Monday, 9 February 2026

अंकिता: मैं च्यैलि पहाड़कि। कुमाऊनी- कविता। 12

उत्तराखंड कि मैं च्येलि छूं, अंकिता छू म्यर नाम।

आपणी घर चलौण कै, मैं करनूं एक रिजाॅट में काम।।


कोरोना कालक य टैंम छौ, महामारीक प्रकोप छन।

प्राइवेट नौकरी करनण वाल, आज सबै बेरोजगार छन।।


जब बै बाज्यू बेरोजगार हुईं, हम खाणक ल्यी मोहताज हुईं।

आपण बाज्यूक हाथ बटौण हुणि, मैं काम ढूंढण निकल गईं।।


एक रिजॉर्ट में म्येरी नौकरी लागि, इजा- बाज्यू कै थ्वाड़ सकून मिली।

घर- परिवार कै चलूण हुणि, उनुकै कुछ राहत मिली।।

 

थ्वाड़ दिंनों में मैकै पत्त लागौ, रिजाॅट में काव धंध तमाम हुणि।

सोचि! जसै दूणिय कै इनर करतूत बतूंल, उं म्येरी ज्यानक दुश्मन बणि।।


दरिंदोंल मैं कै मारबेर, चिल्ला नहर में फैंक गईं।।

उनुकैं लागो रिजाॅटक, काव धंध पर्द में छिप गईं।। 


दुश्मणौंल म्यर स्वीणों कै, नैं भरन द्यी उड़ान।

जीवन भरिक दुःख द्यी हालि, म्यर परिवार कै तमाम।।


कै कसूर छी म्यर? तुमी बता द्यौ हे! भगवान।

मैं एक चेली छूं! गरीब छूं, क्या? यैक करौ मैंल भुकतान।।


बन गै आज य अंकिता, पहाड़ क एक दर्दनाक कहानि।

अब किताबों में मिलेलि, म्येरी जिंदगीक निशानि।।


पहाड़ों में मैंकैं न्याय दिलौंण हुणि, कबै त आवाज उठेलि।

न्याय मिलल मैं कै तबै, जब दोषिन कै मौतेंक सजा मिलेलि।।


दुसरि अंकिता क्वै चेलि नै बणों, क्वै विधान शक्त बणै द्यौ सरकार।। ‌

च्यैलि, सैंणियां बेखौफ जी सकौ, उन्हां द्यी द्यौ य अधिकार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा, बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Friday, 6 February 2026

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य: अध्याय १: देवर्षि नारद ज्यू कि भक्ति दगड़ भेंट। (अनुवाद: कुमाऊनी बोलि)1

एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकक ऋषिल वेदव्यास ज्यूक लाडिल शिष्य सूत ज्यू थै पैलाग कै बैर उन्हा है कौणी- "द्याब ज्यू ! तुमर ज्ञान अज्ञान रूपी अंयार कै खत्म कर दिणी वाल करोड़ों सूर्यक समान छौ, आज तुम हम सबूंकै अमृत रूपी, सारगर्भित एक काथ सुनावौ। हम सबै मन्खी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ल कसिक आपणी बुद्धि कै शुद्ध करौं? वैष्णव लोग यौ मायाजाव बै कसिक आपणी पिण्ड छुणौनी? आजक य कलयुग में सबै जीव राक्षस स्वभावक है गयीं, मन्खी में गुस्स, लालच, मायाजाव सकर पाईं जांणौ।

 आपुं हमूं कै कोई यस शाश्वत उपाय  बतावौ जो पवित्र है पवित्र, कल्याणकारी हो, जो हमूकै श्री कृष्णक प्राप्ति करै द्यौ। और उ उपायल कै सबै जीवों क क्वाठक दुख, पीड़ और डर दूर है जौ, और उ भगवान में ध्यान लगैबेर य दुःख भरि भवसागर बै पार है जौ।"

यौ सुणिबेर सूत ज्यू कोनी- "हे शौनक ज्यू! तुमर क्वाठ में भगवानक ल्यी शुद्ध मायाजाव छू, आपूं ल कलयुगक मंखियोंक ल्यी भौते भलि बात पुछि रौ, मैं आज आपूं सबूं कै सबै सिद्धांतोंक निष्कर्ष निकालि हुई काथ सुणौंल, जो मरण- ज्यूनिक डर कै खत्म कर द्यौल, और क्वाठ में भक्ति क दी जगै द्यौंल।"

 सूत ज्यू कौणी- "द्याप्त व्यास ज्यूल जीवों कै मरण- ज्यूनि चक्र बै बचौणक ल्यी और बैकुंठ धाम जाणक ल्यी श्रीमद्भागवत महापुराण काथ लिख रौ, मन कि शुद्धि ल्यी य है बढ़बेर कोई साधन नैं हैं, जब मन्खियांक जन्म जन्मांतर क पुण्य उदय हुणी, तबै यौ भागवत महापुराण शास्त्र सुणन और पढ़न‌‌‌ हुणी मिलौं। अमृत रुपी यौ काथ कै सुणन- पढ़नक बाद सबै जीव आवागमन चक्र बै छुटिबेर मुक्त है जांणी।

य काथ कै उनर च्यल शुकदेव ज्यू क श्री मुख बै मैंल लै सुण रौ, अब मैं आपूं लोगोंन कै श्रीमद्भागवत महापुराण कि कथा सुणौनूं। सबै ध्यानल सुणौं- य काथ सबूं है पैली श्रृंगी ऋषिक श्राप दीणक बाद महाराज परीक्षित कै शुकदेव ज्यूल सात दिन सुणैंछ। 

 यई काथ कै सनकादिक ऋषियोंल देवर्षि नारद ज्यू के सात दिन सुणै और यै कै सुणनैकि विधि बतै।"

इतुक कथा सुणिबेर शौनक ऋषि कुणी- "सूत ज्यू! देवर्षि नारद ज्यू एक जाग द्वी घड़ि बै सकर टैम नै रुक सकन, त देवर्षि नारद ज्यू एक हप्त तक एक जाग कै कसिक टिक गईं? और सनकादिक ऋषियों त दर्शन मिलन बड़ दुर्लभ छू। उं देवर्षि नारद ज्यू कै कसिक मिल गईं? और सबूं है पैलि हप्त भरी यौ पारायण क्वै जाग होछ ? आपूं जरा विस्तारैल हम सबूंकै बतावौ।"

य सुणिबेर सूत ज्यू कोणी-" एक बार सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार चारों भई घुमन- घुमने बद्रीकाश्रम पहुंची त वां उनुल देवर्षि नारद ज्यू कै उदेखी बेर बैठी द्येखौ, उनकें उदेख लागि देख सनकादिक ऋषि कुणी- "हे नारद ज्यू के बात छू? तुम इतुक किलै उदेखी रौछा? ऐल तुम यस मन्खी लागन छा जसिक कि तुमर सबै धन लुटि गै हुन्यौल, तुम जस विरक्त संतक ल्यी य सही बात नै हैं, कै कारण छू हमूकै बतावा?" .......


देवर्षि नारद ज्यू उन चारों ऋषियों है पैलाग कै बेर कुणी, -"हे मुनिश्वरो मैं आपूं लोगों कै आपण उदेखीणक कारण बतौनू। आपूं लोग ध्यानल सुणिया, मैं पुष्कर , प्रयाग, काशि, गया, गोदावरि, जगन्नाथपुरी, हरिद्वार, और ऋषिकेश सबै पवित्र तीर्थ में घुमि बेर ऐ गयूं। मन कै संतोष दिणी वालि शांति मैके कांईं नै मिलि। मैं यौ द्यैखिबेर भौते दुखी है गयूं कि यां जतुक लै मन्खी छैं, सबै मायाजाव में इतुक सकर है फंस रैयीं, उनर उ रूप द्यैख बेर सत्य, दया और धर्म वां बै भागि बेर दूर नै गईं, सबै जीव आपणी परिवार क पालण - पोषणक बार में सोचणौं, सबै जीव आलसी, मंदबुद्धि और भाग्यहीन है गयीं। काम, गुस्स, घमंड, लालच और क्लेशल मन्खी कै कस बेर जकड़ राखौ। उ छल, कपट और झूठ ल आपण जीवन कै चलौणौं, घर में सैणी क राज हैरौ, घरक हर काम में साव कि सलाह ल्यी जाणैं, रूपैं - पैसों क लालच में आदिम आपणी च्यैलि ब्या बुढ़ांक साथ और आपुं है नानि जात में कर दिणौ, बामन रूपै ल्यी बेर वेद पणौंनौ, बामन, ठाकुर, बैश्य, शूद्र कोई लै जातिक लोग आपण धर्मक पालन नैं करनैं। 

घूमने- घामने जब मैं वृंदावन में यमुना नदी क किनार पहुंची, तब मैंल वां एक भौते आश्चर्य चकित नजार द्येखौ, एक ज्वान सैंणी बिहोश हुईं द्वी बुढ़ आदिमों क पास बैठिबेर जोर- जोर ल डाढ़ मारनै छी, वां कै हैरौ हुन्यौल? यौ जाणनाक ल्यी मैं उनर पास गयूं, मैं कै द्यैकते ही उ सैंणी ठाड़ि हैगे, और डाढ़ मारते हुए मैं थै कुणी- "देवर्षि नारद ज्यू! तुम त म्यर फुटी भाग कि कहाणी सुण ल्या, और म्यर चिंता कै खत्म कर द्यिया। तुमरि बातों ल है सकों म्यर दुखी मन शांत है जौ, किलैकि भौत भाग्यल तुमर दर्शन हुनि।"

उ सैंणी क बात सुणि बेर मैंल वी थै पुछौ- "को छा तुम? यौ बिहोश हुईं बुढ़ आदिम को छैं?" म्येरी बात सुणबेर उ सैंणी कुणी- "मैं नौं भक्ति छूं, यौं द्विनों म्यर च्याल छैं।" एक क नौं ज्ञान छौ, दुसरक नौं वैराग्य छौ। और यौ जो द्वि-चार सैंणिन भै रयीं, यौ गंगा- यमुना और बकै नदि छन, यौ सबै म्येरि सेवा करण हुणि म्यर पास ऐ रयीं। लेकिन मैं कै फिर लै शांति नैं हैं।

मैंल द्रविड़ देश में जन्म ल्यी रौ, कर्णाटक में ज्वान हैं यूं, और मैं भौत टैम तक दक्षिण देश महाराष्ट्र में रयूं,  और जब मैं गुजरात आयूं, वां घोर कलयुग और पाखंड ल जड़ फैल रौछी, वां जाईबेर मैं और म्यर च्याल बुढ़ है गईं। लेकिन जसै मैं वृंदावन आयूं, मैं फिर ज्वान है गयूं, अब मैं यौ जाग कै छोड़ि बेर नै जाण चान,, लेकिन म्यर द्विनों च्याल भौत बुढ़ और कमजोर है गईं। बोलण त भौत दूरकि बात हैगै यौ आंख खोलि बेर द्येख लै नैं सकनैं। मैं ज्वान और म्यर च्याल बुढ़! यौ बात ल मैं कैं भौत दुख हैरौ। हे द्याब ज्यू ! मैं ज्वान और म्यर च्याल बुड़ यौ सब कसिक है गौ हुन्यौल? हुन त यौं चैण छी मैं बुढ़ि हुन और म्यर च्याल ज्वान। तुम त  भगवान क भौत ठुल भक्त छा, और तुमु कै ज्ञान लै भौत छौ, मैं कै यैक कारण बतै द्यौ।"

भक्ति रूपकि उ सैंणी बात सुणीबेर देवर्षि नारद ज्यू आपणी ज्ञान और ध्यान लगै बेर कौणीं- "हे भक्ति घोर कलयुग औण पर त्वै में, ज्ञान और वैराग्य में मन्खियोंक जरा लै श्रद्धा भाव नैं हैं, यौइ कारणेंल तुम तीनों इतुक कमजोर है गौछा।

 वृंदावन में आइ बेर तू त ज्वान है गछी,  धन्य छौ यौ वृंदावन धाम। लेकिन त्यर द्विनों च्यलां कै यौ कलयुग में क्वै नैं जाणन। यौइ कारणेंल त्यर द्विनों च्याल इतुक बुढ़ और कमजोर है गईं।"

देवर्षि नारद ज्यू कि बात सुणीबेर भक्ति कौणी- "यदि कलयुग इतुक दुष्ट और पापि छौ त महाराज परीक्षित ज्यूल उकै जिन्द किलै छोड़ी? किलै कि वी पै दया दिखैबेर सबै मन्खियोंक धर्म - कर्म छुटि गौ। यकै त मौत दिण भौते जरूरी छी। भगवान यौ सब अधर्म कसिक द्यैखण लागि रैयी? हे द्याब ज्यू म्येरी शंका दूर करौ।"

भक्ति बात सुणिबेर देवर्षि नारद ज्यू कौणी- "हे भक्ति भगवान श्री कृष्ण जब यौ धरती कै छोडि बेर परमधाम गईं, तबै कलयुग आछ, राजा परीक्षित ल जब जाणौ कि कलयुग में कई अवगुण हुण पारी एक भौत खास गुण छौ, कि दुसर युगों में सैकड़ों वर्षों तक जप, तप, यज्ञ, दान और धर्म करण पर लै मनखी कै भगवान क दर्शन नै है पाछी, लेकिन कलयुग में जो मनखी सच्च मनल कै भगवान क ध्यान करल और नाम जप करल, वी पै भगवान भौत जल्दी खुशि है जाल, और आपण दर्शन द्यी द्याल, यौई कारणैल महाराज परीक्षित ज्यूल कलयुग कै रौण द्यी।

लेकिन दुर्भाग्य यौ छौ कि कलयुग क मन्खी यौ सितिल उपाय लै नै कर सकनैं, किलैकि उनूल धर्म - कर्म सबै छोड़ि हालिं। बामन पुज- पाठ में सकर दान- दक्षिण ल्यी बेर प्रायश्चित नै करणै। यौ कारणेंल पूज- पाठक सार खत्म हैगौ, तीर्थों में नास्तिक और पाखंडी मन्खी ज्यादा रौणीं, यौ कारणैल तीर्थोंक प्रभाव खत्म हैगौ। चित्त में राग-द्वेष रखबेर मन्खी तप करणौं। यौ कारणेल आज तप क सार नैं हैं‌ मन वश में नै हुन पर लालच, पाखंड और घमंड में शास्त्रोंक स्वाध्याय नैं करण पर ध्यान योगक फल लै मिट गौ। 

यौ कलयुग में नाणतिन ईजा- बोज्यूक कै नैं माणनै, सैणीं आपणी मैंसक कै नैं माणनैं, बाबा, साधु-संत गृहस्थी है सकर मायाजाव में बादि रौ, सबै मन्खियोंल सत्य, धर्म, दयाभाव छोड़ि हालौ। और सबै जीव काम, गुस्स, लालच, झगड़- पतड़ में फंसि बेर आपणी यौ जीवन कै काटनौं।

 भक्ति यौई कलयुग क स्वभाव छौ। और भगवान सब  द्यैखण रैंयी और सहन करनैईं।

कलयुग में सबै जीवोंक कर्तव्य छौ उ सत्य और संतोष क साथ आपण धर्म और कर्म में मगन रै बेर भगवान क नाम संकीर्तन-भजन, जप करौ और सबन जीवों पै दया भाव रखौ।

भक्ति कुणी - " देवर्षि नादर ज्यू म्यर अहोभाग्य छै जो आज मैं कैं तुमर दर्शन हुईं, तुमर बातोंल मैं के भौतै शांति मिलि। सही कौणी संसार में साधु-संतोंक दर्शनोंल हमेशा सही दिशा मिलैं और सौभाग्य बढ़ौं। तुमर उपदेश दिण पर प्रहलाद ल मायाजाव पर जीत हासिल करी। ध्रुव कै ध्रुवपद मिलौ। सृष्टि पैद करनि और सबूं क मंगल चाणी ब्रह्मा ज्यूक तुम महान च्याल छा, तुम हमेशा सबूं क दुःख कै दूर कर छा।

म्यर द्विनों हाथ जोडि बेर तुमर खुटा में पैलाग, और मैं विनती करनूं कि तुम मैं कै कोई यस सरल उपाय बतै द्यौ जकै कर बेर म्यर द्विनों च्याल ज्वान है जौ, और‌ म्यर दुःख दूर है जौ।"

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Thursday, 5 February 2026

श्रीमद्भागवत महापुराण कथा: सुख सागर; अध्याय -1 ( भक्ति, ज्ञान और वैराग्य क) कुमाऊनी बोलि में अनुवाद।1

 एक दिन नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक और अठ्टासी हजार बैठि ऋषियोंल वेदव्यास ज्यूक लाडिल शिष्य सूत ज्यू ह्वै कौनी- "द्याब ज्यू ! तुम हमकैं यसि अलौकिक कहानि सुनावा जिमै भक्ति, ज्ञान और वैराग्य क बार में सकर खबर हो, किलै कि आजक यौ कलयुग में सबै प्राणी न में गुस्स, लालच, मायाजाव सकर पाईं जां। यई कारणैल सबै प्राणी आठो पहर दुःख और डरल परेशान छैं, आपुं परमपिता परमेश्वर क यस चरित्र क वर्णन करौ जकै सुणि और पढ़िबेर सबै प्राणीनाक क्वाठक दुख, पीड़ और डर दूर ह्वै जौ और उ परमेश्वर क खुटांन में ध्यान लगैबेर यौ दुःख भरि भवसागर बै पार ह्वै जौ।

यह सुणिबेर सूत ज्यू कोनी-"हे ऋषिवरो ! आपूं लोगों ल कलयुगक मंखियोंक ल्यी भौते भलि बात पुछि रौ, मैं आपूं लोगोंन कै श्रीमद् भागवत महापुराण कि कथा सुणौनूं।

जो कि श्रृंगी ऋषि क श्राप दीणक बाद महाराज परीक्षित कै शुकदेव ज्यूल सात दिन सुणैं छ। 

यौ अमृत रुप में कथा कै सुणन पढ़नक बाद सबै प्रणी आवागमन चक्र बै छुटिबेर मुक्त ह्वै जां। यौई पुराण कै सनकादिक ऋषियों ल द्याप्त नारद ज्यू के सात दिन सुणै और यौ पुराण कै सुणनैकि विधि लै बतै।"

इतुक कथा सुणिबेर शौनकादिक ऋषि कुण लागि- "सूत ज्यू! द्याप्त नारद ज्यू एक जाग द्वी घड़ि से सकर टैम नै रुक सकन, त द्याप्त नारद ज्यू एक हप्त तक एक जाग कै कसिक टिक गईं। और सनकादिक ऋषियों त दर्शन मिलन बड़ दुर्लभ छू। उं द्याप्त नारद ज्यू कै कसिक मिलि और सबूं ह्वे पैलि हप्त भरी यौ पारायण क्वै जाग होछ, आपूं जरा विस्तारै ल हम सबूंकै बतावौ।"

यौ सुणिबेर सूत ज्यू कोणी- एक बार सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार चारों भई घुमन घुमने बद्रीकाश्रम पहुंची त वां उनुल द्याप्त नारद ज्यू कै उदेखी बेर बैठी द्येखौ, उनकें उदेख लागि देख सनकादिक ऋषि कुणी- "ओ नारद ज्यू के बात छू? आपूं इतुक किलै उदेखी रौछा?

द्याप्त नारद ज्यू उन चारों ऋषियों ह्वै पैलाग कै बेर कुणी, -"हे मुनिश्वरो मैं आपूं लोगों कै आपण उदेखीणक कारण बतौनू। आपूं लोग ध्यानल सुणिया, मैं काशि, गया, गोदावरि, जगन्नाथ और ऋषिकेश सबै पवित्र तीर्थ में घुमि बेर ऐ रैयूं। लेकिन मैं यौ द्यैखिबेर दुखी ह्वै गयूं कि यां जतुक लै प्राणी छै सबै मायाजाव में इतुक सकर ह्वै फंस रैयीं, उनर उ रूप द्यैख बेर सत्य, दया और धर्म वां है भागि बेर दूर नै गई, और काम, क्रोध, मद, लोभ और क्लेश आपणी सेना क साथ सबै मंखियां कै डरै धमकै बेर मौज ल राज करनौ। 

सबै मन्खी आठों पहर आपण और आपणी परिवार क पालण - पोषणक बार में सोचण रौं, छल, कपट और झूठ ल आपण जीवन कै चलौणौ। इज- बाज्यू और गुरुनों कि कैं नै मानिबेर सैंणी, सासु- सौर और सावै कि कै मानि बेर काम करनौं, रूपैं - पैसों क लालच में आपणी च्यैलि ब्या बुढ़ांक साथ और आपुं ह्वै नानि जात में कर दिणौ, सबै जाग बामन, ठाकुर, बैश्य, शूद्र कोई लै आपणी धर्मक पालन नै करनै। 

घूमने- घामने जब मैं मथुरा में यमुना नदी क किनार पहुंची, तब मैं ल वां एक भौते आश्चर्य चकित नजार द्येखी, एक जवान सैंणी बिहोश हुईं द्वी बुड़ आदिमों क पास बैठिबेर जोर- जोर ल डाढ़ मारन छी और आपणी सहायता ल्यी बुलौण छी, अचानक उ सैंणी क नजर मैं में पढ़ी त उ ठाड़ि ह्वैगे और मैं थै कुणी- 

आगे पढ़ें.....

"महाराज म्यर अहोभाग्य जो मैं के तुमर दर्शन ह्वै गईं, तुम त म्यर फुटी भाग क कहाणी सुण ल्या। उ सैंणी क बात सुणि बेर मैंल वी थै पुछौ- को छा तुम? यौ बिहोश हुईं बुड़ को छैं? म्येरी बात सुणबेर उ सैंणी कुणी - मैं भक्ति छूं, यौ द्विनों म्यर च्याल छैं, एक क नौ ज्ञान छौ, दुसरक नौ वैराग्य छौ। और यौ जो द्वि-चार सैंणिन भै रयीं, यौं गंगा-यमुना और बकैं नदि छन, यौ सबै म्येरि सेवा करण हुणि म्यर पास ऐ रयीं।

मैंल द्रविड़ देश में जन्म ल्यी रौ, कर्नाटक में ज्वान ह्वैबेर मैं भौत टैम तक दक्षिण देश में रयूं, मैं गुजरात गयूं, वां जाईबेर मैं बुड़ी ह्वै गयूं।

लेकिन जसै मैं वृंदावन आयूं, मैं फिर ज्वान ह्वै गयूं, लेकिन म्यर द्विनों च्याल भौत बुड़ और कमजोर ह्वै गई। बोलण त भौत दूरकि बात ह्वैगै यौ आंख खोलि बेर द्येख लै नै सकनै। मैं ज्वान छौं और म्यर च्याल बुड़, जब यौ दुणी हमर तरफ द्यैखें त मैं कैं भौत शरम लागि जैंछ, और भौते दुख लै हौंछ। हे द्याब ज्यू यौ सब कसिक हो हुन्यौल?"

भक्ति रूपकि उ सैंणी बात सुणीबेर  और भौत सोच विचार बेर मैं ल वी थैं क, हे- "भक्ति घोर कलयुग औण पर त्वै में और ज्ञान और वैराग्य में मन्खियोंक जरा लै श्रद्धा भाव नैहैं, यौइ कारणेंल तुम तीनों इतुक कमजोर ह्वै गछा, वृंदावन में आइ बेर तु त ज्वान ह्वै गछी, लेकिन त्यर द्विनों च्यलां कै यौ कलयुग में क्वै नैं जाणन।यौइ कारणेंल त्यर द्विनों च्याल बुड़ और कमजोर ह्वै ग्यान।"

द्याप्त नारद ज्यू कि बात सुणीबेर भक्ति कौणी- "यदि कलयुग इतुकै दुष्ट और पापि छौ त महाराज परीक्षित ज्यूल उकै जिन्द किलै छोड़ी, किलै कि वी पै दया दिखैबेर सबै मन्खियोंक धर्म - कर्म छुटि गो। यकै त मौत दिण भौते जरूरी छौ।"

भक्ति बात सुणिबेर द्याप्त नारद ज्यू कौणी- " भक्ति यौ कलयुग में कई अवगुण हुण पारी एक भौत खास गुण यौ छौ, कि दुसर युगों में सैकड़ों वर्षों तक जप, तप, यज्ञ, दान और धर्म करण पर लै मनखी कै भगवान क दर्शन नै हौंछी, लेकिन कलयुग में जो मनखी सच्च मनल कै भगवान क ध्यान करल और नाम जपल करल, वी पै भगवान भौत जल्दी खुशि ह्वै जाणी, और आपण दर्शन द्यी दिणी, लेकिन दुर्भाग्य यौ छौ कि कलयुग क मन्खी यौ सितिल उपाय लै नै करणै, किलैकि उनूल धर्म - कर्म सबै छोड़ि हालि। बामन लै सकर दान दक्षिणा ल्यी बैर प्रायश्चित नै करणै। नाणतिन ईजा- बोज्यूक कै नै माणनै, सैणीं आपणी मैंसक कै नै माणनैं, बाबा, साधु-संत गृहस्थी ह्वै सकर मायाजाव में बादि रौ, सबै प्राणी न में सत्य, धर्म, दयाभाव नै ह्वैबेर काम, गुस्स और पाप भौतै बढ़ गो, सबै मन्खियोंक कर्तव्य छौ उ सत्य और संतोष क साथ आपण धर्म और कर्म में मगन रै बेर भगवान क भजन और नाम जप करौ और सबन प्राणीन पै दया भाव रखौ।"

द्याप्त नारद ज्यू कि बात सुणी बेर भक्ति कौणी- "मुनिवर आपूं भौत महान छा। म्यर अहो भाग्य मैं कैं तुमर दर्शन ह्वै गईं, तुम सबूं क दुःख कै दूर कर सकै छा, मैं  तुमर खुटा में पड़ि हाथ जोडि बेर विनती करनूं कि तुम कोई यस सरल उपाय बतै द्यौ जकै कर बेर म्यर द्विनों च्याल ज्वान ह्वै जौ और‌ म्यर दुःख दूर ह्वै जौ।"

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।

Wednesday, 4 February 2026

म्येरी बाना: कुमाऊनी गीत।-11

 मुखड़ा मैंस- ओ मेरी.. ओर म्येरी होंसिया बाना, कब तू सुणेली 

मुड़ माथ में घाम चड़ी गो, कब तू उठेली।।


मुखड़ा सैंणी- मोहना बाज्यू घर कै आपण, तुमी संभाला।।

नी करो होइ कचकचा, सासु- सौर सुणला।


१अंतरा: मैंस- चुल भिनेर जगै हालि, भ्यार- भीतेर झाड़ि हालि।

नवाई- धवाई द्यापतनों कै, पुज पाठ लै करि हालि।।

उठ मेरी...उठ म्येरी होंसिया बाना, चाहा बणाली।

मुड़ माथ में घाम चड़ी गो, कब तू सुणैली।।


२- अंतरा: सैंणी- हाय खर्राटा, त्यर खर्राटा, सिति मा त्यर मड़मडाटा।

बैठि- बैठि काट दीछ, मैं ल बेली सारि राता।।

यों नीन क मोहना बाज्यू , तुम छा कारणा।

नी करो होइ कचकचा, सास- सौर सुणला।।


३- अंतरा: मैंस- गोरू बछा कै दौंणी भ्यार, मैं ल सुवा बांधि हालि।

घास- पात गोरू बछा कै, मेरी सुवा द्यी हालि।।

उठ मेरी.. उठ मेरी नारिंगे दांणी, मोऊ खड़ेली।

मुड़ माथ में घाम चड़ी गो, कब तू उठैली।।


४- अंतरा: सैंणी- पी खैबेर रात भरि, तुम नाचण है रौंछा।

सिति बटि लै हाई राम, भरभराट मचौं छा।।

सुधर जावा मोहना बाज्यू, नी पियो शराबा‌।

यौ शराब ल म्येरी ज्यूनि, करि है खराबा।।


५: अंतरा- मैस- सांची सुवा ब्याखुलि बै, नी प्यों ल मैं शराबा। 

तेरी कसमा सारि बोतला, घुरै ओंला दूर भ्योवा।।

उठ.. उठ म्येरी पुन्यू की ज्यूना, कल्यौ बणूं लौ।

भल- भलो भ्यार घाम ऐरो, दगड़ा खौं लौ।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Sunday, 1 February 2026

मैं बेटी पहाड़ की: हिंदी कविता। 34

उत्तराखंड की मैं बेटी हूं, अंकिता है मेरा नाम।

घर की जिम्मेदारी उठाने हेतु करने लगी मैं रिसाॅट में काम।।


कोरोना काल का समय है महामारी का खौफ भी है।

 प्राइवेट नौकरी करने वाले आज सभी बेरोजगार हैं।।


 पापा जब से हुए बेरोजगार, घर के हुए बूरे हाल।

 रिजॉर्ट में नौकरी पाकर, मां-बाबू जी को किया निहाल।।


कुछ ही दिनों में पता चला, रिजाॅट में होते हैं काले धंधे तमाम।

सोच लिया था तब ही, यह नौकरी छोड़कर ढूढुंगी दूसरा काम।।


सफेदपोशों की काली दृष्टि से, मैं  स्वयं को नहीं बचा पाई।

सत्ताधारी भेड़ियों के बीच आ गई हूं मैं, कतई समझ नहीं पाईं।।


समाज के ठेकेदारो ने, मेरा तन-मन, स्त्रीत्व किया लहूलुहान।।


जोर-जोर से मैं चीखी, और और  दहाड़े मारकर मैं रोई।

लेकिन कोई मेरी चीख सुने ऐसा नहीं आया कोई।।


सब कुछ लुट जाने पर निर्जीव सी बुत बहुत बन गई।

दर्द, आंसू, नफरत, गुस्से से ज्वाला सी मैं बन गई।।


कसम खाई सफेदपोशों का काले कारनामे आज सरेआम करूंगी।

जो दर्द मिला है मुझे आज उसका हिसाब जरूर लुंगी।।


गुस्से में तमतमाए मैं निकली रिजाॅट से बाहर।

मेरी चुप्पी के दाम देने लगे मुझे आकर।।


मेरे ना मानने पर दरिंदों ने मुझे मार दिया और चिल्ला नहर में फैंक दिया।

सोचा अपने दुष्कर्म का हमने नामों निशान मिटा दिया।।


मेरी आंखों ने संजोए थे कई सपने।

और कई सपने बुन रहे थे मेरे अपने।।


दरिंदों ने नहीं भरने दी मेरे सपनों को उड़ान।

बन गई दर्दनाक कहानी चली गई मेरी जान।।


क्या कसूर था मेरा तू ही बता दे ऐ भगवान।

हंसते खेलते मेरे परिवार को दुःख दे दिए तमाम।।


बन गई मेरी कहानी, एक दर्दनाक अफसाना।

जिसे बरसों याद रखेगा सारा जमाना।।


मेरा दर्द, मेरा संघर्ष और साहस की कहानी।

किताबों में मिलेगी, मेंरी जिंदगी की निशानी।।


पहाड़ों में मेरे न्याय के लिए जब आवाज उठेगी।

न्याय मिलगा तब मुझे, दोषी को मौत की सजा मिलेगी ।।


स्वरचित: मंजू बोहरा, बिष्ट, 


गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।