Saturday, 7 March 2026

धूप भी अपनी छांव भी अपनी: धारावाहिक।

 एपिसोड 2- अजनबी से मुलाकात।

सुबह गांव में हल्की ठंडी हवा बह रही थी। पहाड़ों पर बादलों का झुंड ऐसे घूम रहा था जैसे किसी ने आसमान पर सफेद रुई बिखेर दी हो।
राधिका आज जल्दी उठ गई थी।
रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी।
बार-बार उसे गांव में आए उस अजनबी आदमी का चेहरा याद आ रहा था, उसे लग रहा था उसने उसे कहीं तो देखा है, लेकिन कहां देखा है यह याद नहीं आ रहा था।
उसकी अजनबी  की आंखों कौन देखकर लग रहा था कि, जैसे वह कुछ ढूंढ रहा हो।
राधिका ने तुलसी के पौधे को पानी दिया और मन ही मन बोली - “पता नहीं, ये दिल इतना बेचैन  क्यों है।”
इतने में देवांश स्कूल जाने के लिए तैयार होकर आ गया।
“मां, आज स्कूल में स्पोर्ट्स प्रैक्टिस है।”
राधिका मुस्कुराई और बोली- "ध्यान से खेलना और ज्यादा थकना मत।”
आदित्य ने मां का हाथ पकड़कर कहा- "मां, तुम तुम चिंता मत करो आपका बेटा बहुत होशियार जो है।”
बच्चे की बात सुनकर राधिका के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल गई। और अचानक उसकी आंखें नम हो गई, फिर  जबरदस्ती हंसते हुए कहने लगी आज देवांश को स्कूल तक मम्मी छोड़ कर आयेगी,, "क्यों! चलें",,क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि उसकी आंखों की नमी बेटे को दिखाई दे।
देवांश झट से बोला, "नहीं मम्मी वो देखो सामने तो स्कूल का गेट है मैं चला जाऊंगा।" और वह स्कूल बच्चों के साथ चला गया।
घर में सन्नाटा छा गया।
आराधना रसोई में काम करने लगी, लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।
दोपहर के करीब गांव के मुखिया का आदमी उसके घर आया।
“बहू, मुखिया जी ने आपको पंचायत घर बुलाया है।”
राधिका हैरान थी-
“मुझे क्यों?”
आदमी ने कहा —
“वह अजनबी आदमी जो सरकारी दफ्तर से आया है आपसे बात करना चाहता है।”
राधिका का दिल जोर से धड़कने लगा।
वह अपने आंचल को ठीक करती हुई पंचायत घर की तरफ चल दी।
गांव की पगडंडी पर चलते हुए उसे राघव  के साथ बिताए हुए सारी बातें याद आने लगीं।
कैसे वह  पहली बार दुल्हन बनकर इस गांव में आई थी,
राघव के साथ उसने कई सपने देखे थे, जिससे उसकी जिंदगी खुशियों से भर जाएगी।
लेकिन समय ने जैसे सब कुछ बदल दिया।
पंचायत घर के बाहर वही अजनबी आदमी खड़ा था।
जैसे ही राधिका वहां पहुंची, वह आदमी उसकी तरफ बढ़ा।
“आप राधिका हैं?”
राधिका ने धीरे से कहा-
“जी! आप कौन हैं?”
आदमी ने गहरी सांस ली और बोला-
“मेरा नाम विनय है। मैं शहर से आया हूँ।”
राधिका चुप रही।
विनय ने आगे कहा —
“मैं राघव के ऑफिस का दोस्त हूं।”
राघव का नाम सुनते ही राधिका का दिल जैसे रुक गया।
“राघव, कैसे हैं वह?” उसने धीरे से पूछा।
विनय की आँखों में एक अजीब सा दर्द आ गया।
“यही बात करने आया हूँ। रोहित पिछले तीन महीनों से परेशान हैं।”
राधिका चौंक गई-
“परेशान? किस बात से?”
विनय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला-
“रोहित पर ऑफिस में धोखाधड़ी का आरोप लगा है।”
राधिका को लगा जैसे जमीन उसके पैरों के नीचे से खिसक गई हो।
“यह, आप क्या कह रहे हैं?”
विनय ने फाइल निकालकर दिखाई।
“मैंने सोचा आपको सच पता होना चाहिए।”
राधिका की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।
राघव!
जिस पर उसने सबसे ज्यादा भरोसा किया था, उसका अपना जीवन साथी जब वह मुसीबत में है तो उसने  राधिका को क्यों नहीं बताया, क्या वह सच में किसी मुसीबत में था?
या फिर यह भी कोई नया रहस्य था?
विनय ने धीरे से कहा-
“रोहित आपसे कुछ छिपा रहे हैं।”
राधिका कुछ बोल नहीं पाई।
उसका मन हजार सवालों से भर गया।
क्या रोहित का बदलता व्यवहार इसी वजह से था?
कि वह किसी बड़ी परेशानी में है?
या फिर कुछ और ही सच छिपा था?
सूरज ढलने लगा था।
गांव के ऊपर लालिमा फैल गई थी।
राधिका ने विनय से कहा, मैं हर मुसीबत में अपने पति के साथ खड़ी हूं। उन्होंने मुझे कुछ भी बताने के काबिल नहीं समझा।
उनसे कहना आप चिंता ना करें, सब ठीक हो जाएगा। और फिर राधिका घर लौट आई। और राघव को काॅल करने लगी और साथ ही घर के आंगन में बैठकर देवांश का इंतज़ार करने लगी, राघव ने काॅल नहीं उठाया।
कुछ देर बाद देवांश स्कूल से लौट आया।
उसने मां को उदास देखा तो पूछा-
“मां, क्या हुआ?”
राधिका मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली-
“कुछ नहीं बेटा।”
लेकिन देवांश समझ गया कि मां कुछ छिपा रही है।
रात को राधिका ने फिर राघव को काॅल लगाया,
कॉल बजता रहा,
लेकिन राघव ने फोन नहीं उठाया। अब राधिका का सब्र का बांध टूट चुका था
राधिका की आंखों में झरझर आंसू बहने लगे। और फिर वह मुंह में कपड़ा ठूंस कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। की घंटे रोने के बाद वह लाचार आंखों से मोबाइल देखने लगी। लेकिन राघव का कोई काॅल नहीं आया। थक-हारकर वह खिड़की के पास बैठ गयी। और खिड़की के बाहर देखने लगी।
आसमान में चांद निकल आया था।
चांद की रोशनी गांव के घरों की छतों पर चुपचाप फैल रही थी।
राधिका ने मन ही मन कहा-
“सच चाहे कितना भी दर्दनाक हो, अब मुझे सच को जानना ही होगा, राघव आखिर क्यों बदल गया, वह कसूरवार है या बेगुनाह, जो भी हो, एक पत्नी होने के नाते इस समय उसका पहला फर्ज है अपने पति के साथ खड़े रहना और उसका साथ देना।”
उसी रात शहर में,
राघव किसी अंधेरे कमरे में बैठा था।
उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।
सामने टेबल पर कई फाइलें पड़ी थीं।
और उसके फोन की स्क्रीन पर राधिका का नाम चमक रहा था।
लेकिन वह फोन उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
क्योंकि सच बहुत भारी था,
और वह अच्छी तरह से जानता था, आने वाले दिनों में यह सच उसके सारे परिवार की जिंदगी को बदल सकता है। और टेंशन में उसने जाने कितनी सिगरेट पी ली, उसे पता ही नहीं था, और वह फिर नई सिगरेट निकालने लगा।
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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


Friday, 6 March 2026

हमारी वास्तविक जीवन यात्रा।- कविता।

7 मार्च 2000 को उत्तराखंड की धरती पर, हमारा गठबंधन हो गया।

प्रेम और विश्वास भरे धागों से, जीवन का नया आंगन सज गया।।


पतिदेव, दुख- सुख की हर डगर पर, हमने हाथ थामकर चलना सीखा।

धैर्य, विश्वास और अपनापन से, जीवन को समझना सीखा।।


जब दुख के बादल गहराए, मन थोड़ा घबराया भी था।

पर आपने बेहद स्नेह से मुझे, गृहस्थ जीवन समझाया था।।


आज हमारे जीवन में, सबसे प्यारी खुशी हमारा बेटा है।

उसकी मुस्कान से घर- आंगन का, हर कोना प्रेम से महकता है।।


पतिदेव, मेरे शब्दों की उड़ान में, आपका स्नेह भरा आकाश मिलता है।

मेरे सपनों का हर दीप, आपके प्रेम से ही जलता- खिलता है।।


जो भी मैं लिख पाती हूं, वह आपका आशीष ही तो होता है।

मेरे हर संकल्प में आपका साथ, जीवन का सच्चा मोती होता है।।


आपको सालगिरह की, हार्दिक मंगलकामनाएं बार- बार।

ईश्वर करे हमारे जीवन में बना रहे, सदा प्रेम, शांति और प्यार।।


धन की चमक जीवन में, भले ही बहुत अधिक न आ पाए।

पतिदेव, प्रेम, सुख और संतोष से, हमारा छोटा संसार भर जाए।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Thursday, 5 March 2026

धूप भी अपनी, छांव भी अपनी। हिंदी धारावाहिक।

 एपिसोड 1- गांव की हवा में बसी खूशबू।

सुबह की हल्की- हल्की धूप पहाड़ों के पीछे से झांक रही थी। गांव की पगडंडी पर ओस की बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे धरती ने रात भर आसमान के आंसू समेट कर रखे हों।
कुनकुनी हवा में पहाड़ी फूलों की खुशबू घुली हुई थी। दूर कहीं से मंदिर की घंटी की आवाज आ रही थी और साथ ही सुनाई दे रहा था मुर्गों का बांग देना।
इसी गांव का नाम था- बोहरा कून गांव।
बोहरा कून गांव छोटा जरूर था, लेकिन यहां के लोगों के दिल बहुत बड़े थे। हर कोई एक-दूसरे के सुख- दुख में शामिल रहता था।
गांव के बीचों- बीच एक पुराना लेकिन सुंदर साफ सुथरा घर था। उसी घर के आंगन में खड़ी थी राधिका, उसकी उम्र बत्तीस साल है, उसने नयन- नक्श बेहद सुंदर हैं, गेरूआ कलर है, लंबे काले बाल हैं, स्वभाव से बेहद सरल और शांत है, उसे देखते ही लगता है कि वह अपनी  सजल आंखों में एक अनजाना सा दर्द छिपाए हुए है।
राधिका सुबह जल्दी उठना पसंद करती थी। प्रातः कालीन बेला में उठकर सर्व प्रथम वह घर में झाड़ू लगाती, गोशाला साफ करती, दूध दूहती, गाय को चारा देती थी, फिर नहा- धोकर सूर्य देव को अर्घ्य देती और तुलसी मां के सामने नियमित दीपक जलाती,  तत्पश्चात बेटे को उठाकर फिर वह नाश्ता बनाने रसोई में चली जाती।
आज भी  सुबह- सुबह नाश्ता बनाकर रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि आवाज आई- “मां मुझे स्कूल जाने में देर हो रही है।”
यह आवाज थी उसके दस साल के बेटे देवांश की।
राधिका मुस्कुराई।
“अरे वाह आज तो बहुत जल्दी तैयार हो गया मेरा राजा बेटा। दो मिनट रुको बेटा, तुम्हारा टिफिन ला रही हूं।”
देवांश बहुत समझदार और शांत बच्चा था। वह अपनी उम्र से ज्यादा होशियार और गंभीर था। कभी-कभी राधिका को लगता था कि उसके  बच्चे की आंखों में भी कुछ अनकहा दर्द बसता है।
राधिका ने टिफिन बैग में रखा और देवांश का माथा चूम लिया। तब तक पास पड़ोस के बच्चे भी आ चुके थे, राधिका ने देवांश से कहा, "मैं स्कूल तक छोड़ दूं क्या?" 

देवांश कहने लगा, "मम्मी दो कदम पर तो स्कूल है, आप चिंता मत करो, मैं भईया लोगों के साथ चला जाऊंगा,"

राधिका मुस्कुराते हुए बोली, "अच्छा बाबा ठीक है, मन लगाकर पढ़ना और किसी से लड़ाई मत करना।”
"अच्छा मां" कहकर देवांश बच्चों के साथ स्कूल के लिए निकल गया। स्कूल घर के पास में ही था। इसलिए देवांश अन्य बच्चों के साथ स्कूल चला जाता था।
घर में अब राधिका अकेली रह गई थी।
उसका घर, जो कभी खुशियों से भरा रहता था, अब सिर्फ यादों की आवाजें लिए खड़ा था।
राधिका की शादी ग्यारह साल पहले गांव के ही एक युवक राघव से हुई थी। राघव शहर में काम करता था। शुरू के कुछ साल सब ठीक रहे, लेकिन धीरे-धीरे रिश्ते में दूरी आने लगी।
राघव कई- कई महीने में घर आता था।
राघव राधिका से पहले बहुत प्यार करता था, लेकिन धीरे-धीरे उसने राधिका से बात करना कम कर दिया, अब तो ज्यातातर चुप ही रहता था, इधर कई महीनों से उन दोनों के बीच में हां- ना के सिवा कोई और बात नहीं हुई थी।


बच्चे पर कोई गलत असर ना पड़े, इसलिए वह राघव से कुछ नहीं कहती थी, लेकिन राघव का धीरे-धीरे बदलता व्यवहार देखकर राधिका अंदर से टूटने  लगी थी, अब अकेलापन धीरे-धीरे उसके दिल में घर करता चला जा रहा था।
आज भी राधिका ने मोबाइल देखा।
उसमें राघव का कोई मैसेज नही था, और नहीं कोई  मिस कॉल पड़ी थी।
उसने हल्की सांस छोड़ी और रसोई की तरफ बढ़ गई।  उसने  उठी रसोई साफ की, बर्तन धोये, कपड़े धोये, पौधों में पानी डाला। वह खुद को घर के काम में व्यस्त रखना चाहती थी, ताकि कोई भी ख्याल उसे कमजोर ना कर सके। घर का सारा काम निपटा कर राधिका ने प्लेट में थोड़ा सा नाश्ता लिया, प्लेट में रखा नाश्ता देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह सिर्फ जीने के लिए खा रही है, और नाश्ता करते समय वह राघव के बदलते व्यवहार के सवाल जवाबों में फिर घिर गई।
राधिका जब भी घर में बाहर निकलती, गांव की औरतें अक्सर कहते हुए मिल जाती थीं-
“राधिका बहू बहुत सहनशील है तू।”
लेकिन किसी को नहीं पता था कि सहनशीलता के पीछे कितना तूफान छिपा है।
आज दोपहर होते- होते गांव के चौक में हलचल बढ़ गई।
आज गांव में पंचायत की बैठक थी।
गांव के मुखिया ने घोषणा की थी कि गांव में एक नई योजना आने वाली है जिससे किसानों की मदद होगी। राधिका को जब यह बात पता चली थी, तब उसने भी सोचा था कि  पंचायत की बैठक में वह भी जायेंगी, किसानों की मदद के लिए जो नई योजना आ रही है उसकी जानकारी वह भी लेगी इसलिए राधिका भी पंचायत में गई।
चौक पर बैठी बूढ़ी दादी कमला देवी ने राधिका का हाथ पकड़ लिया।
“बहू, तू इतनी दुबली क्यों होती जा रही है? ठीक से खाया कर।”
राधिका मुस्कुराई-
“दादी, मैं ठीक हूं।”
कमला देवी ने उसकी आंखों में देखा और धीरे से कहा-
“झूठ मत बोल बहू। आंखें सब सच बता देती हैं।”
राधिका चुप हो गई।
उसी समय दूर से एक गाड़ी गांव में दाखिल हुई।
गाड़ी से उतरा एक आदमी, शहर का लगता था। काला कोट, हाथ में फाइल, और चेहरे पर गंभीरता।
गांव के मुखिया उसके साथ बात करने लगे।
राधिका को पता नहीं क्यों उस आदमी को देखकर अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। मीटिंग में 4 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला, शाम होने को लगी थी,
सूरज पहाड़ों के पीछे छिपने लगा और आसमान नारंगी रंग में रंग गया। तेज कदमों से राधिका घर आई, उसने देखा देवांश स्कूल से घर पहुंचा ही था। उसने चैन की एक लंबी सांस ली, देवांश को अपनी बाहों में लेकर उसे लाड़ लड़ाने लगी, देवांश को अपनी ममता की छांव देते समय उसे याद आया- शादी के शुरुआती दिन,,,,
राघव का प्यार,
उसके साथ गांव की पगडंडियों पर घूमना,
और सपनों की बातें करना।
लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया।
राधिका यादों के  बंधन से बाहर निकली, फिर अपने रोजमर्रा के काम में जुट गई। रात को सारा काम निपटा कर जब वह देवांश को सुलाने लगी। देवांश ने राधिका से पूछा-
“मां, क्या पापा हमसे प्यार नहीं करते?”
राधिका का दिल कांप गया।
उसने बेटे को गले लगा लिया-
“ऐसा नहीं बोलते बेटा। पापा बस काम में व्यस्त रहते हैं।”
लेकिन उसके शब्द खुद उसके दिल को ही झूठ लग रहे थे।
रात बहुत शांत थी। लेकिन राधिका के मन के अंदर बहुत शोर हो रहा था।
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।
राधिका खिड़की के पास खड़ी थी।
उसकी आंखों में आंसू नहीं थे,
बस एक गहरा सन्नाटा था।
उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला है जो उसके रिश्तों की सच्चाई सामने लाएगा।
गांव में आया हुआ वह अजनबी आदमी,
और राघव का अचानक बदलता व्यवहार,
इन सबके बीच छिपा था एक रहस्य, जो राधिका की जिंदगी बदलने वाला था।
लेकिन अभी कहानी शुरू हुई है
अभी तो रिश्तों की असली परीक्षा बाकी है।...


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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


Friday, 27 February 2026

होली: रंगों का त्योहार। कविता।

फाल्गुन के महीने में, हवा बाँहें फैलाए जब आती है।

धरती पर रंगों की, चादर सी बिछ जाती है।।


पास और दूर के सभी यार, जाने और अनजाने परिवार।

सब मिलकर मनाते हैं, होली में रंगों का यह खूबसूरत त्योहार।।


होली में, गुलाल के बादल, छाते हैं आसमान में।

मस्ती की लहरें, दौड़ती हैं सबके मनों में।।


ढोलक की थाप पर, डीजे की धुन पर, थिरकते सबके पाँव।

खुशियों से भर जाए जीवन, सखी शहर हो या गाँव।।


पीले गुलाल में दिखे मुझे, सूरज का मधुर दुलार।

हरे रंग में झलके सखी, धरती का असीम उपकार।।


लाल रंग छूते ही, जागे हृदय में नव-ओज।

रग- रग में रोमांच उठे, सखी मिट जाए हर संकोच।।


होली में, भाभी करती हँसी- ठिठोली, देवर करते शरारत।

बुजुर्ग देते हैं आशीर्वाद तो, घर में आती है बरकत।।


जब ठंडाई की मिठास, होठों पर घुल जाती है।

सखी, पुरानी सारी रंजिशें, दिल से निकल जाती हैं।।


होली में, बच्चों की किलकारियां, गूँजती चहुं दिसाओं ओर।

होली है भाई होली है, मच जाए गली- गली में शोर।।


होली में, एक ही रंग में, रंग जाता है सारा संसार।

भेद- भाव सब मिट जाए, सिर्फ प्रेम बने आधार।।


फागुन आया है सखी, फिर नई उम्मीदें लेकर।

खिलखिला, गले लगे लगा, सभी सखियों को बाहों में भरकर।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Thursday, 26 February 2026

प्रवास में पहाड़। कविता। 38

अक्सर मन की दहलीज़ पर एक सपना दस्तक देता था, हम सब प्रवासी मिलकर एक संसार बसाएँ।
इस परदेस की अपरिचित गलियों में, अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू फिर से महकाएँ।।

सोचा था ! क्यों न दूर वादियों की स्मृतियों को, दिलों के आँगन में उतार लें।
क्यों न इस अजनबी शहर में, अपना सा एक छोटा उत्तराखंड सँवार लें।।

बिखरे चेहरों में अपनापन खोजा, संकोच की दीवारें धीरे-धीरे गिराईं।
उत्रैणी–मक्रैणी के पावन अवसर पर, मिलन की दीपशिखाएँ जगमगाईं।।

ढूँढ-ढूँढ कर सबको जोड़ा, स्नेह के धागों में विश्वास पिरोया।
बोली भले अलग-अलग थी, पर हर हृदय ने पहाड़ों का प्रेम संजोया।।

धीरे-धीरे मुस्कानों ने रिश्तों को आकार दिया, विश्वास ने जड़ों को गहरा किया।
एक छोटे से मंच से आरंभ हुआ सफ़र, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में नव इतिहास रच दिया।।

हाँ, राह में मतभेद भी आए, कुछ क्षणों ने मन को डगमगाया।
पर हमने साहस की ज्योति थामे रखी, हर तूफ़ान को हँसकर अपनाया।।

जीवन ने सिखाया, दुख की छाया में भी सुख का सूरज छिपा होता है।
बस धैर्य से ढूँढो तो, हर अँधेरा उजाले में बदला होता है।।

अब हौसलों के पंख लगाकर, आकाश को छूना है।
दोस्तों का हाथ थामे, साथ-साथ आगे बढ़ना है।।

इस परदेस की धरती पर, अपनत्व का दीप जलाना है।
अपने इस मिनी उत्तराखंड को, एक सजीव परिवार बनाना है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।