फाल्गुन के महीने में, हवा बाँहें फैलाए जब आती है।
धरती पर रंगों की, चादर सी बिछ जाती है।।
पास और दूर के सभी यार, जाने और अनजाने परिवार।
सब मिलकर मनाते हैं, होली में रंगों का यह खूबसूरत त्योहार।।
होली में, गुलाल के बादल, छाते हैं आसमान में।
मस्ती की लहरें, दौड़ती हैं सबके मनों में।।
ढोलक की थाप पर, डीजे की धुन पर, थिरकते सबके पाँव।
खुशियों से भर जाए जीवन, सखी शहर हो या गाँव।।
पीले गुलाल में दिखे मुझे, सूरज का मधुर दुलार।
हरे रंग में झलके सखी, धरती का असीम उपकार।।
लाल रंग छूते ही, जागे हृदय में नव-ओज।
रग- रग में रोमांच उठे, सखी मिट जाए हर संकोच।।
होली में, भाभी करती हँसी- ठिठोली, देवर करते शरारत।
बुजुर्ग देते हैं आशीर्वाद तो, घर में आती है बरकत।।
जब ठंडाई की मिठास, होठों पर घुल जाती है।
सखी, पुरानी सारी रंजिशें, दिल से निकल जाती हैं।।
होली में, बच्चों की किलकारियां, गूँजती चहुं दिसाओं ओर।
होली है भाई होली है, मच जाए गली- गली में शोर।।
होली में, एक ही रंग में, रंग जाता है सारा संसार।
भेद- भाव सब मिट जाए, सिर्फ प्रेम बने आधार।।
फागुन आया है सखी, फिर नई उम्मीदें लेकर।
खिलखिला, गले लगे लगा, सभी सखियों को बाहों में भरकर।।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।