Sunday, 15 March 2026

फूलदेई: कविता।

जब मेरे पहाड़ों में बसंत आता है,

धरती का कण- कण मुस्काता है।

डालियों पर सजे रंग- बिरंगे फूल,

खुशियों की मधुर बहार ले आता है।।


नन्हे-नन्हे हाथों में फूलों की टोकरी लेकर, 

जब बच्चे देहलीज पर आते हैं।

“फूल देई, छम्मा देई” गाते हुए,

हर आंगन को आशीष दे जाते हैं।।


देहलीज पर बिखरे वो नन्हे-नन्हे फूल,

सिर्फ फूल नहीं, स्नेह से भरे अनमोल फूल।

इनमें छिपा रहता है अपनापन और प्यार,

दुआओं की गर्माहट, मेरे पहाड़ का सत्कार।। 


छोटे- छोटे बच्चों की मासूम हंसी में, 

 मेरे पहाड़ की सादगी बसती है।

उनकी चमकती आंखों में, 

नई उम्मीदों की रोशनी दिखती है।।


फूलदेई का यह प्यारा त्योहार,

देहलीज पर बिखेरता खुशियों की बहार।

सिर्फ फूल ही नहीं बरसाता हर द्वार,

दिलों में प्रेम जगाता, रिश्तों में घोलता मिठास अपार।। 


जैसे! मंजू बसंत की नरम हवा, 

थके हुए मन को सहला जाती है।

वैसे ही फूलदेई हर दिल में फिर से, 

खुशियों की कोपलें खिला जाती हैं।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।



Saturday, 7 March 2026

धूप छाँव के रिश्ते: धारावाहिक।

एपिसोड 3 – “दिल की उलझन”

गांव में सुबह की धूप फैली हुई थी, लेकिन राधिका के दिल में आज भी रात का अंधेरा ही छाया हुआ था।

रात भर वह ठीक से सो नहीं पाई थी।

राघव का फोन न उठाना,

विनय की बातें,

और मन में उठते हजार सवाल!

राधिका ने आंगन में बैठकर चाय का कप हाथ में लिया।

तभी आदित्य उसके पास आकर बैठ गया।

“मा, तुम फिर से उदास लग रही हो।”

बच्चे की बात सुनकर राधिका हल्का मुस्कुराई-

“नहीं बेटा, बस थोड़ा सिर दर्द है।”

आदित्य ने मासूमियत से कहा-

“मां, अगर पापा हमें छोड़कर चले गए तो?”

यह सवाल राधिका के दिल में तीर की तरह लगा।

वह कुछ देर चुप रही।

फिर बेटे का हाथ पकड़कर बोली-

“ऐसा कभी मत सोचना।”

लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।

उस दिन गांव में हाट लगा था।

राधिका कुछ सब्जियाँ खरीदने हाट की तरफ चली गई।

वहां उसकी मुलाकात कमला दादी से हुई।

कमला दादी ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

“बहू, तू बहुत परेशान लग रही है।”

राधिका ने झूठी मुस्कान दी-

“नहीं दादी, मैं ठीक हूं।”

दादी ने धीरे से कहा-

“सच छिपाने की कोशिश मत कर। दर्द अंदर ही अंदर बढ़ जाता है।”

राधिका चुप रही।

उसी समय उसे दूर से वही अजनबी आदमी विनय दिखा।

विनय उसके पास आया।

“मैंने सोचा था कि आप मुझसे फिर बात करेंगी।”

राधिका ने कहा-

“मैं क्या पूछूं?”

विनय कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला-

“रोहित पर लगा आरोप बहुत गंभीर है। अगर सच सामने आया तो उनका नौकरी से जाना तय है।”

राधिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“लेकिन ! राघव ऐसा नहीं कर सकते,” उसने धीरे से कहा।

विनय ने गहरी नजर से उसकी तरफ देखा —

“कभी-कभी हम जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं… वही हमें सबसे ज्यादा चोट देते हैं।”

यह सुनकर राधिका की आंखें भर आईं।

वह बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

घर पहुंचकर उसने दरवाजा बंद कर लिया।

उसके हाथ काँप रहे थे।

वह सोचने लगी-

क्या राघव सच में कुछ छिपा रहे हैं?

अगर राघव दोषी निकले तो?

आदित्य का क्या होगा?

उसका अपना भविष्य क्या होगा?

शाम होने लगी थी।

गाँव की पहाड़ी के पीछे सूरज छिप रहा था।

तभी अचानक घर के बाहर एक गाड़ी रुकी।

राधिका बाहर आई।...

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स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट,

 गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

धूप भी अपनी छांव भी अपनी: धारावाहिक।

 एपिसोड 2- अजनबी से मुलाकात।

सुबह गांव में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। पहाड़ों पर बादलों का झुंड ऐसे घूम रहा था जैसे किसी ने आसमान पर सफेद रुई बिखेर दी हो।
राधिका आज जल्दी उठ गई थी।
रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी।
बार-बार उसे गांव में आए उस अजनबी आदमी का चेहरा याद आ रहा था, उसे लग रहा था उसने उसे कहीं तो देखा है, लेकिन कहां देखा है यह याद नहीं आ रहा था।
उसकी अजनबी  की आंखों कौन देखकर लग रहा था कि, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो।
राधिका ने तुलसी के पौधे को पानी दिया और मन ही मन बोली - “पता नहीं, ये दिल इतना बेचैन  क्यों है।”
इतने में आदित्य स्कूल जाने के लिए तैयार होकर आ गया।
“मां, आज स्कूल में स्पोर्ट्स प्रैक्टिस है।”
राधिका मुस्कुराई और बोली- "ध्यान से खेलना और ज्यादा थकना मत।”
आदित्य ने मां का हाथ पकड़कर कहा- "मां, तुम तुम चिंता मत करो आपका बेटा बहुत होशियार जो है।”
बच्चे की बात सुनकर राधिका के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल गई। और अचानक उसकी आंखें नम हो गई, फिर  जबरदस्ती हंसते हुए कहने लगी आज आदित्य को स्कूल तक मम्मी छोड़ कर आयेगी,, "क्यों! चलें",,क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी आंखों की नमी बेटे को दिखाई दे।
आदित्य झट से बोला, "नहीं मम्मी वो देखो सामने तो स्कूल का गेट है मैं चला जाऊंगा।" और वह स्कूल बच्चों के साथ चला गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
आराधना रसोई में काम करने लगी, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।
दोपहर के करीब गांव के मुखिया का आदमी उसके घर आया।
“बहू, मुखिया जी ने आपको पंचायत घर बुलाया है।”
राधिका हैरान थी-
“मुझे क्यों?”
आदमी ने कहा —
“वह अजनबी आदमी जो सरकारी दफ्तर से आया है आपसे बात करना चाहता है।”
राधिका का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह अपने आंचल को ठीक करती हुई पंचायत घर की तरफ चल दी।
गांव की पगडंडी पर चलते हुए उसे राघव  के साथ बिताए हुए सारी बातें याद आने लगीं।
कैसे वह  पहली बार दुल्हन बनकर इस गांव में आई थी,
राघव के साथ उसने कई सपने देखे थे, जिससे उसकी जिंदगी खुशियों से भर जाएगी।
लेकिन समय ने जैसे सब कुछ बदल दिया।
पंचायत घर के बाहर वही अजनबी आदमी खड़ा था।
जैसे ही राधिका वहां पहुंची, वह आदमी उसकी तरफ बढ़ा।
“आप राधिका हैं?”
राधिका ने धीरे से कहा-
“जी! आप कौन हैं?”
आदमी ने गहरी सांस ली और बोला-
“मेरा नाम विनय है। मैं शहर से आया हूँ।”
राधिका चुप रही।
विनय ने आगे कहा —
“मैं राघव के ऑफिस का दोस्त हूं।”
राघव का नाम सुनते ही राधिका का दिल जैसे रुक गया।
“राघव, कैसे हैं वह?” उसने धीरे से पूछा।
विनय की आंखों में एक अजीब सा दर्द आ गया।
“यही बात करने आया हूं। रोहित पिछले तीन महीनों से परेशान हैं।”
राधिका चौंक गई-
“परेशान? किस बात से?”
विनय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला-
“रोहित पर ऑफिस में धोखाधड़ी का आरोप लगा है।”
राधिका को लगा जैसे जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
“यह, आप क्या कह रहे हैं?”
विनय ने फाइल निकालकर दिखाई।
“मैंने सोचा आपको सच पता होना चाहिए।”
राधिका की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।
राघव!
जिस पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसका अपना जीवन साथी जब वह मुसीबत में है तो उसने  राधिका को क्यों नहीं बताया, क्या वह सच में किसी मुसीबत में था?
या फिर यह भी कोई नया रहस्य था?
विनय ने धीरे से कहा-
“रोहित आपसे कुछ छिपा रहे हैं।”
राधिका कुछ बोल नहीं पाई।
उसका मन हजार सवालों से भर गया।
क्या रोहित का बदलता व्यवहार इसी वजह से था?
कि वह किसी बड़ी परेशानी में है?
या फिर कुछ और ही सच छिपा था?
सूरज ढलने लगा था।
गांव के ऊपर लालिमा फैल गई थी।
राधिका ने विनय से कहा, मैं हर मुसीबत में अपने पति के साथ खड़ी हूं। उन्होंने मुझे कुछ भी बताने के काबिल नहीं समझा।
उनसे कहना आप चिंता ना करें, सब ठीक हो जाएगा। और फिर राधिका घर लौट आई। और राघव को काॅल करने लगी और साथ ही घर के आंगन में बैठकर आदित्य का इंतज़ार करने लगी, राघव ने काॅल नहीं उठाया।
कुछ देर बाद आदित्य स्कूल से लौट आया।
उसने मां को उदास देखा तो पूछा-
“मां, क्या हुआ?”
राधिका मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली-
“कुछ नहीं बेटा।”
लेकिन आदित्य समझ गया कि मां कुछ छिपा रही है।
रात को राधिका ने फिर राघव को काॅल लगाया,
कॉल बजता रहा,
लेकिन राघव ने फोन नहीं उठाया। अब राधिका का सब्र का बांध टूट चुका था
राधिका की आंखों में झरझर आंसू बहने लगे। और फिर वह मुंह में कपड़ा ठूंस कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। की घंटे रोने के बाद वह लाचार आंखों से मोबाइल देखने लगी। लेकिन राघव का कोई काॅल नहीं आया। थक-हारकर वह खिड़की के पास बैठ गयी। और खिड़की के बाहर देखने लगी।
आसमान में चांद निकल आया था।
चांद की रोशनी गांव के घरों की छतों पर चुपचाप फैल रही थी।
राधिका ने मन ही मन कहा-
“सच चाहे कितना भी दर्दनाक हो, अब मुझे सच को जानना ही होगा, राघव आखिर क्यों बदल गया, वह कसूरवार है या बेगुनाह, जो भी हो, एक पत्नी होने के नाते इस समय उसका पहला फर्ज है अपने पति के साथ खड़े रहना और उसका साथ देना।”
उसी रात शहर में,
राघव किसी अंधेरे कमरे में बैठा था।
उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।
सामने टेबल पर कई फाइलें पड़ी थीं।
और उसके फोन की स्क्रीन पर राधिका का नाम चमक रहा था।
लेकिन वह फोन उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
क्योंकि सच बहुत भारी था,
और वह अच्छी तरह से जानता था, आने वाले दिनों में यह सच उसके सारे परिवार की जिंदगी को बदल सकता है। और टेंशन में उसने जाने कितनी सिगरेट पी ली, उसे पता ही नहीं था, और वह फिर नई सिगरेट निकालने लगा।
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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


Friday, 6 March 2026

हमारी वास्तविक जीवन यात्रा।- कविता।

7 मार्च 2000 को उत्तराखंड की धरती पर, हमारा गठबंधन हो गया।

प्रेम और विश्वास भरे धागों से, जीवन का नया आंगन सज गया।।


पतिदेव, दुख- सुख की हर डगर पर, हमने हाथ थामकर चलना सीखा।

धैर्य, विश्वास और अपनापन से, जीवन को समझना सीखा।।


जब दुख के बादल गहराए, मन थोड़ा घबराया भी था।

पर आपने बेहद स्नेह से मुझे, गृहस्थ जीवन समझाया था।।


आज हमारे जीवन में, सबसे प्यारी खुशी हमारा बेटा है।

उसकी मुस्कान से घर- आंगन का, हर कोना प्रेम से महकता है।।


पतिदेव, मेरे शब्दों की उड़ान में, आपका स्नेह भरा आकाश मिलता है।

मेरे सपनों का हर दीप, आपके प्रेम से ही जलता- खिलता है।।


जो भी मैं लिख पाती हूं, वह आपका आशीष ही तो होता है।

मेरे हर संकल्प में आपका साथ, जीवन का सच्चा मोती होता है।।


आपको सालगिरह की, हार्दिक मंगलकामनाएं बार- बार।

ईश्वर करे हमारे जीवन में बना रहे, सदा प्रेम, शांति और प्यार।।


धन की चमक जीवन में, भले ही बहुत अधिक न आ पाए।

पतिदेव, प्रेम, सुख और संतोष से, हमारा छोटा संसार भर जाए।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Thursday, 5 March 2026

धूप भी अपनी, छांव भी अपनी। हिंदी धारावाहिक।

 एपिसोड 1- गांव की हवा में बसी खूशबू।

सुबह की हल्की- हल्की धूप पहाड़ों के पीछे से झांक रही थी। गांव की पगडंडी पर ओस की बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे धरती ने रात भर आसमान के आंसू समेट कर रखे हों।
कुनकुनी हवा में पहाड़ी फूलों की खुशबू घुली हुई थी। दूर कहीं से मंदिर की घंटी की आवाज आ रही थी और साथ ही सुनाई दे रहा था मुर्गों का बांग देना।
इसी गांव का नाम था- सूपी गांव।
सूपी गांव छोटा जरूर था, लेकिन यहां के लोगों के दिल बहुत बड़े थे। हर कोई एक-दूसरे के सुख- दुख में शामिल रहता था।
गांव के बीचों- बीच एक पुराना लेकिन सुंदर साफ सुथरा घर था। उसी घर के आंगन में खड़ी थी राधिका, उसकी उम्र बत्तीस साल है, उसने नयन- नक्श बेहद सुंदर हैं, गेरूआ कलर है, लंबे काले बाल हैं, स्वभाव से बेहद सरल और शांत है, उसे देखते ही लगता है कि वह अपनी  सजल आंखों में एक अनजाना सा दर्द छिपाए हुए है।
राधिका सुबह जल्दी उठना पसंद करती थी। प्रातः कालीन बेला में उठकर सर्व प्रथम वह घर में झाड़ू लगाती, गोशाला साफ करती, दूध दूहती, गाय को चारा देती थी, फिर नहा- धोकर सूर्य देव को अर्घ्य देती और तुलसी मां के सामने नियमित दीपक जलाती,  तत्पश्चात बेटे को उठाकर फिर वह नाश्ता बनाने रसोई में चली जाती।
आज भी  सुबह- सुबह नाश्ता बनाकर रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि आवाज आई- “मां मुझे स्कूल जाने में देर हो रही है।”
यह आवाज थी उसके दस साल के बेटे आदित्य की।
राधिका मुस्कुराई।
“अरे वाह आज तो बहुत जल्दी तैयार हो गया मेरा राजा बेटा। दो मिनट रुको बेटा, तुम्हारा टिफिन ला रही हूं।”
आदित्य बहुत समझदार और शांत बच्चा था। वह अपनी उम्र से ज्यादा होशियार और गंभीर था। कभी-कभी राधिका को लगता था कि उसके  बच्चे की आंखों में भी कुछ अनकहा दर्द बसता है।
राधिका ने टिफिन बैग में रखा और आदित्य का माथा चूम लिया। तब तक पास पड़ोस के बच्चे भी आ चुके थे, राधिका ने आदित्य से कहा, "मैं स्कूल तक छोड़ दूं क्या?" 

आदित्य कहने लगा, "मम्मी दो कदम पर तो स्कूल है, आप चिंता मत करो, मैं भईया लोगों के साथ चला जाऊंगा,"

राधिका मुस्कुराते हुए बोली, "अच्छा बाबा ठीक है, मन लगाकर पढ़ना और किसी से लड़ाई मत करना।”
"अच्छा मां" कहकर आदित्य बच्चों के साथ स्कूल के लिए निकल गया। स्कूल घर के पास में ही था। इसलिए देवांश अन्य बच्चों के साथ स्कूल चला जाता था।
घर में अब राधिका अकेली रह गई थी।
उसका घर, जो कभी खुशियों से भरा रहता था, अब सिर्फ यादों की आवाजें लिए खड़ा था।
राधिका की शादी ग्यारह साल पहले गांव के ही एक युवक राघव से हुई थी। राघव शहर में काम करता था। शुरू के कुछ साल सब ठीक रहे, लेकिन धीरे-धीरे रिश्ते में दूरी आने लगी।
राघव कई- कई महीने में घर आता था।
राघव राधिका से पहले बहुत प्यार करता था, लेकिन धीरे-धीरे उसने राधिका से बात करना कम कर दिया, अब तो ज्यातातर चुप ही रहता था, इधर कई महीनों से उन दोनों के बीच में हां- ना के सिवा कोई और बात नहीं हुई थी।


बच्चे पर कोई गलत असर ना पड़े, इसलिए वह राघव से कुछ नहीं कहती थी, लेकिन राघव का धीरे-धीरे बदलता व्यवहार देखकर राधिका अंदर से टूटने  लगी थी, अब अकेलापन धीरे-धीरे उसके दिल में घर करता चला जा रहा था।
आज भी राधिका ने मोबाइल देखा।
उसमें राघव का कोई मैसेज नही था, और नहीं कोई  मिस कॉल पड़ी थी।
उसने हल्की सांस छोड़ी और रसोई की तरफ बढ़ गई।  उसने  उठी रसोई साफ की, बर्तन धोये, कपड़े धोये, पौधों में पानी डाला। वह खुद को घर के काम में व्यस्त रखना चाहती थी, ताकि कोई भी ख्याल उसे कमजोर ना कर सके। घर का सारा काम निपटा कर राधिका ने प्लेट में थोड़ा सा नाश्ता लिया, प्लेट में रखा नाश्ता देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह सिर्फ जीने के लिए खा रही है, और नाश्ता करते समय वह राघव के बदलते व्यवहार के सवाल जवाबों में फिर घिर गई।
राधिका जब भी घर में बाहर निकलती, गांव की औरतें अक्सर कहते हुए मिल जाती थीं-
“राधिका बहू बहुत सहनशील है तू।”
लेकिन किसी को नहीं पता था कि सहनशीलता के पीछे कितना तूफान छिपा है।
आज दोपहर होते- होते गांव के चौक में हलचल बढ़ गई।
आज गांव में पंचायत की बैठक थी।
गांव के मुखिया ने घोषणा की थी कि गांव में एक नई योजना आने वाली है जिससे किसानों की मदद होगी। राधिका को जब यह बात पता चली थी, तब उसने भी सोचा था कि  पंचायत की बैठक में वह भी जायेंगी, किसानों की मदद के लिए जो नई योजना आ रही है उसकी जानकारी वह भी लेगी इसलिए राधिका भी पंचायत में गई।
चौक पर बैठी बूढ़ी दादी कमला देवी ने राधिका का हाथ पकड़ लिया।
“बहू, तू इतनी दुबली क्यों होती जा रही है? ठीक से खाया कर।”
राधिका मुस्कुराई-
“दादी, मैं ठीक हूं।”
कमला देवी ने उसकी आंखों में देखा और धीरे से कहा-
“झूठ मत बोल बहू। आंखें सब सच बता देती हैं।”
राधिका चुप हो गई।
उसी समय दूर से एक गाड़ी गांव में दाखिल हुई।
गाड़ी से उतरा एक आदमी, शहर का लगता था। काला कोट, हाथ में फाइल, और चेहरे पर गंभीरता।
गांव के मुखिया उसके साथ बात करने लगे।
राधिका को पता नहीं क्यों उस आदमी को देखकर अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। मीटिंग में 3- 4 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला, शाम होने को लगी थी,
सूरज पहाड़ों के पीछे छिपने लगा और आसमान नारंगी रंग में रंग गया। तेज कदमों से राधिका घर आई, उसने देखा आदित्य स्कूल से घर पहुंचा ही था। उसने चैन की एक लंबी सांस ली, आदित्य को अपनी बाहों में लेकर उसे लाड़ लड़ाने लगी, आदित्य को अपनी ममता की छांव देते समय उसे याद आया- शादी के शुरुआती दिन,,,,
राघव का प्यार,
उसके साथ गांव की पगडंडियों पर घूमना,
और सपनों की बातें करना।
लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया।
राधिका यादों के  बंधन से बाहर निकली, फिर अपने रोजमर्रा के काम में जुट गई। रात को सारा काम निपटा कर जब वह आदित्य को सुलाने लगी। आदित्य ने राधिका से पूछा-
“मां, क्या पापा हमसे प्यार नहीं करते?”
राधिका का दिल कांप गया।
उसने बेटे को गले लगा लिया-
“ऐसा नहीं बोलते बेटा। पापा बस काम में व्यस्त रहते हैं।”
लेकिन उसके शब्द खुद उसके दिल को ही झूठ लग रहे थे।
रात बहुत शांत थी। लेकिन राधिका के मन के अंदर बहुत शोर हो रहा था।
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।
राधिका खिड़की के पास खड़ी थी।
उसकी आंखों में आंसू नहीं थे,
बस एक गहरा सन्नाटा था।
उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला है जो उसके रिश्तों की सच्चाई सामने लाएगा।
गांव में आया हुआ वह अजनबी आदमी,
और राघव का अचानक बदलता व्यवहार,
इन सबके बीच छिपा था एक रहस्य, जो राधिका की जिंदगी बदलने वाला था।
लेकिन अभी कहानी शुरू हुई है
अभी तो रिश्तों की असली परीक्षा बाकी है।...


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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


Friday, 27 February 2026

होली: रंगों का त्योहार। कविता।

फाल्गुन के महीने में, हवा बाँहें फैलाए जब आती है।

धरती पर रंगों की, चादर सी बिछ जाती है।।


पास और दूर के सभी यार, जाने और अनजाने परिवार।

सब मिलकर मनाते हैं, होली में रंगों का यह खूबसूरत त्योहार।।


होली में, गुलाल के बादल, छाते हैं आसमान में।

मस्ती की लहरें, दौड़ती हैं सबके मनों में।।


ढोलक की थाप पर, डीजे की धुन पर, थिरकते सबके पाँव।

खुशियों से भर जाए जीवन, सखी शहर हो या गाँव।।


पीले गुलाल में दिखे मुझे, सूरज का मधुर दुलार।

हरे रंग में झलके सखी, धरती का असीम उपकार।।


लाल रंग छूते ही, जागे हृदय में नव-ओज।

रग- रग में रोमांच उठे, सखी मिट जाए हर संकोच।।


होली में, भाभी करती हँसी- ठिठोली, देवर करते शरारत।

बुजुर्ग देते हैं आशीर्वाद तो, घर में आती है बरकत।।


जब ठंडाई की मिठास, होठों पर घुल जाती है।

सखी, पुरानी सारी रंजिशें, दिल से निकल जाती हैं।।


होली में, बच्चों की किलकारियां, गूँजती चहुं दिसाओं ओर।

होली है भाई होली है, मच जाए गली- गली में शोर।।


होली में, एक ही रंग में, रंग जाता है सारा संसार।

भेद- भाव सब मिट जाए, सिर्फ प्रेम बने आधार।।


फागुन आया है सखी, फिर नई उम्मीदें लेकर।

खिलखिला, गले लगे लगा, सभी सखियों को बाहों में भरकर।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Thursday, 26 February 2026

प्रवास में पहाड़। कविता। 38

अक्सर मन की दहलीज़ पर एक सपना दस्तक देता था, हम सब प्रवासी मिलकर एक संसार बसाएँ।
इस परदेस की अपरिचित गलियों में, अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू फिर से महकाएँ।।

सोचा था ! क्यों न दूर वादियों की स्मृतियों को, दिलों के आँगन में उतार लें।
क्यों न इस अजनबी शहर में, अपना सा एक छोटा उत्तराखंड सँवार लें।।

बिखरे चेहरों में अपनापन खोजा, संकोच की दीवारें धीरे-धीरे गिराईं।
उत्रैणी–मक्रैणी के पावन अवसर पर, मिलन की दीपशिखाएँ जगमगाईं।।

ढूँढ-ढूँढ कर सबको जोड़ा, स्नेह के धागों में विश्वास पिरोया।
बोली भले अलग-अलग थी, पर हर हृदय ने पहाड़ों का प्रेम संजोया।।

धीरे-धीरे मुस्कानों ने रिश्तों को आकार दिया, विश्वास ने जड़ों को गहरा किया।
एक छोटे से मंच से आरंभ हुआ सफ़र, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में नव इतिहास रच दिया।।

हाँ, राह में मतभेद भी आए, कुछ क्षणों ने मन को डगमगाया।
पर हमने साहस की ज्योति थामे रखी, हर तूफ़ान को हँसकर अपनाया।।

जीवन ने सिखाया, दुख की छाया में भी सुख का सूरज छिपा होता है।
बस धैर्य से ढूँढो तो, हर अँधेरा उजाले में बदला होता है।।

अब हौसलों के पंख लगाकर, आकाश को छूना है।
दोस्तों का हाथ थामे, साथ-साथ आगे बढ़ना है।।

इस परदेस की धरती पर, अपनत्व का दीप जलाना है।
अपने इस मिनी उत्तराखंड को, एक सजीव परिवार बनाना है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Tuesday, 24 February 2026

जीवन के रंग कविता।

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बाग सजाया प्यारा।

मेहनत, लगन और प्रेम से, सींचा उसे दुलारा।।


धीरे-धीरे रंग बिखरने लगी, हरित हथेलियों पर।

फूल मुस्काए जैसे सपने, उतर आए हों धरा पर।।


किसी फूल की खुशबू मन हर लेती, जैसे मधुर कोई गान।

कोई रूप से बाँध लेता, चुपके-चुपके सबका ध्यान।।


कुछ पौधे थे कंटीले, यह भी प्रकृति का है संदेश।

सिर्फ कोमलता ही नहीं, कठोरता भी है परिवेश।


काँटों की गोद में पलते हैं, सबसे सुंदर फूल।

जैसे संघर्षों में निखरता है जीवन का असली उसूल।।


विविध रंगों से सजा यह बाग, जीवन का ही है रूप।

हर स्वभाव, हर रंग यहाँ, है ईश्वर का स्वरूप।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


खूबसूरती के रंग: कविता । 37

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बागान बनाया प्यारा।

अपनी मेहनत और लगन से, सींचा, पाला- पोसा न्यारा।।

कुछ ही समय में रंग-बिरंगे फूलों से,

मेरा बागान सजा था।

किसी फूल की खुशबू मन मोहक थी,

तो कोई फूल मन मोह रहा था।।

कुछ पौधे कटीले थे, पर सारे कटीले फूल, बेहद खूबसूरत थे।।

बागान में फूलों की खूबसूरती, सभी को करती थी आकर्षित।

जिसे देख बागान, स्वयं भी होता था हर्षित।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

परदेश में अपना घर। कविता। 36

 अक्सर मैं भी सोचा करती थी, हम प्रवासी परदेश में मिल-जुलकर रहें।

परदेस में हम अपना, मिनी उत्तराखंड बना कर रहें।।


सबको साथ लाने के लिए, मैंने एक जुगत लगाई।

उत्रैणी- मक्रैणी महोत्सव मनायें, दोस्तों संग प्लानिंग बनाई।।


ढूंढ-ढूंढ कर समझा- बुझाकर, हम सबको एक मंच में लाए।

बोली में अंतर भले ही था, लेकिन सब थे उत्तराखंड से आए।।


धीरे-धीरे सब में प्रेम बढ़ा, प्रेम के साथ विश्वास बढ़ा।

मंच से शुरू हुआ सफर, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में हुआ खड़ा।। 


अक्सर उलझने आती सामने, मतभेद लेकर आते थे बहाने।

सभी मजबूती से खड़े रहे, कभी हार नहीं मानी हमने।।


सीख लिया है अब हमने, जीवन को समझना।

दुख में सुख का रास्ता, कैसे है हमें ढूंढना।।


सखियों के संग मिलकर, सपनों को साकार करना है।

हाथ थामकर एक- दूसरे का, हमें आगे बढ़ते जाना है।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Friday, 20 February 2026

मेरे प्रेरणा स्रोत व्यक्तित्व: आलेख।

 मेरे आदर्श और प्रेरणास्त्रोत मेरे माता-पिता हैं। मेरा जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में हुआ है। मैं एक किसान की बेटी हूं। जब भी किसी को मैं अपना परिचय देती हूं कि मैं एक किसान की बेटी हूं, तो मुझे स्वयं पर बहुत गर्व होता है।,,,,,,

हम पांच भाई बहन हैं। १९९८ में मेरे पिताजी का देहान्त हो गया था। उसके बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी मेरी माताजी के कंधों में आ गई। मेरी माता जी ने बहुत मेहनत और लगन से हम बच्चों की परवरिश की। और हम बच्चों को कभी भी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।,,,,,
मुझे आज भी याद है, मेरे माता-पिता दोपहर की प्रचंड धूप में भी खेतों में काम करते रहते थे; चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियां क्यों ना हो जाय, मेरे माता-पिता के चेहरे में कभी भी उदासी नजर नहीं आती थी, और नहीं कभी चिड़चिड़ापन दिखाई देता था। मेरे माता-पिता हम भाई-बहनों की शिक्षा का बहुत ध्यान रखते थे। आज से २२-२३ साल पहले गांवों में लड़कियों के लिए १२वी कक्षा से बाद अपनी शिक्षा को जारी रखना बहुत मुश्किल काम था। क्योंकि तब साधन सीमित थे! और महाविद्यालय बहुत दूर थे। मैं पढ़ने में बहुत होशियार थी; तो मेरे माता-पिता ने मेरी पढ़ाई में आने वाली परेशानी को ही दूर कर दिया। वो मेरे लिए एक साइकिल खरीद कर ले लाए, और तब मैं अपने गांव की पहली लड़की थी, जो महाविद्यालय में पढ़ने गईं। मेरे माता-पिता ने मुझे स्नातकोत्तर तक की उच्च शिक्षा प्रदान की।,,,,,,
आज भी गांवों में कई लोग पुरानी विचारधारा के हैं। वो अक्सर अपनी लड़कियों को बहुत सारे कायदों- कानून और नियमों में बांध देते हैं। हमारे माता-पिता ने हम पर कभी भी कोई बंदिशें नहीं थोपी। उन्होंने हमसे कभी नहीं कहा कि तुम एक लड़की हो, तुम ऐसा मत करो, वैसा मत करो। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ।,,,,,
पिताजी के देहांत के बाद भी हमारी माता जी ने हम बहनों को हर कार्य में दक्ष और निपुण बनाया। और हमें स्वाभिमान से जीना सिखाया।,,,,,,,
मेरे माताजी और पिताजी अक्सर कहते थे। "जीवन में हमेशा कर्मप्रधान बनो। कभी भी किसी के बारे में बुरा मत सोचो। अपने हर सपने को पूरा करने की हर संभव कोशिश करो। यदि तन-मन से मेहनत करोगे तो एक दिन सफलता अवश्य ही तुम्हारे कदम चूमेगी"।,,,,
जीवन में आने वाले संघर्षों और चुनौतियों का सामना करना मैंने अपने माता-पिता से ही सीखा है, और उन्हीं के परवरिश और संस्कार की वजह से आज मैं एक सफल और कुशल गृहणी हूं, और अपने परिवार जनों की बेहद प्रिय हूं। साथ ही मैं बच्चों को सिलाई सिखाती हूं। और आज मैं एक आत्म-निर्भर महिला भी हूं। 


स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।


हमूकै बुलौनी पहाड़ा: कुमाऊनी गीत

 सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।२

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।२


भीमताला, सात ताला, और नौंकुची ताला,

ताल मा बतख तैरणी, और तैरणी नौका।

हिसालू, किल्माड़, खुमानि क, कैसि छै रे बहारा।।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा...ओ बैंणां।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा, कै भल छाजिरौ पहाड़ा।।


सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


नैनीताले की नैना देवी, हरिद्वारे की गंगा,

अल्मोड़ा का चितई- गोलू, धारी की मैया।

छाया- दाया सबैं देवों की, हमेरी पहाड़ा।।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा...ओ बैंणां।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा, म्येंरो सजीलो पहाड़ा।।


सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


बद्रीनाथा, केदारनाथा, और अमरनाथा,

संत, देवी, देव रौनी, धन्य हमर भागा।

चारों धामा घुमि औंनूं, टेकि औंनूं माथा।। 

गंगोत्री, यमुनोत्री...ओ बैणा।

गंगोत्री, यमुनोत्री, की डुबकी करेली उद्धारा।।


सुंण लै, सूणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट;

गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी: (हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड)।

सर्वाधिकार सुरक्षित।



Tuesday, 10 February 2026

उद्देश्य: कुमाऊनी कविता। -१३

आपणी  संस्कृति कै आघिन पीढ़ी तक पहुचौंण में, 

मैं आपणी योगदान द्यूं, बस म्यर यई उद्देश्य छू,


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

बाग: कविता। - 35

 बागान बनाना आसान नहीं होता,

रंग-बिरंगे फूलों का संगम लाना पड़ता है।

पल्लवित करने में है जद्दोजहद करनी,

हर कदम पर झंझावातों का सामना करना पड़ता है।।


लेकिन जब फूल खिलते हैं बागान में,

सारे झंझावात भूल जाता है माली।

हर पौधे की अपनी है एक कहानी सुहानी,

कोई पौधा सेवा मांगे, कोई पौधा खुश होता देख हवा- पानी।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Monday, 9 February 2026

अंकिता: मैं च्यैलि पहाड़कि। कुमाऊनी- कविता। 12

उत्तराखंड कि मैं च्येलि छूं, अंकिता छू म्यर नाम।

आपणी घर चलौण कै, मैं करनूं एक रिजाॅट में काम।।


कोरोना कालक य टैंम छौ, महामारीक प्रकोप छन।

प्राइवेट नौकरी करनण वाल, आज सबै बेरोजगार छन।।


जब बै बाज्यू बेरोजगार हुईं, हम खाणक ल्यी मोहताज हुईं।

आपण बाज्यूक हाथ बटौण हुणि, मैं काम ढूंढण निकल गईं।।


एक रिजॉर्ट में म्येरी नौकरी लागि, इजा- बाज्यू कै थ्वाड़ सकून मिली।

घर- परिवार कै चलूण हुणि, उनुकै कुछ राहत मिली।।

 

थ्वाड़ दिंनों में मैकै पत्त लागौ, रिजाॅट में काव धंध तमाम हुणि।

सोचि! जसै दूणिय कै इनर करतूत बतूंल, उं म्येरी ज्यानक दुश्मन बणि।।


दरिंदोंल मैं कै मारबेर, चिल्ला नहर में फैंक गईं।।

उनुकैं लागो रिजाॅटक, काव धंध पर्द में छिप गईं।। 


दुश्मणौंल म्यर स्वीणों कै, नैं भरन द्यी उड़ान।

जीवन भरिक दुःख द्यी हालि, म्यर परिवार कै तमाम।।


कै कसूर छी म्यर? तुमी बता द्यौ हे! भगवान।

मैं एक चेली छूं! गरीब छूं, क्या? यैक करौ मैंल भुकतान।।


बन गै आज य अंकिता, पहाड़ क एक दर्दनाक कहानि।

अब किताबों में मिलेलि, म्येरी जिंदगीक निशानि।।


पहाड़ों में मैंकैं न्याय दिलौंण हुणि, कबै त आवाज उठेलि।

न्याय मिलल मैं कै तबै, जब दोषिन कै मौतेंक सजा मिलेलि।।


दुसरि अंकिता क्वै चेलि नै बणों, क्वै विधान शक्त बणै द्यौ सरकार।। ‌

च्यैलि, सैंणियां बेखौफ जी सकौ, उन्हां द्यी द्यौ य अधिकार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा, बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Friday, 6 February 2026

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य: अध्याय १: देवर्षि नारद ज्यू कि भक्ति दगड़ भेंट। (अनुवाद: कुमाऊनी बोलि)1

एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकक ऋषिल वेदव्यास ज्यूक लाडिल शिष्य सूत ज्यू थै पैलाग कै बैर उन्हा है कौणी- "द्याब ज्यू ! तुमर ज्ञान अज्ञान रूपी अंयार कै खत्म कर दिणी वाल करोड़ों सूर्यक समान छौ, आज तुम हम सबूंकै अमृत रूपी, सारगर्भित एक काथ सुनावौ। हम सबै मन्खी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ल कसिक आपणी बुद्धि कै शुद्ध करौं? वैष्णव लोग यौ मायाजाव बै कसिक आपणी पिण्ड छुणौनी? आजक य कलयुग में सबै जीव राक्षस स्वभावक है गयीं, मन्खी में गुस्स, लालच, मायाजाव सकर पाईं जांणौ।

 आपुं हमूं कै कोई यस शाश्वत उपाय  बतावौ जो पवित्र है पवित्र, कल्याणकारी हो, जो हमूकै श्री कृष्णक प्राप्ति करै द्यौ। और उ उपायल कै सबै जीवों क क्वाठक दुख, पीड़ और डर दूर है जौ, और उ भगवान में ध्यान लगैबेर य दुःख भरि भवसागर बै पार है जौ।"

यौ सुणिबेर सूत ज्यू कोनी- "हे शौनक ज्यू! तुमर क्वाठ में भगवानक ल्यी शुद्ध मायाजाव छू, आपूं ल कलयुगक मंखियोंक ल्यी भौते भलि बात पुछि रौ, मैं आज आपूं सबूं कै सबै सिद्धांतोंक निष्कर्ष निकालि हुई काथ सुणौंल, जो मरण- ज्यूनिक डर कै खत्म कर द्यौल, और क्वाठ में भक्ति क दी जगै द्यौंल।"

 सूत ज्यू कौणी- "द्याप्त व्यास ज्यूल जीवों कै मरण- ज्यूनि चक्र बै बचौणक ल्यी और बैकुंठ धाम जाणक ल्यी श्रीमद्भागवत महापुराण काथ लिख रौ, मन कि शुद्धि ल्यी य है बढ़बेर कोई साधन नैं हैं, जब मन्खियांक जन्म जन्मांतर क पुण्य उदय हुणी, तबै यौ भागवत महापुराण शास्त्र सुणन और पढ़न‌‌‌ हुणी मिलौं। अमृत रुपी यौ काथ कै सुणन- पढ़नक बाद सबै जीव आवागमन चक्र बै छुटिबेर मुक्त है जांणी।

य काथ कै उनर च्यल शुकदेव ज्यू क श्री मुख बै मैंल लै सुण रौ, अब मैं आपूं लोगोंन कै श्रीमद्भागवत महापुराण कि कथा सुणौनूं। सबै ध्यानल सुणौं- य काथ सबूं है पैली श्रृंगी ऋषिक श्राप दीणक बाद महाराज परीक्षित कै शुकदेव ज्यूल सात दिन सुणैंछ। 

 यई काथ कै सनकादिक ऋषियोंल देवर्षि नारद ज्यू के सात दिन सुणै और यै कै सुणनैकि विधि बतै।"

इतुक कथा सुणिबेर शौनक ऋषि कुणी- "सूत ज्यू! देवर्षि नारद ज्यू एक जाग द्वी घड़ि बै सकर टैम नै रुक सकन, त देवर्षि नारद ज्यू एक हप्त तक एक जाग कै कसिक टिक गईं? और सनकादिक ऋषियों त दर्शन मिलन बड़ दुर्लभ छू। उं देवर्षि नारद ज्यू कै कसिक मिल गईं? और सबूं है पैलि हप्त भरी यौ पारायण क्वै जाग होछ ? आपूं जरा विस्तारैल हम सबूंकै बतावौ।"

य सुणिबेर सूत ज्यू कोणी-" एक बार सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार चारों भई घुमन- घुमने बद्रीकाश्रम पहुंची त वां उनुल देवर्षि नारद ज्यू कै उदेखी बेर बैठी द्येखौ, उनकें उदेख लागि देख सनकादिक ऋषि कुणी- "हे नारद ज्यू के बात छू? तुम इतुक किलै उदेखी रौछा? ऐल तुम यस मन्खी लागन छा जसिक कि तुमर सबै धन लुटि गै हुन्यौल, तुम जस विरक्त संतक ल्यी य सही बात नै हैं, कै कारण छू हमूकै बतावा?" .......


देवर्षि नारद ज्यू उन चारों ऋषियों है पैलाग कै बेर कुणी, -"हे मुनिश्वरो मैं आपूं लोगों कै आपण उदेखीणक कारण बतौनू। आपूं लोग ध्यानल सुणिया, मैं पुष्कर , प्रयाग, काशि, गया, गोदावरि, जगन्नाथपुरी, हरिद्वार, और ऋषिकेश सबै पवित्र तीर्थ में घुमि बेर ऐ गयूं। मन कै संतोष दिणी वालि शांति मैके कांईं नै मिलि। मैं यौ द्यैखिबेर भौते दुखी है गयूं कि यां जतुक लै मन्खी छैं, सबै मायाजाव में इतुक सकर है फंस रैयीं, उनर उ रूप द्यैख बेर सत्य, दया और धर्म वां बै भागि बेर दूर नै गईं, सबै जीव आपणी परिवार क पालण - पोषणक बार में सोचणौं, सबै जीव आलसी, मंदबुद्धि और भाग्यहीन है गयीं। काम, गुस्स, घमंड, लालच और क्लेशल मन्खी कै कस बेर जकड़ राखौ। उ छल, कपट और झूठ ल आपण जीवन कै चलौणौं, घर में सैणी क राज हैरौ, घरक हर काम में साव कि सलाह ल्यी जाणैं, रूपैं - पैसों क लालच में आदिम आपणी च्यैलि ब्या बुढ़ांक साथ और आपुं है नानि जात में कर दिणौ, बामन रूपै ल्यी बेर वेद पणौंनौ, बामन, ठाकुर, बैश्य, शूद्र कोई लै जातिक लोग आपण धर्मक पालन नैं करनैं। 

घूमने- घामने जब मैं वृंदावन में यमुना नदी क किनार पहुंची, तब मैंल वां एक भौते आश्चर्य चकित नजार द्येखौ, एक ज्वान सैंणी बिहोश हुईं द्वी बुढ़ आदिमों क पास बैठिबेर जोर- जोर ल डाढ़ मारनै छी, वां कै हैरौ हुन्यौल? यौ जाणनाक ल्यी मैं उनर पास गयूं, मैं कै द्यैकते ही उ सैंणी ठाड़ि हैगे, और डाढ़ मारते हुए मैं थै कुणी- "देवर्षि नारद ज्यू! तुम त म्यर फुटी भाग कि कहाणी सुण ल्या, और म्यर चिंता कै खत्म कर द्यिया। तुमरि बातों ल है सकों म्यर दुखी मन शांत है जौ, किलैकि भौत भाग्यल तुमर दर्शन हुनि।"

उ सैंणी क बात सुणि बेर मैंल वी थै पुछौ- "को छा तुम? यौ बिहोश हुईं बुढ़ आदिम को छैं?" म्येरी बात सुणबेर उ सैंणी कुणी- "मैं नौं भक्ति छूं, यौं द्विनों म्यर च्याल छैं।" एक क नौं ज्ञान छौ, दुसरक नौं वैराग्य छौ। और यौ जो द्वि-चार सैंणिन भै रयीं, यौ गंगा- यमुना और बकै नदि छन, यौ सबै म्येरि सेवा करण हुणि म्यर पास ऐ रयीं। लेकिन मैं कै फिर लै शांति नैं हैं।

मैंल द्रविड़ देश में जन्म ल्यी रौ, कर्णाटक में ज्वान हैं यूं, और मैं भौत टैम तक दक्षिण देश महाराष्ट्र में रयूं,  और जब मैं गुजरात आयूं, वां घोर कलयुग और पाखंड ल जड़ फैल रौछी, वां जाईबेर मैं और म्यर च्याल बुढ़ है गईं। लेकिन जसै मैं वृंदावन आयूं, मैं फिर ज्वान है गयूं, अब मैं यौ जाग कै छोड़ि बेर नै जाण चान,, लेकिन म्यर द्विनों च्याल भौत बुढ़ और कमजोर है गईं। बोलण त भौत दूरकि बात हैगै यौ आंख खोलि बेर द्येख लै नैं सकनैं। मैं ज्वान और म्यर च्याल बुढ़! यौ बात ल मैं कैं भौत दुख हैरौ। हे द्याब ज्यू ! मैं ज्वान और म्यर च्याल बुड़ यौ सब कसिक है गौ हुन्यौल? हुन त यौं चैण छी मैं बुढ़ि हुन और म्यर च्याल ज्वान। तुम त  भगवान क भौत ठुल भक्त छा, और तुमु कै ज्ञान लै भौत छौ, मैं कै यैक कारण बतै द्यौ।"

भक्ति रूपकि उ सैंणी बात सुणीबेर देवर्षि नारद ज्यू आपणी ज्ञान और ध्यान लगै बेर कौणीं- "हे भक्ति घोर कलयुग औण पर त्वै में, ज्ञान और वैराग्य में मन्खियोंक जरा लै श्रद्धा भाव नैं हैं, यौइ कारणेंल तुम तीनों इतुक कमजोर है गौछा।

 वृंदावन में आइ बेर तू त ज्वान है गछी,  धन्य छौ यौ वृंदावन धाम। लेकिन त्यर द्विनों च्यलां कै यौ कलयुग में क्वै नैं जाणन। यौइ कारणेंल त्यर द्विनों च्याल इतुक बुढ़ और कमजोर है गईं।"

देवर्षि नारद ज्यू कि बात सुणीबेर भक्ति कौणी- "यदि कलयुग इतुक दुष्ट और पापि छौ त महाराज परीक्षित ज्यूल उकै जिन्द किलै छोड़ी? किलै कि वी पै दया दिखैबेर सबै मन्खियोंक धर्म - कर्म छुटि गौ। यकै त मौत दिण भौते जरूरी छी। भगवान यौ सब अधर्म कसिक द्यैखण लागि रैयी? हे द्याब ज्यू म्येरी शंका दूर करौ।"

भक्ति बात सुणिबेर देवर्षि नारद ज्यू कौणी- "हे भक्ति भगवान श्री कृष्ण जब यौ धरती कै छोडि बेर परमधाम गईं, तबै कलयुग आछ, राजा परीक्षित ल जब जाणौ कि कलयुग में कई अवगुण हुण पारी एक भौत खास गुण छौ, कि दुसर युगों में सैकड़ों वर्षों तक जप, तप, यज्ञ, दान और धर्म करण पर लै मनखी कै भगवान क दर्शन नै है पाछी, लेकिन कलयुग में जो मनखी सच्च मनल कै भगवान क ध्यान करल और नाम जप करल, वी पै भगवान भौत जल्दी खुशि है जाल, और आपण दर्शन द्यी द्याल, यौई कारणैल महाराज परीक्षित ज्यूल कलयुग कै रौण द्यी।

लेकिन दुर्भाग्य यौ छौ कि कलयुग क मन्खी यौ सितिल उपाय लै नै कर सकनैं, किलैकि उनूल धर्म - कर्म सबै छोड़ि हालिं। बामन पुज- पाठ में सकर दान- दक्षिण ल्यी बेर प्रायश्चित नै करणै। यौ कारणेंल पूज- पाठक सार खत्म हैगौ, तीर्थों में नास्तिक और पाखंडी मन्खी ज्यादा रौणीं, यौ कारणैल तीर्थोंक प्रभाव खत्म हैगौ। चित्त में राग-द्वेष रखबेर मन्खी तप करणौं। यौ कारणेल आज तप क सार नैं हैं‌ मन वश में नै हुन पर लालच, पाखंड और घमंड में शास्त्रोंक स्वाध्याय नैं करण पर ध्यान योगक फल लै मिट गौ। 

यौ कलयुग में नाणतिन ईजा- बोज्यूक कै नैं माणनै, सैणीं आपणी मैंसक कै नैं माणनैं, बाबा, साधु-संत गृहस्थी है सकर मायाजाव में बादि रौ, सबै मन्खियोंल सत्य, धर्म, दयाभाव छोड़ि हालौ। और सबै जीव काम, गुस्स, लालच, झगड़- पतड़ में फंसि बेर आपणी यौ जीवन कै काटनौं।

 भक्ति यौई कलयुग क स्वभाव छौ। और भगवान सब  द्यैखण रैंयी और सहन करनैईं।

कलयुग में सबै जीवोंक कर्तव्य छौ उ सत्य और संतोष क साथ आपण धर्म और कर्म में मगन रै बेर भगवान क नाम संकीर्तन-भजन, जप करौ और सबन जीवों पै दया भाव रखौ।

भक्ति कुणी - " देवर्षि नादर ज्यू म्यर अहोभाग्य छै जो आज मैं कैं तुमर दर्शन हुईं, तुमर बातोंल मैं के भौतै शांति मिलि। सही कौणी संसार में साधु-संतोंक दर्शनोंल हमेशा सही दिशा मिलैं और सौभाग्य बढ़ौं। तुमर उपदेश दिण पर प्रहलाद ल मायाजाव पर जीत हासिल करी। ध्रुव कै ध्रुवपद मिलौ। सृष्टि पैद करनि और सबूं क मंगल चाणी ब्रह्मा ज्यूक तुम महान च्याल छा, तुम हमेशा सबूं क दुःख कै दूर कर छा।

म्यर द्विनों हाथ जोडि बेर तुमर खुटा में पैलाग, और मैं विनती करनूं कि तुम मैं कै कोई यस सरल उपाय बतै द्यौ जकै कर बेर म्यर द्विनों च्याल ज्वान है जौ, और‌ म्यर दुःख दूर है जौ।"

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Thursday, 5 February 2026

श्रीमद्भागवत महापुराण कथा: सुख सागर; अध्याय -1 ( भक्ति, ज्ञान और वैराग्य क) कुमाऊनी बोलि में अनुवाद।1

 एक दिन नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक और अठ्टासी हजार बैठि ऋषियोंल वेदव्यास ज्यूक लाडिल शिष्य सूत ज्यू ह्वै कौनी- "द्याब ज्यू ! तुम हमकैं यसि अलौकिक कहानि सुनावा जिमै भक्ति, ज्ञान और वैराग्य क बार में सकर खबर हो, किलै कि आजक यौ कलयुग में सबै प्राणी न में गुस्स, लालच, मायाजाव सकर पाईं जां। यई कारणैल सबै प्राणी आठो पहर दुःख और डरल परेशान छैं, आपुं परमपिता परमेश्वर क यस चरित्र क वर्णन करौ जकै सुणि और पढ़िबेर सबै प्राणीनाक क्वाठक दुख, पीड़ और डर दूर ह्वै जौ और उ परमेश्वर क खुटांन में ध्यान लगैबेर यौ दुःख भरि भवसागर बै पार ह्वै जौ।

यह सुणिबेर सूत ज्यू कोनी-"हे ऋषिवरो ! आपूं लोगों ल कलयुगक मंखियोंक ल्यी भौते भलि बात पुछि रौ, मैं आपूं लोगोंन कै श्रीमद् भागवत महापुराण कि कथा सुणौनूं।

जो कि श्रृंगी ऋषि क श्राप दीणक बाद महाराज परीक्षित कै शुकदेव ज्यूल सात दिन सुणैं छ। 

यौ अमृत रुप में कथा कै सुणन पढ़नक बाद सबै प्रणी आवागमन चक्र बै छुटिबेर मुक्त ह्वै जां। यौई पुराण कै सनकादिक ऋषियों ल द्याप्त नारद ज्यू के सात दिन सुणै और यौ पुराण कै सुणनैकि विधि लै बतै।"

इतुक कथा सुणिबेर शौनकादिक ऋषि कुण लागि- "सूत ज्यू! द्याप्त नारद ज्यू एक जाग द्वी घड़ि से सकर टैम नै रुक सकन, त द्याप्त नारद ज्यू एक हप्त तक एक जाग कै कसिक टिक गईं। और सनकादिक ऋषियों त दर्शन मिलन बड़ दुर्लभ छू। उं द्याप्त नारद ज्यू कै कसिक मिलि और सबूं ह्वे पैलि हप्त भरी यौ पारायण क्वै जाग होछ, आपूं जरा विस्तारै ल हम सबूंकै बतावौ।"

यौ सुणिबेर सूत ज्यू कोणी- एक बार सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार चारों भई घुमन घुमने बद्रीकाश्रम पहुंची त वां उनुल द्याप्त नारद ज्यू कै उदेखी बेर बैठी द्येखौ, उनकें उदेख लागि देख सनकादिक ऋषि कुणी- "ओ नारद ज्यू के बात छू? आपूं इतुक किलै उदेखी रौछा?

द्याप्त नारद ज्यू उन चारों ऋषियों ह्वै पैलाग कै बेर कुणी, -"हे मुनिश्वरो मैं आपूं लोगों कै आपण उदेखीणक कारण बतौनू। आपूं लोग ध्यानल सुणिया, मैं काशि, गया, गोदावरि, जगन्नाथ और ऋषिकेश सबै पवित्र तीर्थ में घुमि बेर ऐ रैयूं। लेकिन मैं यौ द्यैखिबेर दुखी ह्वै गयूं कि यां जतुक लै प्राणी छै सबै मायाजाव में इतुक सकर ह्वै फंस रैयीं, उनर उ रूप द्यैख बेर सत्य, दया और धर्म वां है भागि बेर दूर नै गई, और काम, क्रोध, मद, लोभ और क्लेश आपणी सेना क साथ सबै मंखियां कै डरै धमकै बेर मौज ल राज करनौ। 

सबै मन्खी आठों पहर आपण और आपणी परिवार क पालण - पोषणक बार में सोचण रौं, छल, कपट और झूठ ल आपण जीवन कै चलौणौ। इज- बाज्यू और गुरुनों कि कैं नै मानिबेर सैंणी, सासु- सौर और सावै कि कै मानि बेर काम करनौं, रूपैं - पैसों क लालच में आपणी च्यैलि ब्या बुढ़ांक साथ और आपुं ह्वै नानि जात में कर दिणौ, सबै जाग बामन, ठाकुर, बैश्य, शूद्र कोई लै आपणी धर्मक पालन नै करनै। 

घूमने- घामने जब मैं मथुरा में यमुना नदी क किनार पहुंची, तब मैं ल वां एक भौते आश्चर्य चकित नजार द्येखी, एक जवान सैंणी बिहोश हुईं द्वी बुड़ आदिमों क पास बैठिबेर जोर- जोर ल डाढ़ मारन छी और आपणी सहायता ल्यी बुलौण छी, अचानक उ सैंणी क नजर मैं में पढ़ी त उ ठाड़ि ह्वैगे और मैं थै कुणी- 

आगे पढ़ें.....

"महाराज म्यर अहोभाग्य जो मैं के तुमर दर्शन ह्वै गईं, तुम त म्यर फुटी भाग क कहाणी सुण ल्या। उ सैंणी क बात सुणि बेर मैंल वी थै पुछौ- को छा तुम? यौ बिहोश हुईं बुड़ को छैं? म्येरी बात सुणबेर उ सैंणी कुणी - मैं भक्ति छूं, यौ द्विनों म्यर च्याल छैं, एक क नौ ज्ञान छौ, दुसरक नौ वैराग्य छौ। और यौ जो द्वि-चार सैंणिन भै रयीं, यौं गंगा-यमुना और बकैं नदि छन, यौ सबै म्येरि सेवा करण हुणि म्यर पास ऐ रयीं।

मैंल द्रविड़ देश में जन्म ल्यी रौ, कर्नाटक में ज्वान ह्वैबेर मैं भौत टैम तक दक्षिण देश में रयूं, मैं गुजरात गयूं, वां जाईबेर मैं बुड़ी ह्वै गयूं।

लेकिन जसै मैं वृंदावन आयूं, मैं फिर ज्वान ह्वै गयूं, लेकिन म्यर द्विनों च्याल भौत बुड़ और कमजोर ह्वै गई। बोलण त भौत दूरकि बात ह्वैगै यौ आंख खोलि बेर द्येख लै नै सकनै। मैं ज्वान छौं और म्यर च्याल बुड़, जब यौ दुणी हमर तरफ द्यैखें त मैं कैं भौत शरम लागि जैंछ, और भौते दुख लै हौंछ। हे द्याब ज्यू यौ सब कसिक हो हुन्यौल?"

भक्ति रूपकि उ सैंणी बात सुणीबेर  और भौत सोच विचार बेर मैं ल वी थैं क, हे- "भक्ति घोर कलयुग औण पर त्वै में और ज्ञान और वैराग्य में मन्खियोंक जरा लै श्रद्धा भाव नैहैं, यौइ कारणेंल तुम तीनों इतुक कमजोर ह्वै गछा, वृंदावन में आइ बेर तु त ज्वान ह्वै गछी, लेकिन त्यर द्विनों च्यलां कै यौ कलयुग में क्वै नैं जाणन।यौइ कारणेंल त्यर द्विनों च्याल बुड़ और कमजोर ह्वै ग्यान।"

द्याप्त नारद ज्यू कि बात सुणीबेर भक्ति कौणी- "यदि कलयुग इतुकै दुष्ट और पापि छौ त महाराज परीक्षित ज्यूल उकै जिन्द किलै छोड़ी, किलै कि वी पै दया दिखैबेर सबै मन्खियोंक धर्म - कर्म छुटि गो। यकै त मौत दिण भौते जरूरी छौ।"

भक्ति बात सुणिबेर द्याप्त नारद ज्यू कौणी- " भक्ति यौ कलयुग में कई अवगुण हुण पारी एक भौत खास गुण यौ छौ, कि दुसर युगों में सैकड़ों वर्षों तक जप, तप, यज्ञ, दान और धर्म करण पर लै मनखी कै भगवान क दर्शन नै हौंछी, लेकिन कलयुग में जो मनखी सच्च मनल कै भगवान क ध्यान करल और नाम जपल करल, वी पै भगवान भौत जल्दी खुशि ह्वै जाणी, और आपण दर्शन द्यी दिणी, लेकिन दुर्भाग्य यौ छौ कि कलयुग क मन्खी यौ सितिल उपाय लै नै करणै, किलैकि उनूल धर्म - कर्म सबै छोड़ि हालि। बामन लै सकर दान दक्षिणा ल्यी बैर प्रायश्चित नै करणै। नाणतिन ईजा- बोज्यूक कै नै माणनै, सैणीं आपणी मैंसक कै नै माणनैं, बाबा, साधु-संत गृहस्थी ह्वै सकर मायाजाव में बादि रौ, सबै प्राणी न में सत्य, धर्म, दयाभाव नै ह्वैबेर काम, गुस्स और पाप भौतै बढ़ गो, सबै मन्खियोंक कर्तव्य छौ उ सत्य और संतोष क साथ आपण धर्म और कर्म में मगन रै बेर भगवान क भजन और नाम जप करौ और सबन प्राणीन पै दया भाव रखौ।"

द्याप्त नारद ज्यू कि बात सुणी बेर भक्ति कौणी- "मुनिवर आपूं भौत महान छा। म्यर अहो भाग्य मैं कैं तुमर दर्शन ह्वै गईं, तुम सबूं क दुःख कै दूर कर सकै छा, मैं  तुमर खुटा में पड़ि हाथ जोडि बेर विनती करनूं कि तुम कोई यस सरल उपाय बतै द्यौ जकै कर बेर म्यर द्विनों च्याल ज्वान ह्वै जौ और‌ म्यर दुःख दूर ह्वै जौ।"

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

Wednesday, 4 February 2026

म्येरी बाना: कुमाऊनी गीत।-11

 मुखड़ा मैंस- ओ मेरी.. ओर म्येरी होंसिया बाना, कब तू सुणेली 

मुड़ माथ में घाम चड़ी गो, कब तू उठेली।।


मुखड़ा सैंणी- मोहना बाज्यू घर कै आपण, तुमी संभाला।।

नी करो होइ कचकचा, सासु- सौर सुणला।


१अंतरा: मैंस- चुल भिनेर जगै हालि, भ्यार- भीतेर झाड़ि हालि।

नवाई- धवाई द्यापतनों कै, पुज पाठ लै करि हालि।।

उठ मेरी...उठ म्येरी होंसिया बाना, चाहा बणाली।

मुड़ माथ में घाम चड़ी गो, कब तू सुणैली।।


२- अंतरा: सैंणी- हाय खर्राटा, त्यर खर्राटा, सिति मा त्यर मड़मडाटा।

बैठि- बैठि काट दीछ, मैं ल बेली सारि राता।।

यों नीन क मोहना बाज्यू , तुम छा कारणा।

नी करो होइ कचकचा, सास- सौर सुणला।।


३- अंतरा: मैंस- गोरू बछा कै दौंणी भ्यार, मैं ल सुवा बांधि हालि।

घास- पात गोरू बछा कै, मेरी सुवा द्यी हालि।।

उठ मेरी.. उठ मेरी नारिंगे दांणी, मोऊ खड़ेली।

मुड़ माथ में घाम चड़ी गो, कब तू उठैली।।


४- अंतरा: सैंणी- पी खैबेर रात भरि, तुम नाचण है रौंछा।

सिति बटि लै हाई राम, भरभराट मचौं छा।।

सुधर जावा मोहना बाज्यू, नी पियो शराबा‌।

यौ शराब ल म्येरी ज्यूनि, करि है खराबा।।


५: अंतरा- मैस- सांची सुवा ब्याखुलि बै, नी प्यों ल मैं शराबा। 

तेरी कसमा सारि बोतला, घुरै ओंला दूर भ्योवा।।

उठ.. उठ म्येरी पुन्यू की ज्यूना, कल्यौ बणूं लौ।

भल- भलो भ्यार घाम ऐरो, दगड़ा खौं लौ।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Sunday, 1 February 2026

ज्योति: मेरे सपने जो अधूरे रह गये।: कविता । 34

एक गरीब घर की बेटी हूं मैं, ज्योति है मेरा नाम।

घर की जिम्मेदारी मुझ पर आई करने लगी मैं कंपनी में काम।।


2020 से महामारी और बिमारियों का शोर है 

प्राइवेट नौकरी करने वाले अभी भी बेरोजगार हैं।।


 बाबू जी जब से बेरोजगार हुए, मेरे भी घर के बूरे हाल हुए।

 छोटी सी नौकरी मिलने पर मुझे, मां- बाबू जी निहाल हुए।।


कुछ दिनों में पता चला, कंपनी में होते हैं काले धंधे तमाम।

सोच लिया तब ही मैंने, छोड़ दुंगी यह नौकरी ढूढुंगी दूसरा काम।।


हवसी दरिंदों के बीच आ गई हूं, कतई समझ न पाईं मैं।

दरिंदों की काली दृष्टि से, स्वयं को बचा नहीं पाई मैं।।


रसूखदार हवसी दरिंदों ने, आज बनाया मुझे शिकार। 

रो- रोकर दे रही थी दुहाई मैं, चीख- चीखकर लगा रही थी गुहार।।


ना सुनी किसी ने मेरी फरियाद, और ना सुनी चीख- पुकार ।

समाज के ठेकेदारों ने कर दिया, मेरे जीवन में अंधकार।।


तन, मन और आत्मा की यह पीड़ा, मुझसे सही नहीं जा रही थी।

आंखों में झरझर आंसू, थमने का नाम नहीं ले रही थी।।


हे भगवान! यह सब क्या हो गया?, क्यों मेरी जिंदगी उजड़ गई?

किससे कहूं? कैसे कहूं?, मेरी ये जिंदगी बेमतलब सी हो गई।।


ज्यों ही मां- बाबू जी, भाई- बहनों का चेहरा, आया नजरों के सामने। 

हिम्मत जुटाकर उठी और खाई कसम, हार नहीं मानुंगी इन दरिंदों के सामने।।


इनके सारे काले कारनामे, आज सरेआम करूंगी।

इन हवसी दरिंदों को, मैं सलाखों के पीछे भेजुंगी।।


दर्द- पीड़ा से कराहती और लंगड़ाती, मैं कंपनी से आईं बाहर।

मेरे  स्त्रीत्व का दाम देने लगे, हवसी दरिंदे मुझे धमका कर।।


अब भी निडर होकर, स्वाभिमान से खड़ी थी मैं।

आंखें मिलाकर, दुष्कर्मियों से लड़ रही थी मैं।।


हार नहीं मानी जब मैंने, दरिंदों ने मुझे जिंदा मार दिया। 

अपने कुकृत्यों को ढकने के लिए, मुझे नदी में फेंक दिया।। 


समाज के ठेकेदारों ने, एक गरीब घर की ज्योति को बुझा दिया।

और सोचा अपने दुष्कर्म का हमने, नामों निशान मिटा दिया।।


मेरी इन आंखों ने कई सपने संजोए थे।

गरीब होने पर भी मां-बापू जी मुझे पढ़ा-लिखा रहे थे।।


दरिंदों ने नहीं भरने दी, मेरे सपनों को उड़ान।

 तन, मन और आत्मा को, नोंचकर ले ली मेरी जान।।


क्या कसूर था मेरा, तू ही बता दे ऐ भगवान।

हंसते- खेलते मेरे परिवार को, दुःख दे दिए क्यों तमाम।।


बन गई मेरी कहानी, एक दर्दनाक अफसाना।

जिसे बरसों याद रखेगा, ये सारा जमाना।।


मेरा दर्द, संघर्ष और साहस की, मेरी ये कहानी।

किताबों में मिलेगी, अब मेरी जिंदगी की निशानी।।


मेरे न्याय के लिए, एक दिन आवाज जरूर उठेगी।

न्याय मिलगा तब मुझे, दोषी को मौत की सजा मिलेगी।।


दूसरी ज्योति कोई ना बने, ऐसा शक्त कानून बना दो सरकार।

महिलाएं और बेटियां बेफिक्र जिएं, उन्हें दे दो ये अधिकार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।



Thursday, 29 January 2026

कान्हा: हिंदी कविता।33

कान्हा तेरी लगन लगी, मैं रोई- रोई जाऊं।

वह राह बता दे इसमें चलकर, मैं तुझको पा जाऊं।।

मंदिर- मंदिर तुझको ढूंढूं, कहीं ना तुझको पाऊं।

तेरी सेवा करके कान्हा, मैं तुझको रिझाऊं।।


जानती हूं मैं भी कान्हा, मेरे मन मंदिर में तू बैठा है।

लेकिन मन बावरा फिर भी, तुझको ढूंढने निकला है।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह बाती कैसे बनाऊं।

जिससे मन मंदिर के अंदर, मैं तेरी ज्योति जलाऊं।।


सुना है तेरे नाम सुमिरन से, मैं तुझको पा सकती हूं।

पर! इस गृहस्थ जीवन में, तेरा नाम बिसरा देती हूं।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह भक्ति कैसे जगाऊं।

जिससे माया के बन्धन से, मैं बाहर निकल जाऊं।।


भाव देखेगा इस दासी के, कभी तो कृपा बरसायेगा।

आस का दीप जलाये बैठी हूं, मन- मन्दिर में दर्शन देगा।

मेरे लाडले है ये भरोसा, मेरी सेवा स्वीकार होगी।

इस जन्म में नहीं अगले जन्म में सही, तुझे पाने की मन्नत पूरी होगी।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट। 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सर्वाधिकार सुरक्षित।