Thursday, 9 April 2026

बारीश का कहर: कविता।

 बसंत ऋतु जा रही है, और ग्रीष्म ऋतु आ रही है 

किसान के खेत में गेंहू की फसल, सोना बन लहरा रही है।।


गेहूं की हर बाली में, किसान का सपना सज रहा है।

देख- देखकर उसका मन, रोमांचित हो रहा है।।


साल भर की उसकी मेहनत, अब खुशियां लाने वाली हैं।

सपना सजा है उसकी आंखों में, वह पूरी होने वाली हैं।।


आज अचानक! मौसम बदलने से, एक अनहोनी हो गई।

बादल गरजे, बिजली चमकी, और बेमौसम बारसात हो गई।।


शाम ढले, जो गेहूं खड़ा था गर्व से, वो औंधे मुंह लटक रहा है।

काटकर बधां हुआ गेंहू, पानी में पड़ा रो रहा है।।


किसान खड़ा खेत में अपने, उसकी आंखों में बस पानी है।

साल भर की मेहनत बर्बाद देखकर, छाई जीवन में वीरानी है।।


हे बादल! तू क्यों बरसा आज, खुशियां आने वाली थी मेरे द्वार।

छीनी तूने मेरी खुशियां, देख! बेबस है आज मेरा परिवार।।


ना कोई सुनता दर्द किसान का, ना कोई पूछे उसका हाल।

बस चुपचाप वो सहता जाए, कुदरत के जख्म सहता हर साल।।


ये बारिश नहीं कहर है, जो किसान पर टूट पड़ा है।

जो सबको रोटी देता है, वो गेहूं के खेत में उदास खड़ा है।।


कुदरत तेरी मार से, अगर यूं ही अन्नदाता रोएगा।

तो कैसे देश पल्लवित होगा!, और कैसे आगे बढ़ेगा!!


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Tuesday, 7 April 2026

मुनिया का सपना - कविता। 43

मेरे घर के सामने बस्ती में रहता था, कालूराम का परिवार।  

'पत्नी भूरी और बेटी मुनिया थे', 'उसके संसार'।।


शिक्षा से, अनभिज्ञ थे दोनों।

मेहनत- मजदूरी, करते थे दोनों।।


बस्ती से कुछ ही बच्चे, स्कूल जाते थे।

बाकी बच्चे डोलते- फिरते, और खेलते रहते थे।।


अपनी सोसाइटी से कपड़े इकट्ठे कर, मैं अक्सर बस्ती में जाती।

महिलाओं और बच्चों को, शिक्षा का महत्व समझाती।।


छोटी- छोटी बच्चियों को, गुड टच- बैड टच का अंतर समझाती।

इसलिए बस्ती की महिलाएं और बच्चियां, टीचर दीदी कहकर बुलाती।।


उन बच्चों में, मुनिया मुझे बेहद प्रिय थी।

क्योंकि उसे, पढ़ने की बड़ी ललक थी।।


मुनिया हमेशा स्कूल जाते, बच्चों को देखती।

काश! "मैं भी स्कूल जाती," वह अक्सर सोचती।।


भूरी से मुनिया कहती, "मां मुझे भी स्कूल जाना है।"

भूरी कहती, "बेटी स्कूल जाकर क्या करना है?"


 "बड़ी होकर तूने, चूल्हा- चौका करना है।"

 "और शादी हो जाने पर, अपना घर संभालना है।।"


मां की बातें सुनकर मुनिया का, कोमल मन टूटता था।

पर स्कूल जाने का, उसका सपना हमेशा जिंदा रहता था।।


मजदूरी से लौटकर शाम को, सभी मजदूर इकट्ठे होते।

कच्ची देशी शराब पीकर, आपस में लड़ते- भिड़ते।।


पड़ोस के गुनेमू चाचा, कालूराम के घर आते- जाते।

मीठी- मीठी बातें करके, अपनापन जताते रहते।।


कभी वो कुरकुरे लाते, कभी टॉफियां लाते।

और आकर मुनिया से, खूब सारा लाड़- लड़ाते।।


एक दिन मुनिया घर में, अकेले ही खेल रही थी।

दुनिया से वो, बिल्कुल ही बेखबर थी।।


रोजाना की भांति, गुनेमू चाचा घर पर आये।

मुनिया को अकेली देख, कुकृत्य के कीड़े कुलबुलाये।।


बोले! चल मुनिया बेटा, तुझे आइसक्रीम खिलाऊंगा।

संग में एक चटपटा सा, कुरकरा भी दिलाऊंगा।।


छुपा हुआ था, धोखा उसकी बातों में।

विकृत मानसिकता छुपाई थी, शांत चेहरे में।।


आइसक्रीम- कुरकुरे दिलाकर, मुनिया को अपने घर ले गया।

गोद में बैठाकर नन्ही मासूम को, वह कुकृत्य को तैयार हुआ।।


गुनेमू चाचा के छूने पर, मुनिया को असहज महसूस हुआ। 

देखते ही देखते गुनेमू चाचा, राक्षस सा प्रतीत हुआ।।


मुनिया को झट से, टीचर दीदी की बात याद आ गई।

गुनेमू चाचा की हरकतें गंदी हैं, यह बात उसके समझ में आ गई।।


“कोई भी छुए, अगर गलत तरीके से।

तो मना करना है, दूर रहना हर हाल में।।”


तभी “अंकल छोड़ो मुझे,” मुनिया चिल्लाई।

मम्मी- पापा बचाओ मुझे, उसने पूरी ताकत से आवाज लगाई।।


सुन मुनिया की आवाज, पास- पड़ोसी दौड़ कर आए।

गुनेमू चाचा की हरकत देखकर, सभी लोग स्तब्ध हुए।।


मुनिया ने रो- रोकर, सारा हाल बताया।

पड़ोसियों ने पुलिस बुलाकर, गुनेमू चाचा को अरेस्ट कराया।।


सुनी खबर कालू- भूरी ने, वो बेतहाशा घर को दौड़े।

कोई अनहोनी ना हो प्रभु, दोनों ने हाथ जोड़े।।


देख मुनिया को भूरी ने, अपने सीने से चिपका लिया।

सकुशल देख बिटिया को, कालू ने प्रभु का धन्यवाद किया।।


कालू- भूरी को मुनिया ने, गनेमू चाचा की सारी करतूत बताई।

टीचर दीदी की बात याद आने पर, खुद को कैसे बचाया बात दोहराई।।


कालू- भूरी अन्य सभी अब, शिक्षा का महत्व समझ गये।

अगले दिन ही मुनिया और अन्य बच्चों को, स्कूल में दाखिला के लिए ले गये।।


मुनिया और बच्चे गये, पहली बार स्कूल के द्वार।

खुल गया सभी बच्चों का, ज्ञान का सुंदर संसार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

Thursday, 19 March 2026

मां दुर्गा के नौ रूप नारी का स्वरूप।42

 हिंदू नववर्ष की पहली सुबह, नव आशा का प्रकाश।

मां दुर्गा के चरणों में झुका, हर मन का विश्वास।।


नवरात्रि का स्वागत, शक्ति का संचार।

हर मन हो जागृत, हर सपना हो साकार।।


शंख- घंटों की गूंज में, आस्था का आह्वान।

हर घर- मंदिरों में हो रहा, शक्ति का पावन गान।।


नारी स्वयं है शक्ति, नारी में स्नेह अपार।

मां दुर्गा का स्वरूप, यही जगत का आधार।।


शैलपुत्री सी अडिग है, हर नारी की पहचान।

संघर्षों की राह में, रखती अटल सम्मान।।


ब्रह्मचारिणी सा तप है, उसके हर विचार में।

अपने सपनों को सींचती वह, अपनों के सत्कार में।।


चंद्रघंटा सी निर्भीक, जब अन्याय से लड़े।

अपनी ही शक्ति से, हर भय को दूर करे।।


कूष्मांडा सी सृजन करे, जीवन करे उजियार।

अंधियारे को हराकर, रच दे नया संसार।।


स्कंदमाता सी ममता, आंचल में वो सजाए।

संस्कारों के दीप, घर- परिवार में वो जगाए।।


कात्यायनी सी साहसी, अन्याय को हराती।

रूढ़ियों- बेड़ियों से मुक्त होकर, वह आगे बढ़ती जाती।।


कालरात्रि सी प्रचंड, जब विपदा आए पास।

डरकर नहीं झुकती, बन जाती है प्रकाश।।


महागौरी सी कोमल, मन में प्रेम अपार।

सरलता में बसता है, उसका सच्चा संसार।।


सिद्धिदात्री सा वरदान, हर रूप में समाई।

नारी ही तो शक्ति है, जग ने यह सच्चाई पाई।।


नवरात्रि का यह पर्व, केवल पूजा नहीं मानो।

नारी के सम्मान का, यह सजीव रूप है पहचानो।।


हर घर की दीपशिखा, हर आंगन की शान।

नारी से ही सजे, यह सारा हिंदुस्तान।।


भक्ति में है शक्ति, और शक्ति में नारी।

यही सृष्टि का सत्य, यही जग की फुलवारी।।


आओ मिलकर करें, नारी का सदा सम्मान।

हर नारी में दुर्गा बसी है, मन की आंखों से पहचान।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Sunday, 15 March 2026

फूलदेई: कविता।41

जब मेरे पहाड़ों में बसंत आता है,

धरती का कण- कण मुस्काता है।

डालियों पर सजे रंग- बिरंगे फूल,

खुशियों की मधुर बहार ले आता है।।


नन्हे-नन्हे हाथों में फूलों की टोकरी लेकर, 

जब बच्चे देहलीज पर आते हैं।

“फूल देई, छम्मा देई” गाते हुए,

हर आंगन को आशीष दे जाते हैं।।


देहलीज पर बिखरे वो नन्हे-नन्हे फूल,

सिर्फ फूल नहीं, स्नेह से भरे अनमोल फूल।

इनमें छिपा रहता है अपनापन और प्यार,

दुआओं की गर्माहट, मेरे पहाड़ का सत्कार।। 


छोटे- छोटे बच्चों की मासूम हंसी में, 

 मेरे पहाड़ की सादगी बसती है।

उनकी चमकती आंखों में, 

नई उम्मीदों की रोशनी दिखती है।।


फूलदेई का यह प्यारा त्योहार,

देहलीज पर बिखेरता खुशियों की बहार।

सिर्फ फूल ही नहीं बरसाता हर द्वार,

दिलों में प्रेम जगाता, रिश्तों में घोलता मिठास अपार।। 


जैसे! मंजू बसंत की नरम हवा, 

थके हुए मन को सहला जाती है।

वैसे ही फूलदेई हर दिल में फिर से, 

खुशियों की कोपलें खिला जाती हैं।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।



Saturday, 7 March 2026

धूप छाँव के रिश्ते: धारावाहिक।

एपिसोड 3 – “दिल की उलझन”

गांव में सुबह की धूप फैली हुई थी, लेकिन राधिका के दिल में आज भी रात का अंधेरा ही छाया हुआ था।

रात भर वह ठीक से सो नहीं पाई थी।

राघव का फोन न उठाना,

विनय की बातें,

और मन में उठते हजार सवाल!

राधिका ने आंगन में बैठकर चाय का कप हाथ में लिया।

तभी आदित्य उसके पास आकर बैठ गया।

“मा, तुम फिर से उदास लग रही हो।”

बच्चे की बात सुनकर राधिका हल्का मुस्कुराई-

“नहीं बेटा, बस थोड़ा सिर दर्द है।”

आदित्य ने मासूमियत से कहा-

“मां, अगर पापा हमें छोड़कर चले गए तो?”

यह सवाल राधिका के दिल में तीर की तरह लगा।

वह कुछ देर चुप रही।

फिर बेटे का हाथ पकड़कर बोली-

“ऐसा कभी मत सोचना।”

लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।

उस दिन गांव में हाट लगा था।

राधिका कुछ सब्जियाँ खरीदने हाट की तरफ चली गई।

वहां उसकी मुलाकात कमला दादी से हुई।

कमला दादी ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।

“बहू, तू बहुत परेशान लग रही है।”

राधिका ने झूठी मुस्कान दी-

“नहीं दादी, मैं ठीक हूं।”

दादी ने धीरे से कहा-

“सच छिपाने की कोशिश मत कर। दर्द अंदर ही अंदर बढ़ जाता है।”

राधिका चुप रही।

उसी समय उसे दूर से वही अजनबी आदमी विनय दिखा।

विनय उसके पास आया।

“मैंने सोचा था कि आप मुझसे फिर बात करेंगी।”

राधिका ने कहा-

“मैं क्या पूछूं?”

विनय कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला-

“रोहित पर लगा आरोप बहुत गंभीर है। अगर सच सामने आया तो उनका नौकरी से जाना तय है।”

राधिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“लेकिन ! राघव ऐसा नहीं कर सकते,” उसने धीरे से कहा।

विनय ने गहरी नजर से उसकी तरफ देखा —

“कभी-कभी हम जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं… वही हमें सबसे ज्यादा चोट देते हैं।”

यह सुनकर राधिका की आंखें भर आईं।

वह बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

घर पहुंचकर उसने दरवाजा बंद कर लिया।

उसके हाथ काँप रहे थे।

वह सोचने लगी-

क्या राघव सच में कुछ छिपा रहे हैं?

अगर राघव दोषी निकले तो?

आदित्य का क्या होगा?

उसका अपना भविष्य क्या होगा?

शाम होने लगी थी।

गाँव की पहाड़ी के पीछे सूरज छिप रहा था।

तभी अचानक घर के बाहर एक गाड़ी रुकी।

राधिका बाहर आई।...

आगे पढ़ें...

स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट,

 गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।