Thursday, 29 January 2026

कान्हा: हिंदी कविता।

कान्हा तेरी लगन लगी, मैं रोई- रोई जाऊं।

वह राह बता दे इसमें चलकर, मैं तुझको पा जाऊं।।

मंदिर- मंदिर तुझको ढूंढूं, कहीं ना तुझको पाऊं।

तेरी सेवा करके कान्हा, मैं अपने मन को बहलाऊं।।


जानती हूं मैं भी कान्हा, मेरे मन मंदिर में तू बैठा है।

लेकिन मन बावरा फिर भी, तुझको ढूंढने निकला है।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह बाती कैसे बनाऊं।

जिससे मन मंदिर के अंदर, मैं तेरी ज्योति जलाऊं।।


सुना है तेरे नाम सुमिरन से, मैं तुझको पा सकती हूं।

पर! इस गृहस्थ जीवन में, मैं नाम बिसरा देती हूं।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह भक्ति कैसे जगाऊं।

जिससे माया के बन्धन से, मैं बाहर निकल जाऊं।।


लगन लगी है तेरी कान्हा, मेरे मन मंदिर में ज्योति जलेगी।

भाव देखेगा जब दासी के, कभी तो कृपा बरसेगी।।

उल्टी- सीधी सेवा लाडले, कभी तो स्वीकार होगी।

इस जन्म में नहीं अगले जन्म में सही, तुझे पाने की मन्नत पूरी होगी।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट। 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सर्वाधिकार सुरक्षित।

Saturday, 24 January 2026

मैया: कुमाऊनी कविता।

 मुखड़ा- ऊंच- नीचा डांड्यू कै करी पार।

ओ मैया, ऐ गयूं त्यर द्वार मा।।

दर्शन दी जा वे इक बार।

ओ मैया, ऐजा वे बैठि शेर मा।।


कोरस- बैठि शेर मा, बैठि शेर मा,बैठि शेर मा, बैठि शेर मा 

ऐजा वे ऐजा एक बार ओ मैया ऐ जा वे बैठि शेर मा।।

शेर मा।।


अंतरा1- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई झांवरी, कोई बिछ्छू ल्यै रैयीं,

झांवरी पैरेली मैया आज। ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

बिछछू पैरैली मैया आज, ओ मैया ऐ जा वै बैठी शेर मा।


अंतरा2- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई लंहगा, कोई साड़ी ल्यै रैयीं,

चुन्नी ओडूंल मैया आज, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।


अंतरा3 - दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई मैहदी, कोई चूड़ी ल्यै रैयीं,

मेहंदी रचा ली मैया आज, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

चूड़ी पैरेली मैया आज ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।



अंतरा4- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

गउ क हरूवा, कोई नथुलि ल्यै रैयीं,

हार पैरेली मैया आज ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

नथुलि पैरैली मैया आज ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।


अंतरा5- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई टिकुलि कोई बिंदुलि ल्यै रैयीं,

बिदुलि सजालि मां कपाल, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

टिकुलि लगानी ख्वर माथ, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।


स्वरचित- मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी- हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड।





Friday, 9 January 2026

योगी आदित्य नाथ ज्यूक जीवन परिचय: कुमाऊनी कविता

 राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


१- आंनद ज्यू' क घर मा, आनंद छाई रौ।

जन्म ल्ही रौ भौ लै, कै धूम मची रौ।।

जो द्यैखैनी भौ कै, द्यैखियै रै जाणी, द्यैखियै रै जाणी।

सावित्री ज्यू काखी मा, एक तेज़ खेलैंणी।।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली,पधानी रधुली,,ओ।२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


४- पौड़ी- गढ़वाला, पढ़ायो- लिखायो।

ऋषिकेश जै बेर दीक्षा छू पायो।।

अब जाणौं अजय, नाथों' क पंथ मा,नाथों' क पंथ मा।

गोरखनाथ मंदिर में, जोगी बणना।।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली, पधानी रधुली,, ओ।२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जपलै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


३- देवभूमि' क लाल लै, जोग धरि यो।

भारि तपस्या करि बैर, योगी बणि गो।।

यौ सिंदूरी रंग में, योगी रंगी गो,,,जोगी रंगी गो।

म्यर देश' क आज, हर मनखी रंगी ग्यौ।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली, पधानी रधुली। ओ२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।

 

४- भल भला छा शिष्य तुम, आपुण गुरु का।

साहसी, निडर मुख्यमंत्री, यू पी राज का।।

भ्रष्टाचार कौ तुमुल कर दी सफ़ाया, कर दी सफ़ाया।

पांच सौ साल बाद, राम राज संवारा।।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली, पधानी रधुली,,,ओ।२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


सर्वाधिकार सुरक्षित।

स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

(मूल निवासी-हल्द्वानी, नैनीताल।)

Wednesday, 7 January 2026

पीड़: कुमाऊनी कविता।

 तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसि रूंला तुमरी बग़ैरा।। 

तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसि रूंला तुमरी बग़ैरा।।


कसमों- रस्मों कै भुुली गैछा।

बीच भंवर में छोड़ि गैछा।।

ओ,,,,,,,कसमों- रस्मों कै भुुली गैछा

बीच भंवर में छोड़ि गैछा।

किलै न्हीं सोचि,,,,,,किलै न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

ओ,,,,तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौली तुमरी बग़ैरा।।

तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौली तुमरी बग़ैरा।।


तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसिक रूंला तुमरी बग़ैरा।। 


नाण-तीना कै छोड़ि गैछा।

छ्वार-मुवा तुम करी गैछा।

ओ,,,,,,नाण-तीना कै छोड़ि गैछा।

छ्वार-मुवा तुम करी गैछा।

कलै न्हीं सोचि,,,,,,किलै न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

ओ,,,, तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौला बाज्यू' क बगैरा।।

तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौला बाज्यू' क बगैरा।।


तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसि रूंला तुमरी बग़ैरा।। 


सासू- सौर ढूंढण में रेंगीं।

तुमर बाटा देखण में रेंगीं

ओ,,,,,,,सासू- सौर ढूंढण में रेंगीं।

तुमरी बाटा देखण में रेंगीं

कब आलौ लाड़िल हमरा,,,?

ओ,,,,कब आलौ पोथिल हमरा,,,,?

रुणैं- रूणैं पड़ीं छैं बेसुुुधा।।

कब आलौ लाड़िल हमरा,,,?

कब आल पोथिल हमरा,,,,?

रुणैं- रूणैं पड़ीं छैं बेसुुुधा।।


तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसिक रूंला तुमरी बग़ैरा।। 


सर्वाधिकार सुरक्षित।

स्वरचित: मंजू बिष्ट; 

गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी: हल्द्वानी; नैनीताल।

(उत्तराखंड)


Saturday, 3 January 2026

मेरी सुवा- कुमाऊनी गीत।

 मुखड़ा - जा रे, जा रे चंदा, आपणी देश मा।

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे की आड़ मा।।

त्येरी नज़र पड़ेली, सुवा की मुखड़ी मा।

ज्यों नज़र पड़ेली सुवा की मुखड़ी मा।।

जली भुनी जालै, आपणी देश मा। 

तू, जली भुनी जालै, आपणी देश मा।।


 (१) अंतरा- कपाला में बिंदी चमकने चमाचम।..२

नाक में नथुली, दमकने दमादम।।२..

जब द्यैखलै चंदा, सुवा कति बाना।

ज्यों द्यैखलै चंदा, सुवा म्येरी बाना।।

जली भुनी जालै, आपणी देश मा।

 तू, जली- भुनी जालै,आपणी देश मा।।


मुखड़ा- जा रे,जा रे चंदा, आपणी देश मा।

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे की आड़ मा।। 


(२) अंतरा - आंखों में काजला, लाली छू ओंठ मा। २..

सुवा देखी बढ़ गे, दिले की धड़कना।। म्येरी, २..

जब द्यैखलै चंदा, सुवा कै हंसणा।

ज्यों द्यैखलै चंदा, मुलमुलौ हंसणा।।

जली- भुनी- जालै, आपणी देश मा। 

तू,तो जली- भुनी जालै, आपणी देश मा।।


मुखड़ा - जा रे,,,, जा रे चंदा, आपणी देश मा,,,,

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे' की आड़ मा,,,,


(३) अंतरा - खन-खन, खन- खन चूड़ी, खनकणी हाथ मा। २..

छम- छम, छम- छम झांवर, बाजणी खुटा मा।। २..

जब सुणलै चंदा, झांवर की रुनझुना।

ज्यों सुणलै चंदा झांवर की रुनझुना।।

जलि- भुनी जाले, आपणी देश मा। 

तू, तो जलि- भुनी जाले आपणी देश मा।।


मुखड़ा- जा रे, जा रे चंदा, आपणी देश मा।

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे की आड़ मा।।२.


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी- हल्द्वानी, नैनीताल। उत्तराखंड।

सर्वाधिकार सुरक्षित।

Friday, 2 January 2026

कोरोना काल: कुमाऊनी कविता।

कोरोना काल क टैम छू,

चैत्र क यौ महैंण छू।

नाण-तिनौं क नैं क्वै चिचाट है रौ,

गौं भरि में बड़ उदेख छै रौ।


अ- आ, क- ख, पढ़नें- पढ़नें,

मधुलि दबड़ है भ्यार कै द्यैखनें। 

द्येखि जालि, कभै परुली भ्यार फन,

शान-शान में बात-चित कर लिन।।


इजा क खुटा क धप- धप सुणी बेर;

मधुलि सरासर भागि गै भितेर।

देखि मधुलि क मने क छटपटाट,

ईजा ल मायाजाव क करि तड़तड़ाट।।


च्येली! मन लगै बेर जब तू पढ़लि,

अघिन कै कक्षा में तबै तू बढ़लि।

माया लुटै बेर समझा मधुलि कै,

द्वी गज क दूरि क फैद बता वीकै।।


समझन में मधुलि ल करि नैं देर,

कुणी, ईजा! अब पढ़न में नैं करुल अबेर।

नई कक्षा क आंखों में स्वीण सजै,

भै गे मधुलि पढ़न सुनि कै।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट;

गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।

2025 की सुनहरी यादें।

2025, आज तुम्हारी विदाई है,

पूरे वर्ष की समस्त यादें बहुत ही सुखदाई हैं,

दामन में तुमने भरी हैं मेरे खुशियां ही खुशियां, 

सच कहूं 2025, तेरे जाने पर मेरी आंखें भर आईं हैं।


जनवरी माह में मिली हम उत्तराखंड की नारियां,

हर उत्सव मिलकर मनायेंगे होने लगी तैयारियां,

साथ रहे, संगठित रहे और किये कठिन काज,

सच कहूं 2025, हर सशक्त नारी पर मैं जाऊं बलिहारियां।


महाकुंभ स्नान से पुण्य कर्म उदित हुए,

शाकुंबरी व ज्योतिर्लिंगों के दर्शन फरवरी और मार्च में हुए,

शादी की 25 वीं सालगिरह में, 

सच कहूं 2025, हमारे चित्त ज्योतिर्गमय हुए। 


अप्रैल में मिट गई मेरी बची-खुची तृष्णा, 

वृंदावन में देखे मैंने जब राधे- कृष्णा,

संत- महंत के संग से मेरा मन निर्मल हुआ, 

सच कहूं 2025, दासी बनूं कृष्ण की, आई ऐसी स्फुंरणा।


मई में उत्तराखंड के खूबसूरत पहाड़ देखे, 

कोटद्वार में सिद्धबली, नील कंठ में भोलेनाथ देखे,

सीतावनी की तीन जल धाराओं में,

सच कहूं 2025, खुशियों के कई रंग देखे।

 

भागवत महापुराण के स्वाध्याय से जून माह सार्थक हुआ,

प्रथम कृष्ण जन्मोत्सव से जुलाई मास खास हुआ, 

अगस्त, सितंबर, अक्टूबर में प्रभु की ऐसी हुई कृपा, 

सच कहूं 2025, संतों के चरण धूलि से मेरा घर पावन हुआ।


किशोरी जी ने गुरु दीक्षा देकर मेरे जीवन को कृतार्थ किया,

नवंबर माह में कुरुक्षेत्र भ्रमण से भगवत गीता का चक्षु पान किया,

यूं तो पूरा साल मेरा बेहद ही लाजवाब रहा,

सच कहूं 2025, साल के अंतिम माह ने लाड़ प्यार देकर कमाल किया।


मेरे घर की शादी में खुशियां ही खुशियां छाईं,

अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी में जाने पर खुशियां दो गुनी हुईं, 

नेपाल-भारत साहित्य गौरव सम्मान पाकर, 

सच कहूं 2025, मेरी सारी चाहतें पूरी हुईं। ‌


आओ 2026, नए सपनों के साथ आओ, 

नई उमंगें- नई खुशियां अपने साथ लाओ,

आशाओं के दीप जलाये इंतजार करेगी मंजू,

सुख, शांति और समृद्धि लेकर साथ आओ।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सर्वाधिकार सुरक्षित।

Tuesday, 30 December 2025

आशा : कुमाऊनी कहानी।

 कोरोना क केस दिन पर दिन बढ़ते जाण छी; कोरोनावायरस कै रोकण क बस एक उपाय छी लाकडाउन। आज ब्याखुली कै प्रधानमंत्री ज्यू ल घोषणा कर द्यी, कि २४ मार्च बै १४ अप्रैल तक देश में लाकडाउन रौल। यौ खबर सुणी बाद आशा कि आपणी पड़ौसी किरण ल्यी फिकर और बढ़ गै।  उ आकाश कै चै बेर कुणी! "हे द्याप्तौ! तुम किरण कै यौ कसि दोहरि मार मारण छा। आजि त वीक मैंस क पीपल- पाणी कै महैण दिन लै न्हैं रै। मलि बै यौ लाकडाउन और लागि गौ।" ..... आशा आपुन मनै-मन बुदबुदाणी, "उ दिन गाड़ी क टक्कर ल कतुक घर कुड़ी उज्याड़ि द्यीं।.... मोहन ड्यूटी बै रोज ब्याखुली कै घर औंछी, पत्त न्हैं! उ दिन दुपहरी कै किलै ऐ हुंयौल?,,, काव आफुं में नौं न्हैं लिन कुणी' ठीक कुणी, काव लै बुलै रौ हुन्यौल।,,, ब्याखुली कै औंनों त शायद बच जांण।",,, 

जो कमौनी छी, उ ई छोड़ि बेर न्हैं गौ।..... द्वी नाणी- नानि च्येलियां छैं। कसिक समावनेर भै उ आपूं कै और आपनि च्येलियां कै? वीक मलि बै त आसमानै गिर गो! इतुक नानि उमर में ख्वोरि जो फुट गै ! अब कसिक काटिनेर भै यौ पहाड़ जैसि जिंदगी कै।,,, 'सिबौ लै' कै खनैर भै? और कसिक खनैर भै?...लाकडाउन क खबर सुणि बेर त उ औरे टुटि गै हुन्यैल।,,,,,

भौत देर तक सोचन बाद आशा ल निर्णय ल्यी कि उ हर हाल में किरण क मदद करैली। उ किरण कै इकलै कभै नैं छोड़ैलि। यौ बाबत उ आपुन नाणा क बाज्यू थै बात करैली। और फिर उचाट मन कै उ खेत में न्हैं गै, गोरू- बाछा ल्ही घा काट लै, और लागि हाथ आघिन दिन क काम लै वील आजै निपटै ल्ही।,,,,

रात में खाणु खाई बाद आशा ल आपुन मैंस क सामणि जिगर छैड़ी द्यी। आशा क मैंस लै भौतै मयालू मैंस छी। आशा क मन कि बात सुणी बेर उ कुणी, "त्वैल म्येरी मन कि जसि बात कर द्यी, मैं लै द्वी-तीन दिणों बै यौई बात सोचनै छी, कि अब अघिनकै किरण क घर क खर्च कसिक चलनेर भै? तू एक काम कर, राशन क एक पर्च बणा। भोल म्येरी त ड्यूटी छू, पर तू बाजार जाये, और द्विनों परिवार क ल्यी महैण भरी क राशन भर ल्याये। पत्त न्हैं! यौ लाकडाउन कब तक रौल!"... आपुण मैंस क बात सुणी बेर आशा ल राहतै क सांस ल्ही, और दुसर दिण घर क काम- धाम निपटै बेर उ बाजार कै बाट लागि गै।

बाजार में आज भौत भीड़- भाड़ है रौछी। घंटों लाइन में ठाड़ हैई बाद बड़ राम- राम ल आशा ल बणियै क दुकान बै राशन- पाणि ल्ही, कपड़िये क दुकान बै ५० मीटर कपाड़, और लास्ट में मंडी जाई बेर २० धड़ी आलू,१० धड़ी प्याज और बकाई साग- पात खरिदौ।,,, आशा ल सबै सामान एक बटिये बेर टैंपो में धरौ और घर कै चल द्यी। घर जाण- जाणें आशा कै रात है गैछी।,,,, घर ऐ बेर थ्वाड़ सामान वील अपुण घर में उतारौ,,, और फिर टैंपो ल्ही बेर किरण क घर कै चल दी, टैंपो क आवाज सुणी बेर किरण क द्विनों च्येलियां भ्यार आंगण में ठाड़ि हैं गयीं। आशा और द्विनों च्येलियां ल मिलबेर टैंपो बै सामान निकालौ और भीतेर एक कुण में रख द्यी।,,,,,

उई कमर में किरण लै उदास, निशास लागि एक कुण में भै रौछी, भीतैर को औंना- जाणा वीकै इतुक ल्है होश न्हैं छी। आशा क बुलौण पर किरण स्वीण बै जसि उठी और कुणी "अरे! दीदि तुम?... कब आछा?... बैठो!" और वीक नजर जसै सामान ल भरी झ्वालों में पड़ी, त उ पुछैणी! "दीदी इतुक सकर सामान ल्ही बेर कां बै औंन छां? और कां हुणी जांण छा ?"

“त्वैल आज क समाचार त सुणी हालि हुन्यैल ?

"होई दीदी।" इतुकै कुण म किरण क आंखों बै आंसू'क तड़तड़ाट है पड़ी। धोती क टुकै ल आपुन आसूं कै पोछते हुए कुणी,"पत्त नैं दीदि मैं कैं क्वै जनमा क कर्मों क दंड मिलैणी"

आशा, किरण क मुनई कै मुसारते हुए कुणी, "बली लै,,, यौ बखत त्यर मन में कै चल रौ हुन्यौल मैं भली कै समझ सकनूं। लाकडाउन क खबर सुण बेर मैं बेली बै तुमरी बार में सोचणै छी। आज मैं आपुन घर क ल्यी राशन-पाणि ल्यूंहुणी बाज़ार जाणंछी, मैं ल सोचि लगै हाथ तुमर ल्यी लै राशण पाणि ल्यूं। यौ झ्वौला में उई राशन पाणि छू,,,, किरण कै आपुन आंखों में विश्वास न्हीं हुण छी। उ कभी समान कै त कभै आशा क मुखड़ी कै द्यैखणै छी। आशा किरण क मनैं की उथल-पुथल कै समझ गैछी। आशा कुणी! “किरण  मोहन त यौ दुणी कै छोडि बेर न्हैगौ, तू कतुक लै ख्वार मुनव पटक लै अब उ वापिस ओनि न्हैं,,,,अब त्वै ल आपणी यूं नाणियों दगै कमर बांधन छू,,,, और त्वै लै यूं नाणियों कै आघिन कै पावण छू।,,, अब तू हिम्मत बांध बैणा...मैं हमेशा त्यर साथ ठाड़ि छू।

“एक बात बता? त्येरी सास बतौंछी, म्येरी ब्वारि ल सिलाई- कढ़ाई सबै सीख राखौ। त्वै कैं सिलाई- कढ़ाई ऐंछ”?,,,,

 "दीदी ब्या है पैली सिख त रौछी,, पर! अब सबै भुलि- भालि गयूं"।

"कोई बात न्हैं, पोरखिन बै लाकडाउन लागणों, औनी- जाणी कम है जाल। मैं यौ कपाड़ ल्है रैयूं। तू दुबारा मेहनत कर, और खूब मेहनत कर। जो सिलाई क हुनर त्वै में छी,,,, उ हुनर कै दोबारा निखार।...खेती- पाति तुमरी छू न्हैं। लेकिन सिलाई करिबेर तू एक आत्मनिर्भर सैणी बण सकछी। आपणी दमै ल आपणी च्येलियां कै पाऊ सकछी और द्विनों कै भलि-भलि भांति पढ़े- लिखे सकछी।,,,,,

त्वै कैं त पत्त छू? आस-पास कोई कपाड सिणैनी न्हैं, सब कपाड़ सिणै हों बाजार जाणी।...तू काम त शुरू कर,…..  मैं त्येरी मदद करूंल। मैं गौं- गौं, घर-घर जौंल;,,,, और त्यर सिलाई क प्रचार करुंल। बस, अब तू काम शुरु कर दे”।

मुसीबत क यौ घड़ी में आशा क सहार और वीक बातों ल किरण कै भौते हिम्मत मिली। आपुन ल्यी आशा क मन में इतु सकर फिकर, पीड़ और मायाजाव द्यैखिबेर किरण ल आशा कै कसि बेर अंगवाव भ्येड़ी द्यी। और फिर त उ आपणी डाढ़ कै रोकि नैं पै। उ डाढ़ मारते हुए कुणी, "दीदि यौ टैम में तुम म्यर ल्यी देवी क रुप धरि बेर ऐ रौछा। मैं कैं यौ फिकर ल खै हालि छी, कि मैं आघिन कै करूं? और कसिक आपणी च्येलियां कै पाउं?,,,,,दीदि तुमुल मैं कै सहार दिण क साथ- साथ आघिन कै जिंदगी बितौंण क रास्त लै दिखै हालौ,,,, मैं तुमर यौ एहसान कै"...….आशा ल किरण क गिजां में आपनी आंगुलि रख द्यी,,,, "नैं",,, "आपनी ज़बान में कभै यौ बात झन ल्याये। तू मैं कैं आपणी जिठाणी माणै छी नैं, और दीदि कौंछी। आज बै तू मैं कै बस आपणी दीदि मानियै,,,, दीदि, बैणी पर कभै एहसान नैं करैनी... समझ गैछी।,,,, एक टैम छी, जब त्येरी सासु ल लै हमैरी भौत मदद कर रखै।,,, बस,,, यौ त जीवन में अल्ट- पल्ट छू। आज म्येरी बारि, त भोल त्येरी बारि।"

“तू बस म्येरी एक बात माणि लै, अब आघिन कै अपुण यूं आंसू कै कभै झन खड़िये, अब आपणी च्येलियां क ईज और बाज्यू त्वैलै बणन छू।,,, और त्यर अपुन खुटां में ठाड़ हुन लै अब भौत जरूरी छू।,,, जब तू केई काम करैली तबै तू आपुन च्येलियां क जिंदगी में एक "नई किरण" बन पालि।"... माणैली नैं म्येरी बात।" किरण ल माठु- माठ "होई" में आपणी मुनई कै हिलै दी।,,, 

आशा क बातों ल किरण कै भौत ढांढस और हिम्मत मिली और किरण क डाढ़ थम गैछी। थोड़ी देर इथा- उथा बात करि बेर आशा ल किरण क मुखड़ी में एक नज़र मारि। किरण क मुखड़ी में चिंता क लकीर कुछ कम है गैछी। फिर उ किरण थै कुणी, रात भौत हैगे, अब मैं लै घर जांणू। तू लै खांणू बणैं लै, और टैम पर खै- पी ल्यियौ।,,,, और फिर आशा आपुन घर कै बाट लागि गै।.. किरण आंगण में ठाढ़ है बेर आशा कै घर जाण देखते रै।,,,,वील आपनी सासु और मैस क मुखड़ी बै आशा क बार में भौत सुण रौछी,…… पर सांचि में आज वील साक्षात देवी क दर्शन करौ,,,, और फिर किरण माठु- माठु कदम बढ़े बेर आपुण भीतेर ऐ गै। वील द्वार में सांगव लगाईं, और फिर आपणी द्वीनों च्येलियों कै आपुण क्वाठ में भर ल्ही।

आपुण घर पहुंच बेर आशा ल मास्क उतारौ, और सबूं है पैली नाण- ध्वैंण करौ। नें- ध्वै बेर आशा ल गरमागरम चहा बणैं, और फिर चहा क गिलास ल्यी बेर उ खाट में भै गै। किरण क ल्यी वीक मन में जो फिकर है रौछी, उ फिकर अब थ्वाड़ कम है गौछी।....... पर देश में कोरोना क बढ़ते केश द्यैख बेर आशा क शांत मुखड़ी में फिर चिंता क रेखा द्यीखींण लागि।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।मूल निवासी- हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड।

ऐ जा सुवा: कुमाऊनी गीत।

 ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे....

मुखड़ा: ऐ जा सुवा, ऐ जा सुवा, ऐ जा रे पहाड़ मा,

ऐ जा रे पहाड़ मा।

कसि पड़ी गे त्वै मा माया, मरि ज्यूंला त्येरी याद मा।।२...

ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे....


अंतरा: दिन बिति गे, रात बिति गे, बिति गो महैंणा, बिति गो महैंणा।

त्येरी माया मा घुलि- घुली, म्यर जानी पराणा।। २..

ऐ सुवा ऐ जा सुवा, किलै भूली गैछै तू ? 

किलै भूली गैछै तू ?

परदेशे की हवा- पाणी, कै इतु खराब छू ?२..

ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे...


मुखड़ा: ऐ जा सुवा, ऐ जा सुवा, ऐ जा रे पहाड़ मा,

ऐ जा रे पहाड़ मा।

कसि पड़ी गे त्वैमें माया, मरि ज्यूंला त्येरी याद मा।। २...


अंतरा: कसिकै बतौ, मैं त्वै कैनी, हिया की यौ पीड़ा, हिया की यौ पीड़ा।

हिया कै पिड़ौनै सुवा, बिरहा का शूला।।२...

ऐ जा सुवा, ऐ जा सुवा, किलै तड़पौछें तू ?

किलै तड़पौछे तू ?

त्येरी सौं मैं मरि ज्यूंला, मैं त्येरी माया मा छूं।।२..

ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे..


मुखड़ा: ऐ जा सुवा, ऐ जा सुवा, ऐ जा रे पहाड़ मा,

ऐ जा रे पहाड़ मा।

कसि पड़ी गे त्वैमें माया, मरि ज्यूंला त्येरी याद मा।। २..


अंतरा: याद औनी, मैं कैनी, उं, बिति दिना की बाता, बिति दिना की बाता।

भै रौछीं हम, डाना- काना, हाथ मा धरि हाथा।। २...

ऐ जा सुवा ऐ जा सुवा, भैठि रैयूं बाटा मा,

मैं भैठि रैयूं बाटा मा।

त्येरी सौं, मैं मरि ज्यूंला, अब ऐ जा पहाड़ मा।।२...

ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे..


मुखड़ा: ऐ जा सुवा ऐ जा सुवा ऐ जा रे पहाड़ मा,

ऐ जा रे पहाड़ मा।

कसि पड़ी गे त्वैमें माया, मरि ज्यूंला त्येरी याद मा।।२..

ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे, ऐ जा रे..


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी- हल्द्वानी, नैनीताल। उत्तराखंड।

Monday, 29 December 2025

गोपी। कुमाऊनी कविता।

 नान- नानु भल- भलौ,

थ्वौप जसौ भौ छू मैं।

लाड़िल मैं घर भरी कौ,

सूपी गौं क गोपी छू मैं।।


सिद- साध छैं आमा- बूबू ,

बंधि छैं उनरी मायाजाव में। 

खाट में बैठि द्यैखि रौनी, 

हम नाण, उनर पराण छैं।


उठ इजा- ठुल बा थै कुणी,

उं, घरा क धुरी छैं।

उनुल बटोव रखि राखौ,

हमरि घर- परिवार कैं।।


रत्तै, दौफर, और ब्यखुली कैं,

म्येरी काखियां रौनी चूल्याण में।

भल- भलो, रसिल खाणु बणौनी,

रस्याखाण क उन किरसाण छैं।। 


गोरू- बछां क काम- धाम,

ठुलि इजा, इजा क नाम छू। 

काका द्येखैणीं खेत- पाति।

परिवार में बंटि काम छू।।


बोज्यू जाई रयी पल्टना में,

उं घर क शान छैं।

साल म जब उं घर औनी, 

घर म बहार छाई जैं ।।


म्येरी बुआ क काम छू,

हम नाणा कै पढ़ौना।

खालि टैम में हम सबूं क,

काम छू सिर्फ खेलणा।।


आपणी भै- बणी में, 

मैं सबूं है नाण छूं।

माया लुटौणी मैं में भौते ,

मैं सबूं क प्राण छूं।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

मूलनिवासी: हल्द्वानी, नैनीताल।

उत्तराखंड।

कोरोना काल में स्कूल कि याद: कुमाऊनी कविता

 चैत- बैसाख बीति गौ ईजा,

मैं स्कूल अब! कब जौंल।

याद आणी मैं कै खिमिया- मोहना, 

मैं पढ़न अब! कब जौंल।।


यौ द्येख! म्यर बस्त मैं हुणी,

रोज एकै बात पुछै छू।

कापि- किताब, रबर-पेंसिल कै,

कब! बटोव बेर रखन छू।।


अलमारि में धरि ड्रेस लै,

म्यर कान में यौ कुणै।

अलमारि में पड़ि- पड़ि बेर, 

मैं कै औस्याण औरैं।।


ज्वात, जुराब लै कभै बै, 

उदैखि बेर कुण म पड़ि छैं।

जब लै मैं खेलनू भितर फना,

मैं कै धाल लगौनी छैं।।


जेठ क महैण लागि गौ ईजा, 

अब छुट्टि ल लै शुरू है जाण छू।

तु ई बतै दै मैं कै जरा,

अब कब! स्कूल जाण छू।।


च्यलै क बात सुणि ईजा ल,

च्यल कै काखि में भैठाई द्यी।

मायाजाव ल ख्वार मुसारी,

फिर च्यल कै समझे द्यी।।


थ्वाड़ दिनों क बात छू च्यला,

यौ टैम लै एक दिन कट जाल।।

तुम सब स्कूल जरूर जाला,

उ टैम जल्दी लौट बेर आल।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Sunday, 28 December 2025

कृपा करौ इंद्र ज्यू। कुमाऊनी कविता।

 जेठ क यौ महैणा, 

भाबर क यौ तात (काउ) घामा।

गर्मी ल मचै रौ भौते हाइ- हाइ,

गरम ल झुरी गी हमर पराणा।।


बैठि- बैठि मैं सोचणें यूं, 

इतुक गर्मी क कारण कै छू? 

 मैं कै लागणौ यौ इजू, 

डावां कै काटन क यौ परिणाम छू।।


हाथ जोड़ि  मैं भै रैयूं ,

प्रार्थना इंद्र ज्यू थै करनै यूं ।

 सुण लि्या, सुण लि्या इंद्र ज्यू,

अब नैं काट ल क्वै डावां कै यूं ।।


बाड़-खुड़ि सबैं मुरझै गईं,

प्रचंड घाम ल सुखि गईं।

चाड- पिटुक त्यर बाट द्यैखणी, 

पाणी क तीस ल तड़फ गईं।।


गाड़- गद्यार सबै सुखि गईं, 

माछ लै भौते परेशान हैं गईं।

ऐ जा रे, ऐ जा ओ बादवा,

संग में दबड कै द्यौ ल्यी आ।। 


हम सब नाणों क आस तुम,

द्यौ खतकाला आज तुम।

कसिकै बतूं ओ इंद्र ज्यू, 

गर्मी ल है गयूं परेशान हम।। 


इन्द्र ज्यूल ल नाणा क धाल सुणी।

आसमान में बादव गड़- गड़ानी।

झुड़- मुड़, झुड़ मुड़ द्यौ झुमझुमानी,

नाण खुशि ह्वै बेर द्यौ में नाचैंणी।।


स्वरचित रचना : मंजू बोहरा बिष्ट;

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

प्रकाशित

मातृभूमि: कुमाऊनी कविता।

 सौ- सौ बार पैलाग भारत भुमि,

मैं त्यर वीर जवान छूं।

मातृ भुमि में माया पड़ी गे, 

मैं मातृ भुमि पै कुर्बान छूं।।


म्यर देशक लहरौणी तिरंग,

म्येरी आन और शान छू।

मातृभुमि की रक्षा करन,

यौई म्येरी पहचाण छू।।


केसरि रंग ल मनखियों क क्वाठ में,

देश क ल्यी माया द्यी जगै द्यी।

स्यत रंग ल देश भर कै,

अमन चैन क पाठ पढ़ै द्यी।।


हरि रंग ल खुशी क बौछार करबेर,

म्यर देश कै संपन्न कर कर द्यी।

तिरंग क बीच क चक्र ल सबूं कै,

धर्म और कर्तव्य क पाठ पढ़ै द्यी।।


म्यर यौ जीवन हे मातृभूमि,

तुमरी अमानत छू।

मातृभूमि में कुर्बान है जूं मैं, 

बस इतुकै म्येरी इच्छा छू ।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Friday, 26 December 2025

शरारती टिंकू: बाल कविता।

शरारती टिंकू: बाल कविता।


पढ़-पढ़ कर थक गए टिंकू भाई,
सोनू-मोनू की अब याद है आई।
गिल्ली-डंडा वो खेल रहे होंगे,
उछल रहे होंगे, हंस रहे होंगे।।

उसने खुरापाती दिमाग दौड़ाया,
खुद को बेड से नीचे लुढ़काया।
धम्म की आवाज सुन मम्मी दौड़ी,
मम्मी के पीछे, चाची- ताई दौड़ी।।

"अरे! बेचारा गिर गया नीचे,
लिया गोद में और ममता से सींचें।"
ताई ने टिंकू की गाल थपथपाई,
"जा बेटा! खेल, चाची ने दी दुहाई।।

टिंकू जी की जैसे लॉटरी लग गई,
बल्ले-बल्ले नाचे टिंकू भाई।
दादी के संग बाहर में निकल गया,
दोस्तों को देख चेहरा खिल गया,

गिल्ली- डंडा देख मुस्कान है छाई,
शरारती टिंकू ने ली अंगड़ाई।
दौड़कर दोस्तों के बीच गया,
जाकर खेल में रम गया।।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

पीड़ : कुमाऊनी कहानी।

 राहुल स्कूल में रोज सी जांछी, उ भौत कोशिश करछी कि उ नैं सितो, पर लाख कोशिशों क बावजूद वीक आंखि म नीन तैर जांछी।

राहुल क कक्षा में सीतन मासाब कै भौत अखर छी, उ रोज राहुल कै कक्षा क भ्यार ठाड़ कर द्यी छी।

राहुल चुपचाप जाल और भ्यार ठाड़ि है जाल। वीक क कक्षा क नाण भ्यार- भितेर जाण तक वीकै चिढ़ौछी, उ दिवाल कै मुखड़ी कर बेर आपुण आंसु खड़ छी। वीक आंसु कै क्वै नैं द्यैखिछी।

अलीबेर देवलचौड़ क स्कूल में कक्षा ४ म राहुल क नौ लिखी गौ। नई स्कूल, नई माहौल, मलि बै पहाड़ जस दुःखयोनय शायद यौ ई कारण ल राहुल क कक्षा में क्वै दगड़ू नैं छी। नैं उ क्वै दगड़ खेलछी, और नैं क्वै संग बात- चीत करछी।

राहुल क कक्षा क मासाब निगुर- निपुड़ैंन मैंस छी, पर स्कूल क हेडमास्टनी भौत भलि सैंणी छी। उ भौत अनुशासन ल स्कूल चलौछी, और स्कूल क नाणा कै उ भलि- भलि चारि समझ छी।

स्कूल में आई नई च्यल कै रोज कक्षा क भ्यार ठाड़ द्यैखि बेर हेड मास्टरनी ज्यू ल चपड़ासि थै कवै बेर वी कै आपणी आफिस में बुला। 

चपड़ासि ल कक्षा में ऐ बेर मासाब थै कौ, "मासाब जो च्यल रोज भ्यार बै ठाड़ि है रौं, वीकै हैड मास्टरनी ज्यू बुलौणी‌।"

मासाबूं ल राहुल कै बुला, और उ थै कुणी! "राहुल, मैं ल कतुक बार कौछी, कक्षा में झन सित, झन सित,,,, पर त्वेल म्येरी एक नैं सुणी!,,, अब देख! हेडमास्टरनी ज्यू ल बुलै है!,,,,अब त त्यर भगवानै मालिक छू,,,, जा,,, मिलबेर आ हेडमास्टरनी ज्यू है!,,," 

राहुल डरन- मरने चपड़ासि क पछिल बै बाट लागि गो, और आफिस में जाई बेर उ एक कुण म ठाडि है गो। 

उ बखत मास्टरनी ज्यू कोई फाइल द्येखणै छी। राहुल कै द्यैख बेर कुणी, " सामणी ऐ बेर ठाड़ि हो च्यला, कै नौ छू त्यर?"  

हेडमास्टरनी ज्यू बात सुणीबेर उ थ्वाड़ अघिन कै खिसकौ और कामणी आवाज में कुणौ, "राहुल।"

"अरे,, मैं कै सुणाई नैं दिणैं, थ्वाड़ और आघिन कै आ, !" 

राहुल माठु- माठ कै हेड मास्टरनी ज्यू क मेज क पास ऐ बेर ठाड़ है गो,,, हेडमास्टरनी ज्यू ल गौर ल वीक मुखड़ी कै द्यैखी, वीक आंखि में भौतै डर, थकाई साफ द्यिखीण छी, और मुखणी में पीड़ साफ झलकन छी।

हेड मास्टरनी ज्यू फिर कुणी, अब बता कै नौ छू त्यर?

"राहुल"

"त्यर बाज्यू नौ?"

"पान सिंह।"

"त्यर ईजा नौ?"

" कमला।" 

"त्यर घर कां छूं?"

"म्यर घर?

पैली अल्म्वाड़ छी, पर अब मैं अपुण काक- काखी दगड़ भाबर देवलचौड़ रौनूं।"

"अल्म्वाड़! इतुक भलि- भलि जाग छोड़ि बेर भाबर क लू खाण क ल्यी किलै आईं भयै तू?"

हैड मास्टरनी ज्यू बात सुन बेर राहुल क मुखड़ी सुदै स्येति पढ़ि गै। 

और वीक आंख डबडबै आईं।

"बता,,, अल्म्वाड़ जस स्वर्ग छोडि बेर यौ भाबर क घाम खन किलै आईं भयै तू?"

" को,,को,,,को,,"

"को?,,,कै? को? "

बड़ि ताकत लगै बेर राहुल क गाउ बै आवाज निकली, 

 "को,,,कोरोना,,, में म्यर इजा- बाज्यू द्विनों आकाश में जाई बेर तार बन गई।,,,उ मैं कै, म्येरी बैणी कै यूं दुणी में यकैलै छोड़ गई।,,,, म्येरी,, बैणी कै माकोट म्यर मामा ल्यी गई,,, और,, मैं कै म्यर काका- काखी ल्यी आई,,,"

फिर तो उ अपुन डाढ़ कै रोकि नै पै,,,,वीक डाढ़ में इतुक पीड़ छी, कि वीक डाढ़ सुणि बेर ढुंग क लै आंसू निकल जाण। वीक डाढ़ कै द्यैखिबेर हेडमास्टरनी ज्यू ल आपणी डाढ़ बड़ मुश्किल ल थामि। उं आपणी कुर्सी है उठी और राहुल क पुठ मुसारन लागि।,,, 

राहुल डाढ़ मारने कुण लागौ ,, "भैंजी, मैं कै अपुण इजा- बाज्यू और बैणी क भौत निराई लागि गै, मैं आपणी बैणी कै कसिक द्यैखू? उ है कसिक मिलूं?"  

"भैंजी, हमर इज- बाज्यू हमूं कै भौ तै भल माणि छी,,,, पर! अब हमूं कै क्वै भल नैं माणन।,,, मैं कसिक रौं अपुन इजा- बाज्यू बिना,,,, कसिक रौं आपणी बैणी बिना ,,,,,,, भैंजी, मामा- मामि त खेत म  जाणि हुन्याल!  तब म्यर बैणी कै क्वै द्येखौ हुन्यौल? क्वै उकै खवौ हुन्यौल?,,, म्येरी बेणी त भौते नानि छू।,,,,,हम भै- बैणी कभी मिलूल?,,,"

"भैंजी, जब रात में तार निकलनी त मैं घंटों ईजा- बाज्यू थै बात करनूं, कभै उन्हा थैं शिकैत करनूं, त कभै डाढ़ मांरनू, कभै आशिर्वाद मांगनू त शक्ति मांगनू।"  

"भैंजी, तुम जादू क कोई छड़ी घुमे बेर म्येरी परिवार कै ढूंढ बेर लै द्यौ।,,, कम से कम म्येरी बैणी कै त ल्यैई द्यौ।"

यौ कुण- कुणै राहुल ल ड़ाढा- डाढ़ मचै द्यी। राहुल क डाढ़ और उ क सवालों क हेड मास्टरनी ज्यू पास क्वै जवाब नैं छी।

हेडमास्टरनी ज्यू ल राहुल कै कसिबेर अंगवाव भेड़ि द्यी। और उनरी आंखों बै लै आंसू क तड़तड़ाट है पड़ी।,,, राहुल क ख्वार मुसारते हुए उ सोचण लागि,,, "सिबौ लै, मासाब कै कभै लै यौ भव्व क पीड़ क एहसास नैं है हुन्यौल?,,, इतुक नाण भव्व पर कुदरत क इतुक ठुलि मार,,, हे! द्याप्तौ,, यौ भव्व ल्यी तुमुल अपुण आंख किलै बुजि द्यी।,,,,यूं नाणा क काका -काखी, मामा- मामी आपुण फर्ज त निभौण लागि री!,,, पर कै!,,,, आपुण यौ फर्ज कै उ इमानदारी ल निभौणी या फिर यूं नाणा कै उं ब्वौझ समझनी?,,," 

"यौ समाज क और इनर अपणा क थ्वाड़ लै सांचि माया इन नाणा में पड़ जाणी त यूं नाणा क जीवन सपड़ जाण।" 

अलछिन कोरोना किलै आछै तू!,,,बिन कसूरै एक हंसणी- खेलणी परिवार कै त्वील उज्याड़ बेर रख द्यी।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी- हल्द्वानी नैनीताल, 

उत्तराखंड।

Wednesday, 24 December 2025

शुभ घड़ी: कुमाऊनी लोक गीत।

 मुखड़ा- दगड़ियो, हे, दगड़ियों,,, हैगीं म्यर पिल हाथ।


मैं नाचुल, मैं नाचुल, हम नाचुल सारि, सारि रात।।२


मुखड़ा- दगड़ियो, हे, दगड़ियों,,, शुभ घड़ि ऐरै आज।

मैं नाचुल,,, मैं नाचुल, हम नाचुल सारि, सारि रात।।२


अंतरा- बंबई बै, बंबई बै काक म्यरा ऐई गईं।

दिल्ली बै दिल्ली बै माम लै ऐई गईं ।।

ऐ गईं, म्यरा सबै न्यौतार।

मैं नाचुल,मैं नाचुल, सब नाचुल सारि, सारि रात।।


अंतरा- मैंहदी,,,मैंहदी रचणै हाथन में।

धक- धक मच रै क्वाठ न में ।।

आंखों मा स्वीण सजी छैं हजार।

मै नाचुल, मैं नाचुल सब नाचुल सारि, सारि, रात।।


अंतरा- मटुक म्यरा, मुकुट बधौल भोल ख्वर माथ।

बंधेली बंधैली डोरी सुवा की साथ।। 

छाजेली छाजेली बाज गाजा दगैड़ी बारात।

मैं नाचुल, मैं नाचुल, सब नाचुल सारि, सारि रात।।


अंतरा- पल- पला यौ घड़ी लागणी मैं हुणी साल।

सुवा त्वैकै कसिकै बतौ आपणी क्वाठे की हाल।।

डीजे में डीजे में मचूल आज धमाल 

मैं नाचुल, मैं नाचुल, हम नाचुल सारि, सारि रात।।


दगड़ियो, हे, दगड़ियों,,, शुभ घड़ि ऐरै आज।

मैं नाचुल,,, मैं नाचुल, हम नाचुल सारि, सारि रात।।२


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश। 

मूल निवासी: हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड।

स्त्री

कामकाज से होकर फ्री, 

आज बालकनी में जा बैठी मैं।

कड़कड़ाती हुई इस ठंड में, 

सूरज की नज़ाकत देख चकित थी मैं।।


लगता है सूर्य देव को भी खबर थी मेरी,

कि आज मंजू को मिलेगी थोड़ी छुट्टी।

वरना इस कोहरे में तो,

किस्मत ही रहती है कट्टी।।


सुबह की वो अमृत बेला,

और रजाई की वो रेशमी जेल।

भोर में जागना हम औरतों के लिए,

नहीं है किसी जंग से कम खेल।।


पांच बजते ही मोबाइल का, वो सुलगता अलार्म।

मानो चीख कर कहता हो, छोड़ो मंजू रजाई का मोह और काम पे लगो तमाम।।


आंखें मींचकर, उसे दो बार किया स्नूज़।

पर साढ़े पांच होते ही, उड़ गए नींद के सारे फ्यूज़।।


उठकर धरती मां को प्रणाम किया, गर्म पानी का घूंट भरा।

और फिर शुरू हुआ मेरा, झाड़ू-पोछा वाला मुशायरा।।


रसोई में घुसते ही, हाथ ऐसे चले जैसे कोई मशीन।

एक तरफ चाय खदबद, दूसरी तरफ आलू का हसीन सीन।।


टमाटर, मिर्च, धनिया, सब कटा सरपट।

पतिदेव का टिफिन पैक किया, जैसे हो कोई बजट।।


नाश्ता कराया, विदा किया, तब जाकर मिली थोड़ी शांति‌।

वरना सुबह की अफरा-तफरी, जैसे कोई बड़ी क्रांति।।


गुरु मां कहती हैं, गृहस्थ जीवन में कर्म ही पूजा है।

कर्तव्य कर्म से बढ़कर, ना कोई काम दूजा है।।


फिर मंदिर में लड्डू गोपाल को, जगाया, नहलाया और सजाया।

क्षमा करना प्रभु, अपना 'कर्तव्य धर्म' दोहराया।।


सासू मां को चटनी खूब भाई, तो आशीर्वादों की बारिश हुई।

चलो भाई, आज की कुकिंग की रेटिंग 'फाइव स्टार' हुई।।


सोचा अब नाश्ता कर लूं, तो बाथरुम से कपड़ों ने आवाज दी।

मंजू! मशीन में डालो हमें, क्या हमें भूलने की कसम खा ली?


बर्तन धोए, कपड़े सुखाए, रसोई कर दी चकाचक।

एक घंटे में निपट गए सारे काम, बिना किसी रोक- टोक।।


अचानक पेट में चूहों ने किया जब तांडव और धमाल।

तब घड़ी ने बताया, मंजू ग्यारह बज गए! बुरा है तेरा हाल।।


थकान तो है पैरों में, पर चेहरे पर है नूर।

जैसे कोई जंग जीत ली हो, उसका ही है सुरूर।।


ये बालकनी, ये कुनकुनी धूप, और फ़ुरसत के ये पल अब मेरे अपने हैं।

डायरी में उकेरूं वो बातें आज, जो स्त्री की शोभा हैं और स्त्री को बांधे हैं।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

Wednesday, 19 June 2024

आत्मकथा: जिंदगी।

इस वर्ष जून माह में इतनी ज्यादा गर्मी पड़ रही है लग रहा है आसमान से अंगारे गिर रहे हैं। इंसान तो अपने घर के अंदर या कहीं छांव की पनाह ले लेता है, पर!  बेचारा जानवर क्या करें, वो तो खाना- पानी दोनों के लिए तरस रहे हैं, और भटक रहे हैं, ऊपर से यह जानलेवा गर्मी,,,, 5- 6 साल से मैंने अपनी बालकनी के पास गैस पाइप लाइन में एक जग बांधा हुआ है, इस जग में सुबह से लेकर शाम तक मैं कम-से-कम 8 या 9 बार पानी भरती हूं। और आजकल तो मैं जग को फ्रिज के पानी से भरती हूं।,,, पानी देने की इस आदत से अब दिनभर मेरे दिमाग में एक ही बात रहती है, पक्षियों ने पानी पी लिया होगा!,,जग खाली हो गया होगा!,,,पक्षी और कबूतर  दिनभर पानी के आसपास ही बैठे रहते हैं,,,,,गंदगी की वजह से अक्सर हम लोग कबूतरों को पसंद नहीं करते,,तो क्या हुआ यार,, हमारे जीवन में कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हम पसन्द नहीं करते,, तो क्या हम उनके काम नहीं करते?? उनकी सेवा सुश्रुषा छोड़ देते हैं??,,, करते हैं ना।,,  इसलिए मैं तो कहुंगी बस यही सोचकर आप लोग भी इन पक्षियों को दाना- पानी दिया करें,, पहले पशु-पक्षी प्रकृति पर आश्रित थे आज हम मानव पर आश्रित रहते हैं।,,, सच कहूं,,,मेरा यह छोटा सा काम मुझे बहुत ही ज्यादा सुकून देता है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


Monday, 29 April 2024

कान्हा ज्यू को प्रथम पत्र

 हे मेरे कान्हा, 

कैसे हैं आप, मैं यह नहीं पूछूंगी। क्योंकि मुझे पता है आप जगत के पालनहार हैं, तो! बढ़िया ही होंगे। मुझे शरणागति चाहिये भगवन, पर कैसे ? 

मैं तो बचपन से ही क्रोध, लोभ और मद की मटकी अपने सिर पर रखकर फ़िर रही हूं😞,,, हाथों के सहारे बिना चलने पर यह मटकी नहीं गिरती, मैं जितना तेज भागती हूं यह मटकी उतनी ही स्थिरता से सिर पर टिकी रहती है,,,सच कहूं  कान्हा अब मेरी गर्दन थक गई है। इसलिए कह रही हूं🥺,,,अब यह बोझ मुझसे नहीं ढ़ोया जाता 😢,,, please एक बार आओ ना, आकर यह मटकी फोड़ दो। और मुझे एकदम खाली और हल्का कर दो।

स्वरचित

प्रार्थनीय

मंजू बिष्ट, गाजियाबाद


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आत्मकथा: जिंदगी 

5- 6 साल से अपनी बालकनी के पास गैस पाइप लाइन में मैंने एक जग बांधा हुआ है, मैं इस जग को सुबह से लेकर शाम तक कम-से-कम 8 या 9 बार पानी से भरती हूं। दिनभर मेरे दिमाग में यही बात रहती है अब तक तो पक्षियों ने पानी पी लिया होगा!,,जग खाली हो गया होगा!,,, गंदगी की वजह से अक्सर हम लोग कबूतरों को पसंद नहीं करते,,तो क्या हुआ यार,, हमारे जीवन में कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हम पसन्द नहीं करते,, तो क्या हम उनके काम नहीं करते?? उनकी सेवा सुश्रुषा छोड़ देते हैं??,,, करते हैं ना।,,  इसलिए मैं तो कहुंगी बस यही सोचकर इन पक्षियों को भी दाना- पानी दिया करें,, पहले पशु-पक्षी प्रकृति पर आश्रित थे आज हम मानव पर आश्रित हैं।,,, सच कहूं,,,मेरा यह छोटा सा काम मुझे बहुत ही ज्यादा सुकून देता है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

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Monday, 21 August 2023

शिवसाधना क्षणिका।

देख जटा में गंगा की धार,

गले में लिपटा नागों का हार।

तेरी इसी छवि पर भोले,

मैं हुई बलिहार ।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश ‌