव शहर में काम करता था। शुरू के कुछ साल सब ठीक रहे, लेकिन धीरे-धीरे रिश्ते में दूरी आने लगी।
राघव कई- कई महीने में घर आता था।
राघव राधिका से पहले बहुत प्यार करता था, लेकिन धीरे-धीरे उसने राधिका से बात करना कम कर दिया, अब तो ज्यातातर चुप ही रहता था, इधर कई महीनों से उन दोनों के बीच में हां- ना के सिवा कोई और बात नहीं हुई थी।


बच्चे पर कोई गलत असर ना पड़े, इसलिए वह राघव से कुछ नहीं कहती थी, लेकिन राघव का धीरे-धीरे बदलता व्यवहार देखकर राधिका अंदर से टूटने  लगी थी, अब अकेलापन धीरे-धीरे उसके दिल में घर करता चला जा रहा था।
आज भी राधिका ने मोबाइल देखा।
उसमें राघव का कोई मैसेज नही था, और नहीं कोई  मिस कॉल पड़ी थी।
उसने हल्की सांस छोड़ी और रसोई की तरफ बढ़ गई।  उसने  उठी रसोई साफ की, बर्तन धोये, कपड़े धोये, पौधों में पानी डाला। वह खुद को घर के काम में व्यस्त रखना चाहती थी, ताकि कोई भी ख्याल उसे कमजोर ना कर सके। घर का सारा काम निपटा कर राधिका ने प्लेट में थोड़ा सा नाश्ता लिया, प्लेट में रखा नाश्ता देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह सिर्फ जीने के लिए खा रही है, और नाश्ता करते समय वह राघव के बदलते व्यवहार के सवाल जवाबों में फिर घिर गई।
राधिका जब भी घर में बाहर निकलती, गांव की औरतें अक्सर कहते हुए मिल जाती थीं-
“राधिका बहू बहुत सहनशील है तू।”
लेकिन किसी को नहीं पता था कि सहनशीलता के पीछे कितना तूफान छिपा है।
आज दोपहर होते- होते गांव के चौक में हलचल बढ़ गई।
आज गांव में पंचायत की बैठक थी।
गांव के मुखिया ने घोषणा की थी कि गांव में एक नई योजना आने वाली है जिससे किसानों की मदद होगी। राधिका को जब यह बात पता चली थी, तब उसने भी सोचा था कि  पंचायत की बैठक में वह भी जायेंगी, किसानों की मदद के लिए जो नई योजना आ रही है उसकी जानकारी वह भी लेगी इसलिए राधिका भी पंचायत में गई।
चौक पर बैठी बूढ़ी दादी कमला देवी ने राधिका का हाथ पकड़ लिया।
“बहू, तू इतनी दुबली क्यों होती जा रही है? ठीक से खाया कर।”
राधिका मुस्कुराई-
“दादी, मैं ठीक हूं।”
कमला देवी ने उसकी आंखों में देखा और धीरे से कहा-
“झूठ मत बोल बहू। आंखें सब सच बता देती हैं।”
राधिका चुप हो गई।
उसी समय दूर से एक गाड़ी गांव में दाखिल हुई।
गाड़ी से उतरा एक आदमी, शहर का लगता था। काला कोट, हाथ में फाइल, और चेहरे पर गंभीरता।
गांव के मुखिया उसके साथ बात करने लगे।
राधिका को पता नहीं क्यों उस आदमी को देखकर अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। मीटिंग में 3- 4 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला, शाम होने को लगी थी,
सूरज पहाड़ों के पीछे छिपने लगा और आसमान नारंगी रंग में रंग गया। तेज कदमों से राधिका घर आई, उसने देखा आदित्य स्कूल से घर पहुंचा ही था। उसने चैन की एक लंबी सांस ली, आदित्य को अपनी बाहों में लेकर उसे लाड़ लड़ाने लगी, आदित्य को अपनी ममता की छांव देते समय उसे याद आया- शादी के शुरुआती दिन,,,,
राघव का प्यार,
उसके साथ गांव की पगडंडियों पर घूमना,
और सपनों की बातें करना।
लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया।
राधिका यादों के  बंधन से बाहर निकली, फिर अपने रोजमर्रा के काम में जुट गई। रात को सारा काम निपटा कर जब वह आदित्य को सुलाने लगी। आदित्य ने राधिका से पूछा-
“मां, क्या पापा हमसे प्यार नहीं करते?”
राधिका का दिल कांप गया।
उसने बेटे को गले लगा लिया-
“ऐसा नहीं बोलते बेटा। पापा बस काम में व्यस्त रहते हैं।”
लेकिन उसके शब्द खुद उसके दिल को ही झूठ लग रहे थे।
रात बहुत शांत थी। लेकिन राधिका के मन के अंदर बहुत शोर हो रहा था।
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।
राधिका खिड़की के पास खड़ी थी।
उसकी आंखों में आंसू नहीं थे,
बस एक गहरा सन्नाटा था।
उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला है जो उसके रिश्तों की सच्चाई सामने लाएगा।
गांव में आया हुआ वह अजनबी आदमी,
और राघव का अचानक बदलता व्यवहार,
इन सबके बीच छिपा था एक रहस्य, जो राधिका की जिंदगी बदलने वाला था।
लेकिन अभी कहानी शुरू हुई है
अभी तो रिश्तों की असली परीक्षा बाकी है।...


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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

होली: रंगों का त्योहार। कविता।39

फाल्गुन के महीने में, हवा बांहें फैलाए जब आती है।

धरती पर रंगों की, चादर सी बिछ जाती है।।


पास और दूर के सभी यार, जाने और अनजाने परिवार।

सब मिलकर मनाते हैं, होली में रंगों का यह खूबसूरत त्योहार।।


होली में, गुलाल के बादल, छाते हैं आसमान में।

मस्ती की लहरें, दौड़ती हैं सबके मनों में।।


ढोलक की थाप पर, डीजे की धुन पर, थिरकते सबके पांव।

खुशियों से भर जाए जीवन, सखी शहर हो या गांव।।


पीले गुलाल में दिखे मुझे, सूरज का मधुर दुलार।

हरे रंग में झलके सखी, धरती का असीम उपकार।।


लाल रंग छूते ही, जागे हृदय में नव-ओज।

रग- रग में रोमांच उठे, सखी मिट जाए हर संकोच।।


होली में, भाभी करती हंसी- ठिठोली, देवर करते शरारत।

बुजुर्ग देते हैं आशीर्वाद तो, घर में आती है बरकत।।


जब ठंडाई की मिठास, होठों पर घुल जाती है।

सखी, पुरानी सारी रंजिशें, दिल से निकल जाती हैं।।


होली में, बच्चों की किलकारियां, गूंजती चहुं दिसाओं ओर।

होली है भाई होली है, मच जाए गली- गली में शोर।।


होली में, एक ही रंग में, रंग जाता है सारा संसार।

भेद- भाव सब मिट जाए, सिर्फ प्रेम बने आधार।।


फागुन आया है सखी, फिर नई उम्मीदें लेकर।

खिलखिला, गले लगे लगा, सभी सखियों को बाहों में भरकर।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

प्रवास में पहाड़। कविता। 38

अक्सर मन की दहलीज़ पर एक सपना दस्तक देता था, हम सब प्रवासी मिलकर एक संसार बसाएं।
इस परदेस की अपरिचित गलियों में, अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू फिर से महकाएं।।

सोचा था ! क्यों न दूर वादियों की स्मृतियों को, दिलों के आंगन में उतार लें।
क्यों न इस अजनबी शहर में, अपना सा एक छोटा उत्तराखंड संवार लें।।

बिखरे चेहरों में अपनापन खोजा, संकोच की दीवारें धीरे-धीरे गिराईं।
उत्रैणी–मक्रैणी के पावन अवसर पर, मिलन की दीप शिखाएं जगमगाईं।।

ढूंढ-ढूंढ कर सबको जोड़ा, स्नेह के धागों में विश्वास पिरोया।
बोली भले अलग-अलग थी, पर हर हृदय ने पहाड़ों का प्रेम संजोया।।

धीरे-धीरे मुस्कानों ने रिश्तों को आकार दिया, विश्वास ने जड़ों को गहरा किया।
एक छोटे से मंच से आरंभ हुआ सफ़र, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में नव इतिहास रच दिया।।

हां, राह में मतभेद भी आए, कुछ क्षणों ने मन को डगमगाया।
पर हमने साहस की ज्योति थामे रखी, हर तूफ़ान को हंसकर अपनाया।।

जीवन ने सिखाया, दुख की छाया में भी सुख का सूरज छिपा होता है।
बस धैर्य से ढूंढो तो, हर अंधेरा उजाले में बदला होता है।।

अब हौसलों के पंख लगाकर, आकाश को छूना है।
दोस्तों का हाथ थामे, साथ-साथ आगे बढ़ना है।।

मंजू, इस परदेस की धरती पर, अपनत्व का दीप जलाना है।
अपने इस मिनी उत्तराखंड को, एक सजीव परिवार बनाना है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

जीवन के रंग कविता।37

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बाग सजाया प्यारा।

मेहनत, लगन और प्रेम से, सींचा उसे दुलारा।।


धीरे-धीरे रंग बिखरने लगी, हरित हथेलियों पर।

फूल मुस्काए जैसे सपने, उतर आए हों धरा पर।।


किसी फूल की खुशबू मन हर लेती, जैसे मधुर कोई गान।

कोई रूप से बाँध लेता, चुपके-चुपके सबका ध्यान।।


कुछ पौधे थे कंटीले, यह भी प्रकृति का है संदेश।

सिर्फ कोमलता ही नहीं, कठोरता भी है परिवेश।


काँटों की गोद में पलते हैं, सबसे सुंदर फूल।

जैसे संघर्षों में निखरता है जीवन का असली उसूल।।


विविध रंगों से सजा यह बाग, जीवन का ही है रूप।

हर स्वभाव, हर रंग यहाँ, है ईश्वर का स्वरूप।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


खूबसूरती के रंग: कविता ।

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बागान बनाया प्यारा।

अपनी मेहनत और लगन से, सींचा, पाला- पोसा न्यारा।।

कुछ ही समय में रंग-बिरंगे फूलों से,

मेरा बागान सजा था।

किसी फूल की खुशबू मन मोहक थी,

तो कोई फूल मन मोह रहा था।।

कुछ पौधे कटीले थे, पर सारे कटीले फूल, बेहद खूबसूरत थे।।

बागान में फूलों की खूबसूरती, सभी को करती थी आकर्षित।

जिसे देख बागान, स्वयं भी होता था हर्षित।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

परदेश में अपना घर। कविता।

 अक्सर मैं भी सोचा करती थी, हम प्रवासी परदेश में मिल-जुलकर रहें।

परदेस में हम अपना, मिनी उत्तराखंड बना कर रहें।।


सबको साथ लाने के लिए, मैंने एक जुगत लगाई।

उत्रैणी- मक्रैणी महोत्सव मनायें, दोस्तों संग प्लानिंग बनाई।।


ढूंढ-ढूंढ कर समझा- बुझाकर, हम सबको एक मंच में लाए।

बोली में अंतर भले ही था, लेकिन सब थे उत्तराखंड से आए।।


धीरे-धीरे सब में प्रेम बढ़ा, प्रेम के साथ विश्वास बढ़ा।

मंच से शुरू हुआ सफर, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में हुआ खड़ा।। 


अक्सर उलझने आती सामने, मतभेद लेकर आते थे बहाने।

सभी मजबूती से खड़े रहे, कभी हार नहीं मानी हमने।।


सीख लिया है अब हमने, जीवन को समझना।

दुख में सुख का रास्ता, कैसे है हमें ढूंढना।।


सखियों के संग मिलकर, सपनों को साकार करना है।

हाथ थामकर एक- दूसरे का, हमें आगे बढ़ते जाना है।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

मेरे प्रेरणा स्रोत व्यक्तित्व: आलेख।

 मेरे आदर्श और प्रेरणास्त्रोत मेरे माता-पिता हैं। मेरा जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में हुआ है। मैं एक किसान की बेटी हूं। जब भी किसी को मैं अपना परिचय देती हूं कि मैं एक किसान की बेटी हूं, तो मुझे स्वयं पर बहुत गर्व होता है।,,,,,,

हम पांच भाई बहन हैं। १९९८ में मेरे पिताजी का देहान्त हो गया था। उसके बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी मेरी माताजी के कंधों में आ गई। मेरी माता जी ने बहुत मेहनत और लगन से हम बच्चों की परवरिश की। और हम बच्चों को कभी भी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।,,,,,
मुझे आज भी याद है, मेरे माता-पिता दोपहर की प्रचंड धूप में भी खेतों में काम करते रहते थे; चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियां क्यों ना हो जाय, मेरे माता-पिता के चेहरे में कभी भी उदासी नजर नहीं आती थी, और नहीं कभी चिड़चिड़ापन दिखाई देता था। मेरे माता-पिता हम भाई-बहनों की शिक्षा का बहुत ध्यान रखते थे। आज से २२-२३ साल पहले गांवों में लड़कियों के लिए १२वी कक्षा से बाद अपनी शिक्षा को जारी रखना बहुत मुश्किल काम था। क्योंकि तब साधन सीमित थे! और महाविद्यालय बहुत दूर थे। मैं पढ़ने में बहुत होशियार थी; तो मेरे माता-पिता ने मेरी पढ़ाई में आने वाली परेशानी को ही दूर कर दिया। वो मेरे लिए एक साइकिल खरीद कर ले लाए, और तब मैं अपने गांव की पहली लड़की थी, जो महाविद्यालय में पढ़ने गईं। मेरे माता-पिता ने मुझे स्नातकोत्तर तक की उच्च शिक्षा प्रदान की।,,,,,,
आज भी गांवों में कई लोग पुरानी विचारधारा के हैं। वो अक्सर अपनी लड़कियों को बहुत सारे कायदों- कानून और नियमों में बांध देते हैं। हमारे माता-पिता ने हम पर कभी भी कोई बंदिशें नहीं थोपी। उन्होंने हमसे कभी नहीं कहा कि तुम एक लड़की हो, तुम ऐसा मत करो, वैसा मत करो। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ।,,,,,
पिताजी के देहांत के बाद भी हमारी माता जी ने हम बहनों को हर कार्य में दक्ष और निपुण बनाया। और हमें स्वाभिमान से जीना सिखाया।,,,,,,,
मेरे माताजी और पिताजी अक्सर कहते थे। "जीवन में हमेशा कर्मप्रधान बनो। कभी भी किसी के बारे में बुरा मत सोचो। अपने हर सपने को पूरा करने की हर संभव कोशिश करो। यदि तन-मन से मेहनत करोगे तो एक दिन सफलता अवश्य ही तुम्हारे कदम चूमेगी"।,,,,
जीवन में आने वाले संघर्षों और चुनौतियों का सामना करना मैंने अपने माता-पिता से ही सीखा है, और उन्हीं के परवरिश और संस्कार की वजह से आज मैं एक सफल और कुशल गृहणी हूं, और अपने परिवार जनों की बेहद प्रिय हूं। साथ ही मैं बच्चों को सिलाई सिखाती हूं। और आज मैं एक आत्म-निर्भर महिला भी हूं। 


स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।


हमूकै बुलौनी पहाड़ा: कुमाऊनी गीत

 सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।२

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।२


भीमताला, सात ताला, और नौंकुची ताला,

ताल मा बतख तैरणी, और तैरणी नौका।

हिसालू, किल्माड़, खुमानि क, कैसि छै रे बहारा।।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा...ओ बैंणां।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा, कै भल छाजिरौ पहाड़ा।।


सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


नैनीताले की नैना देवी, हरिद्वारे की गंगा,

अल्मोड़ा का चितई- गोलू, धारी की मैया।

छाया- दाया सबैं देवों की, हमेरी पहाड़ा।।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा...ओ बैंणां।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा, म्येंरो सजीलो पहाड़ा।।


सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


बद्रीनाथा, केदारनाथा, और अमरनाथा,

संत, देवी, देव रौनी, धन्य हमर भागा।

चारों धामा घुमि औंनूं, टेकि औंनूं माथा।। 

गंगोत्री, यमुनोत्री...ओ बैणा।

गंगोत्री, यमुनोत्री, की डुबकी करेली उद्धारा।।


सुंण लै, सूणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट;

गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी: (हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड)।

सर्वाधिकार सुरक्षित।



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

उद्देश्य: कुमाऊनी कविता। -१३

आपणी  संस्कृति कै आघिन पीढ़ी तक पहुचौंण में, 

मैं आपणी योगदान द्यूं, बस म्यर यई उद्देश्य छू,


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

बाग: कविता। - 35

 बागान बनाना आसान नहीं होता,

रंग-बिरंगे फूलों का संगम लाना पड़ता है।

पल्लवित करने में है जद्दोजहद करनी,

हर कदम पर झंझावातों का सामना करना पड़ता है।।


लेकिन जब फूल खिलते हैं बागान में,

सारे झंझावात भूल जाता है माली।

हर पौधे की अपनी है एक कहानी सुहानी,

कोई पौधा सेवा मांगे, कोई पौधा खुश होता देख हवा- पानी।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।