Friday, 20 February 2026

मेरे प्रेरणा स्रोत व्यक्तित्व: आलेख।

 मेरे आदर्श और प्रेरणास्त्रोत मेरे माता-पिता हैं। मेरा जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में हुआ है। मैं एक किसान की बेटी हूं। जब भी किसी को मैं अपना परिचय देती हूं कि मैं एक किसान की बेटी हूं, तो मुझे स्वयं पर बहुत गर्व होता है।,,,,,,

हम पांच भाई बहन हैं। १९९८ में मेरे पिताजी का देहान्त हो गया था। उसके बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी मेरी माताजी के कंधों में आ गई। मेरी माता जी ने बहुत मेहनत और लगन से हम बच्चों की परवरिश की। और हम बच्चों को कभी भी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।,,,,,
मुझे आज भी याद है, मेरे माता-पिता दोपहर की प्रचंड धूप में भी खेतों में काम करते रहते थे; चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियां क्यों ना हो जाय, मेरे माता-पिता के चेहरे में कभी भी उदासी नजर नहीं आती थी, और नहीं कभी चिड़चिड़ापन दिखाई देता था। मेरे माता-पिता हम भाई-बहनों की शिक्षा का बहुत ध्यान रखते थे। आज से २२-२३ साल पहले गांवों में लड़कियों के लिए १२वी कक्षा से बाद अपनी शिक्षा को जारी रखना बहुत मुश्किल काम था। क्योंकि तब साधन सीमित थे! और महाविद्यालय बहुत दूर थे। मैं पढ़ने में बहुत होशियार थी; तो मेरे माता-पिता ने मेरी पढ़ाई में आने वाली परेशानी को ही दूर कर दिया। वो मेरे लिए एक साइकिल खरीद कर ले लाए, और तब मैं अपने गांव की पहली लड़की थी, जो महाविद्यालय में पढ़ने गईं। मेरे माता-पिता ने मुझे स्नातकोत्तर तक की उच्च शिक्षा प्रदान की।,,,,,,
आज भी गांवों में कई लोग पुरानी विचारधारा के हैं। वो अक्सर अपनी लड़कियों को बहुत सारे कायदों- कानून और नियमों में बांध देते हैं। हमारे माता-पिता ने हम पर कभी भी कोई बंदिशें नहीं थोपी। उन्होंने हमसे कभी नहीं कहा कि तुम एक लड़की हो, तुम ऐसा मत करो, वैसा मत करो। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ।,,,,,
पिताजी के देहांत के बाद भी हमारी माता जी ने हम बहनों को हर कार्य में दक्ष और निपुण बनाया। और हमें स्वाभिमान से जीना सिखाया।,,,,,,,
मेरे माताजी और पिताजी अक्सर कहते थे। "जीवन में हमेशा कर्मप्रधान बनो। कभी भी किसी के बारे में बुरा मत सोचो। अपने हर सपने को पूरा करने की हर संभव कोशिश करो। यदि तन-मन से मेहनत करोगे तो एक दिन सफलता अवश्य ही तुम्हारे कदम चूमेगी"।,,,,
जीवन में आने वाले संघर्षों और चुनौतियों का सामना करना मैंने अपने माता-पिता से ही सीखा है, और उन्हीं के परवरिश और संस्कार की वजह से आज मैं एक सफल और कुशल गृहणी हूं, और अपने परिवार जनों की बेहद प्रिय हूं। साथ ही मैं बच्चों को सिलाई सिखाती हूं। और आज मैं एक आत्म-निर्भर महिला भी हूं। 


स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।


हमूकै बुलौनी पहाड़ा: कुमाऊनी गीत

 सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।२

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।२


भीमताला, सात ताला, और नौंकुची ताला,

ताल मा बतख तैरणी, और तैरणी नौका।

हिसालू, किल्माड़, खुमानि क, कैसि छै रे बहारा।।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा...ओ बैंणां।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा, कै भल छाजिरौ पहाड़ा।।


सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


नैनीताले की नैना देवी, हरिद्वारे की गंगा,

अल्मोड़ा का चितई- गोलू, धारी की मैया।

छाया- दाया सबैं देवों की, हमेरी पहाड़ा।।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा...ओ बैंणां।

हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा, म्येंरो सजीलो पहाड़ा।।


सुंण लै, सूंणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


बद्रीनाथा, केदारनाथा, और अमरनाथा,

संत, देवी, देव रौनी, धन्य हमर भागा।

चारों धामा घुमि औंनूं, टेकि औंनूं माथा।। 

गंगोत्री, यमुनोत्री...ओ बैणा।

गंगोत्री, यमुनोत्री, की डुबकी करेली उद्धारा।।


सुंण लै, सूणीं लै अनीता, सुंण, हमूं कैं बुलौंणीं पहाड़ा।

निराई लागीगे छा, हिट बैंणां आपणीं पहाड़ा।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट;

गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी: (हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड)।

सर्वाधिकार सुरक्षित।



Tuesday, 10 February 2026

उद्देश्य: कुमाऊनी कविता। -१३

आपणी  संस्कृति कै आघिन पीढ़ी तक पहुचौंण में, 

मैं आपणी योगदान द्यूं, बस म्यर यई उद्देश्य छू,


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

बाग: कविता। - 35

 बागान बनाना आसान नहीं होता,

रंग-बिरंगे फूलों का संगम लाना पड़ता है।

पल्लवित करने में है जद्दोजहद करनी,

हर कदम पर झंझावातों का सामना करना पड़ता है।।


लेकिन जब फूल खिलते हैं बागान में,

सारे झंझावात भूल जाता है माली।

हर पौधे की अपनी है एक कहानी सुहानी,

कोई पौधा सेवा मांगे, कोई पौधा खुश होता देख हवा- पानी।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Monday, 9 February 2026

अंकिता: मैं च्यैलि पहाड़कि। कुमाऊनी- कविता। 12

उत्तराखंड कि मैं च्येलि छूं, अंकिता छू म्यर नाम।

आपणी घर चलौण कै, मैं करनूं एक रिजाॅट में काम।।


कोरोना कालक य टैंम छौ, महामारीक प्रकोप छन।

प्राइवेट नौकरी करनण वाल, आज सबै बेरोजगार छन।।


जब बै बाज्यू बेरोजगार हुईं, हम खाणक ल्यी मोहताज हुईं।

आपण बाज्यूक हाथ बटौण हुणि, मैं काम ढूंढण निकल गईं।।


एक रिजॉर्ट में म्येरी नौकरी लागि, इजा- बाज्यू कै थ्वाड़ सकून मिली।

घर- परिवार कै चलूण हुणि, उनुकै कुछ राहत मिली।।

 

थ्वाड़ दिंनों में मैकै पत्त लागौ, रिजाॅट में काव धंध तमाम हुणि।

सोचि! जसै दूणिय कै इनर करतूत बतूंल, उं म्येरी ज्यानक दुश्मन बणि।।


दरिंदोंल मैं कै मारबेर, चिल्ला नहर में फैंक गईं।।

उनुकैं लागो रिजाॅटक, काव धंध पर्द में छिप गईं।। 


दुश्मणौंल म्यर स्वीणों कै, नैं भरन द्यी उड़ान।

जीवन भरिक दुःख द्यी हालि, म्यर परिवार कै तमाम।।


कै कसूर छी म्यर? तुमी बता द्यौ हे! भगवान।

मैं एक चेली छूं! गरीब छूं, क्या? यैक करौ मैंल भुकतान।।


बन गै आज य अंकिता, पहाड़ क एक दर्दनाक कहानि।

अब किताबों में मिलेलि, म्येरी जिंदगीक निशानि।।


पहाड़ों में मैंकैं न्याय दिलौंण हुणि, कबै त आवाज उठेलि।

न्याय मिलल मैं कै तबै, जब दोषिन कै मौतेंक सजा मिलेलि।।


दुसरि अंकिता क्वै चेलि नै बणों, क्वै विधान शक्त बणै द्यौ सरकार।। ‌

च्यैलि, सैंणियां बेखौफ जी सकौ, उन्हां द्यी द्यौ य अधिकार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा, बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।