मंगलवार, 28 जुलाई 2026

बिल्ली रानी-बाल कविता।

बहुत दिनों से थी तमन्ना,

एक नन्ही बिल्ली घर लाऊं।

काली, धवल या चितकबरी,

जी भर उस पर प्यार लुटाऊं।।


गांव- गांव में ढूंढ़ा मैंने,

नन्ही बिल्ली नहीं मिली।

मोबाइल पर जब खोजा मैंने, 

तब एक पर्शियन बिल्ली मिली।।


नीली- नीली उसकी आंखें,

मखमल जैसे कोमल बाल।

राजकुमारी जैसी लगती,

 उसकी प्यारी मतवाली चाल।।


रोटी- दूध उसे न भाता,

पेडिग्री ही उसे सुहाती।

अपने प्यारे नन्हे घर में,

रानी बनकर वह इठलाती।।


कभी गेंद के पीछे दौड़े,

कभी परछाईं से टकराए।

उसकी शैतानी देख- देख कर,

सबके चेहरे पर मुस्काए।।


धीरे- धीरे कदम बढ़ाकर,

वह मेरी गोदी में आती।

नन्हे- नन्हे कोमल पंजों से,

मन का सारा प्यार जताती।।


म्याऊं- म्याऊं करती जब आती,

घर में खुशियां नई जगाती।

उसकी नन्ही- सी अठखेलियां,

सबके मन को खूब लुभाती।।


स्वरचित- मं

जू बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।


मंगलवार, 21 जुलाई 2026

चेहरों के पीछे- हिंदी कविता।

चारों ओर मुखौटों का मेला,

सच का चेहरा लाचार है।

दिखावे की चकाचौंध में,

हर संवेदना बीमार है।।


भोले मन को मूर्ख समझना,

अब जग की पहचान हुई।

चापलूसी के ऊंचे सिंहासन,

मेहनत फिर उपेक्षित हुई।।


छल- प्रपंच की आंधी ऐसी,

विश्वास बिखर- बिखर जाता है।

मित्रों के ही बदले चेहरे,

मन को भीतर तक छल जाता है।।


रिश्तों की चौखट पर देखो,

स्वार्थ का पहरा गहरा है।

हर मुस्कान के पीछे जैसे,

कोई छिपा अंधेरा है।।


मेहनत का मूल्य कहां मिलता,

झूठ यहां सम्मानित है।

मक्खन बाजी के दरबारों में,

सत्य सदा तिरस्कृत है।।


फिर भी मन से हार न मानो,

सत्य कभी मरता नहीं।

मुखौटों के इस संसार में,

ईमान कभी झुकता नहीं।।


स्वरचित- मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सोमवार, 20 जुलाई 2026

श्रीमद्भगवद्गीता- अथ प्रथमोऽध्याय:

 ॐ श्री परमात्मने नमः 

श्रीमद्भगवद्गीता 

अथ प्रथमोऽध्याय:

धृतराष्ट्र उवाच 

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। 

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ १

हिंदी भावार्थ- धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्र और पाण्डु के पुत्र क्या कर रहे हैं? 

कुमाऊनी में अर्थ- रज धृतराष्ट्र संजय ह्वै पूछनयी- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में लड़ैं करनैं ल्यी इकठ्ठ ह्वै रयी म्यर और पाण्डुक च्यल कै करनैई?

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

 गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

समीक्षा 

धृतराष्टृ संजय थें पुछण रईं, हे संजय धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध करणैकि इच्छा लिहबैर एकठ्ठ हई म्यर च्याल और पांडु च्याल के करणईं ? 


रविवार, 19 जुलाई 2026

सपने का बोझ: एक मां की स्वीकारोक्ति। संस्मरण।

शादी के 3- 4 साल बाद मैं गाजियाबाद में शिफ्ट हो गई, मेरे पति की सैलरी सीमित थी, तो हम जनता से फ्लैट में रहते थे। मेरे सामने वाले घर में  उत्तराखंड से राजेश सिंह रावत जी का परिवार रहता था। उनकी पत्नी का नाम रमा था, और उनका एक प्यारा सा बेटा था। राजेश जी मेरे पति के दफ्तर में इलैक्ट्रिशियन थे। उनकी आय सीमित थी, लेकिन  उनकी पत्नी केे सपनों की कोई सीमा नहीं थी। हर मां की तरह रमा भी इच्छा थी कि उसका बेटा वह सब पाए जो उसे कभी नहीं मिला। उसे विश्वास था कि यदि उसे शहर के सबसे प्रतिष्ठित विद्यालय में पढ़ा देगी, तो उसका भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल हो जाएगा। और उसने राजेश से लड़ झगड़ कर अपने बेटे का दाखिला दिल्ली पब्लिक स्कूल में करा दिया।

उस विश्वास ने मुझे दिन- रात सिलाई मशीन के सामने बैठा दिया। मशीन की सुई केवल कपड़े नहीं सीती थी, वह मेरे सपनों को भी जोड़ती चली जाती थी। देर रात तक चलती मशीन की घरघराहट में मुझे अपने बेटे का सुनहरा भविष्य सुनाई देता था। 

धीरे- धीरे घर का हर महीना फीस की तारीख के इर्द- गिर्द सिमटने लगा। हमारी छोटी- छोटी खुशियां घूमना-फिरना, अपनी इच्छाएं, त्योहारों की सहज मुस्कान सब कुछ उस एक बार फीस की रसीद के नीचे दबता चला गया। हम जी तो रहे थे, लेकिन खुलकर नहीं जी पा रहे थे।

मेरा बेटा पढ़ाई में औसत था। वह अपनी क्षमता भर प्रयास करता था, लेकिन मेरी अपेक्षाएं उसकी क्षमता से कहीं बड़ी थीं। जब भी उसके अंक कम आते, मैं उसकी कापी नहीं देखती थी, उसकी मेहनत भी नहीं देखती थी। मुझे केवल वह भारी फीस दिखाई देती थी, जिसे भरने के लिए हमने अपने जीवन की अनेक आवश्यकताओं का त्याग किया था।

मैं उसे बार- बार यही कहती, "इतने महंगे स्कूल में पढ़ रहे हो, इतना पैसा खर्च हो रहा है, अभी मन लगाकर नहीं पढ़ते, नंबर देखो जरा अपने, किसी को बता भी नहीं सकते, लोग क्या कहेंगे?"

मैं आज सोचती हूं, मैं उसे पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर रही थी, बल्कि अनजाने में उसके मन पर अपराधबोध का बोझ रख रही थी। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि हर बच्चे की अपनी बौद्धिक क्षमता होती है। जो जितना कर सकता है, वह उतना ही करेगा। अपेक्षाएं प्रेरणा बनें तो सुंदर होती हैं, लेकिन जब वे तुलना और दबाव बन जाएं, तो बच्चे का आत्मविश्वास धीरे- धीरे टूटने लगता है।

एक घटना आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है, मानो वह कल ही घटित हुई हो। उस समय मेरा बेटा लगभग सात- आठ वर्ष का था। रविवार का दिन था। पतिदेव ओवरटाइम के कारण आफिस चले गए थे। घर के सभी काम निपटाकर मैं नहाने के लिए बाथरूम में गई।

अभी कुछ ही समय बीता था कि अचानक बाहर से बाथरूम का दरवाज़ा बंद हो गया।  मैंने बेटे को आवाज दी, "बेटा शुभम! दरवाज़ा खोलो।" परंतु उधर से कोई उत्तर नहीं आया।

मैंने फिर पुकारा। कभी प्यार से तो कभी गुस्से से पुकारा, कभी घबराकर रूंवासी आवाज में पुकारा। और साथ ही किसी अनहोनी के डर से मेरी बेचैनी भी बढ़ रही थी। किंतु आश्चर्य! न कोई उत्तर मिला, न कोई आहट सुनाई दी। बड़ी मुश्किल से लगभग आधे घंटे के आसपास उसने दरवाज़ा खोला। बाहर निकलते ही मैंने उसके कान जोर से खींचे और कहा, "तुम्हारी शरारतें  तो दिन- प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। आज तुम बाहर खेलने नहीं जाओगे। सिर्फ पढ़ाई करोगे। मैंने दंडस्वरूप उसे जबरन पढ़ने बैठा दिया और स्वयं अपनी सिलाई मशीन पर जाकर काम में लग गई। उस समय मुझे लगा कि बात यहीं समाप्त हो गई है

लेकिन आज, वर्षों बाद, जब उस घटना को याद करती हूं, तो समझ में आता है कि वह शरारत नहीं थी। वह एक छोटे से बच्चे का मौन विद्रोह था। उसके भीतर जमा हुआ आक्रोश, जिसे वह शब्दों में नहीं कह सकता था, उसने उसी तरह व्यक्त किया।

उस दिन मेरा बेटा मुझे बाथरूम में बंद नहीं कर रहा था; वह शायद उन शब्दों का प्रतिरोध कर रहा था, जिनसे मैं रोज उसके मन को बंद कर रही थी।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सर्वाधिकार सुरक्षित।

संघर्ष से सृजन तक- एक सांस्कृतिक यात्रा: संस्मरण।

जीवन की कुछ घटनाएं समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि स्मृतियों के आकाश में और अधिक उजली हो जाती हैं। वे केवल बीते हुए दिनों की कहानी नहीं होती, बल्कि हमारे व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिला बन जाती हैं। यह संस्मरण भी मेरे जीवन के ऐसे ही एक अनुभव की कहानी है, जिसने मुझे सिखाया कि समाज सेवा का मार्ग जितना सुंदर दिखाई देता है, उतना ही कठिन भी होता है।

2024 में गाजियाबाद RNE में जब उत्तराखंड समाज की नई संस्था का गठन हुआ। उस समय उत्तराखंड समाज का वातावरण पूरी तरह सहज नहीं था। हमारी सोसाइटी सहित अनेक सोसायटी के उत्तराखंडी परिवार उस संस्था से नाराज़ थे। नाराज़गी का कारण भी उचित था। जिन वरिष्ठ लोगों ने वर्षों की मेहनत, और संघर्ष से उस संस्था की नींव रखी थी, संस्था बनते ही उन्हें किनारे कर दिया गया। स्वाभाविक था कि उनके मन में पीड़ा थी और उनके साथ जुड़े लोगों के मन में भी असंतोष था।

मैं भी इस परिस्थिति से अनजान नहीं थी। मेरे मन में भी प्रश्न थे, कुछ खिन्नता भी थी। परंतु मेरे भीतर एक दूसरी आवाज़ भी थी, जो कहती थी, "यदि उत्तराखंड के नाम पर कोई सकारात्मक पहल हो रही है, तो उसे सफल बनाने में अपना योगदान अवश्य देना चाहिए।, व्यक्ति से बड़ा समाज होता है और समाज से बड़ी संस्कृति।" 

मेरे लिए सौभाग्य की बात यह थी कि सांस्कृतिक कार्यक्रम की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मैंने सभी व्यक्तिगत मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए यह दायित्व सहर्ष स्वीकार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि अपने कई परिचित उत्तराखंडी परिवारों की नाराज़गी भी मुझे सहनी पड़ी।

संस्था के प्रथम सांस्कृतिक महोत्सव की तैयारियों में मैंने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उत्तराखंड के बच्चों व महिलाओं को खोज- खोजकर एकत्रित किया, उन्हें मंच के लिए तैयार किया, अभ्यास करवाया, कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में सहयोग दिया। दिन और रात का भान ही नहीं रहा। जब मुझे बताया गया कि कार्यक्रम का मंच संचालन भी मुझे करना है, तो मैंने उसकी भी पूरी तैयारी की। मन में केवल एक ही इच्छा थी कि पहला कार्यक्रम इतना सफल हो कि लोगों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति नया विश्वास जागे।

कार्यक्रम का दिन आया। सभागार लोगों से भरा हुआ था। बच्चों का उत्साह, महिलाओं की भागीदारी और लोक संस्कृति की रंगत देखकर मन प्रसन्न था। लेकिन मंच पर पहुंचने का मेरा अनुभव वैसा नहीं रहा, जैसा मैंने सोचा था। माइक तभी मेरे हाथ में आता, जब मैं स्वयं निवेदन करती। उस समय मन को चोट तो लगी, लेकिन मैंने उसे अपने कर्तव्य के आड़े नहीं आने दिया। जितना भी मंच संचालन मुझे मिला मैंने पूरे मन से किया और कार्यक्रम अत्यंत सफल रहा।

कार्यक्रम समाप्त हुआ। सभी के योगदान की प्रशंसा हुई, अनेक लोगों का नाम लेकर धन्यवाद दिया गया। किन्तु अंत तक मेरे योगदान का एक शब्द भी किसी की ओर से नहीं आया। उस क्षण भीतर जैसे कोई गहरी खामोशी उतर आई। मुझे सम्मान की लालसा नहीं थी, लेकिन अपने श्रम की पूर्ण उपेक्षा ने मन को बहुत आहत किया।

कुछ समय बाद मैंने सोचा कि शिकायतों में समय नष्ट करने से बेहतर है कि एक नया रास्ता बनाया जाए।  कुछ समान सोच रखने वाली महिलाओं के साथ मैंने एक नया सांस्कृतिक समूह बनाया। हमारा उद्देश्य केवल कार्यक्रम करना नहीं था, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, लोक परंपराओं और मातृभाषाओं को निःस्वार्थ नई पीढ़ी तक पहुंचाना था। हमने उत्तराखंड के लोक पर्व हरेला, उत्रैणी और होली पर्व पूरे उत्साह से मनाने शुरू किए। धीरे-धीरे महिलाएं जुड़ने लगीं और समाज में अपनापन बढ़ने लगा। और एक  सांस्कृतिक समूह तैयार हो गया। हमने अपने समूह का नाम रखा "उत्तराखंड मातृशक्ति ग्रुप।"

किन्तु जहां केवल महिलाएं होती हैं, वहां भी समय- समय पर मतभेद जन्म ले लेते हैं। धीरे- धीरे कुछ महिलाओं के बीच राजनीति और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ने लगी। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि कुछ साथी मेरे विरोध में खड़ी हो गईं। यहां तक कहा जाने लगा कि मैं गढ़वाल की अपेक्षा कुमाऊं को अधिक महत्व देती हूं, जबकि मेरा उद्देश्य सदैव सम्पूर्ण उत्तराखंड की संस्कृति को समान सम्मान देना रहा है।

लगभग दस वर्ष पूर्व हमने राजनगर एक्सटेंशन में उत्तराखंड की महिलाओं को खोज- खोजकर एक व्हाट्सऐप समूह बनाया था। उसी समूह के माध्यम से हम सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का संचालन करते थे। एक दिन अचानक मुझे और मेरे साथियों को उस समूह के एडमिन पद से हटा दिया गया तथा हमारे सभी अधिकार समाप्त कर दिए गए। यह घटना मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक थी, क्योंकि मेरा सम्पूर्ण कार्य इस बात का साक्षी था कि मैंने सदैव पूरे उत्तराखंड को एक परिवार मानकर ही कार्य किया है।

इन घटनाओं ने मुझे दुखी अवश्य किया, पर मेरे संकल्प को डिगा नहीं सकीं। 

पुराने समूह में हम साथ तो रह रहे थे लेकिन स्वच्छंद रूप से कुछ काम नहीं कर पा रहे थे। अंततः हमने एक नया समूह बनाया, जिसका नाम रखा- "उत्तराखंड मातृशक्ति ग्रुप RNE। "उस समूह में हमने कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा सिखाने का नियमित अभियान प्रारम्भ किया।

कुछ महिलाओं ने ग्रुप को भी समाप्त करने का भरपूर प्रयास किया, इस बार मैंने यह निश्चय कर लिया कि अब मैं अपने उत्तर का माध्यम विवाद नहीं, बल्कि अपना कार्य बनाऊंगी। आज उसी समूह में मैं पूरे मन से गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा सिखाने का कार्य कर रही हूं।

मेरा विश्वास है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी स्मृतियों और हमारी संस्कृति की आत्मा है। उत्तराखंड मातृशक्ति ग्रुप RNE की कुछ समर्पित महिलाएं आज भी मेरी शक्ति बनकर मेरे साथ खड़ी हैं और मातृभाषा के प्रचार- प्रसार में पूर्ण सहयोग दे रही हैं।

अब मैं  जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो किसी के प्रति मेरे मन में कटुता नहीं है। जिन्होंने मुझे ठेस पहुंचाई, उन्होंने अनजाने में मुझे समाज के लिए काम करने के लिए और अधिक प्रेरित किया है। यदि वे परिस्थितियां न आतीं, तो शायद मैं अपना यह स्वतंत्र सांस्कृतिक परिवार कभी खड़ा ही न कर पाती।

आज मेरा विश्वास पहले से कहीं अधिक दृढ़ है कि समाज सेवा का मार्ग सम्मान पाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को जीवित रखने के लिए चुना जाता है। 

आलोचनाएं आती रहेंगी, मतभेद जन्म लेते रहेंगे और कुछ लोग साथ छोड़ते भी रहेंगे, पर यदि मन में समाज और संस्कृति की निस्वार्थ सेवा का भाव हो, तो समय अंततः उसी के पक्ष में साक्षी बनकर खड़ा होता है।

मैं आज भी उसी विश्वास के साथ आगे बढ़ रही हूं, मैं किसी व्यक्ति के लिए नहीं, मैं उत्तराखंड की बोलि- भाषा और संस्कृति के लिए कल भी समर्पित थी, आज भी हूं और आगे भी रहूंगी।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।