उत्तराखंड की मैं बेटी हूं, अंकिता है मेरा नाम।
घर की जिम्मेदारी उठाने हेतु मैं ढूंढने निकली काम।।
कोरोना काल का समय है महामारी का खौफ भी है।
प्राइवेट नौकरी करने वाले आज सभी बेरोजगार हैं।।
पापा जब से हुए बेरोजगार, घर के हुए बूरे हाल।
रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी पाकर पापा को किया निहाल।।
कुछ ही दिनों में पता चला रिजाॅट में होते हैं काले धंधे तमाम।
पर्दा फाश करने की ठानी तो बेइमान हाथों ने ले ली मेरी जान।।
मेरी आंखों ने संजोए थे कई सपने।
और कई सपने बुन रहे थे मेरे अपने।।
दरिंदों ने नहीं भरने दी मेरे सपनों को उड़ान।
बन गई दर्दनाक कहानी चली गई मेरी जान।।
क्या कसूर था मेरा तू ही बता दे ऐ भगवान।
हंसते खेलते मेरे परिवार को बना दिया शमशान।।
बन गई मेरी कहानी, एक दर्दनाक अफसाना।
जिसे बरसों याद रखेगा सारा जमाना।।
मेरी मुस्कान, संघर्ष और साहस की कहानी।
किताबों में मिलेगी, मेंरी जिंदगी की निशानी।।
पहाड़ों में मेरे लिए उठेगी जब आवाज।
न्याय मिल कर रहेगा दोषी होगा बदहवास।।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।