कुछ यात्राएं केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं ले जातीं, वे मनुष्य के भीतर भी एक नई यात्रा आरम्भ कर देती हैं। मेरी डीडीहाट यात्रा भी ऐसी ही थी। यह केवल एक साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने की यात्रा नहीं थी, बल्कि अपनी मातृभाषा, अपनी संस्कृति और देवभूमि उत्तराखंड के सहज, सरल जीवन को निकट से जीने का एक दुर्लभ अवसर भी थी। आज जब उस यात्रा को स्मरण करती हूं तो लगता है मानो हिमालय की शीतल हवा, देवदार के वन, वर्षा से भीगे पहाड़ और वहां के आत्मीय लोग आज भी मेरे मन के किसी कोने में वैसे ही बसे हुए हैं।
मेरा डीडीहाट यात्रा का आरम्भ हल्द्वानी बस स्टैंड से होना था। प्रातः छह बजे हल्द्वानी से डीडीहाट के लिए केवल एक ही बस जाती है। प्राइवेट टैक्सी जाती है लेकिन उसका किराया दो हजार रुपये था , जो मेरे बजट से बाहर था। इसलिए मैंने बस से ही यात्रा करने का निर्णय लिया।
सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी कि मैं हल्द्वानी बस अड्डे पर पहुंच गई। मन में उत्साह भी था और हल्की- सी चिंता भी, कहीं बस छूट न जाए। सचमुच ऐसा ही होने वाला था। मैं जैसे ही बस अड्डे पर पहुंची, बस चलने को तैयार खड़ी थी। यदि पांच मिनट भी और देर हो जाती तो शायद पूरी यात्रा की योजना बदल जाती। बस में केवल एक ही सीट खाली थी, वह भी परिचालक के पास। उस सीट पर बैठते हुए मन में एक अनकही खुशी थी कि चलो, यात्रा शुरू तो हुई।
बस धीरे- धीरे हल्द्वानी को पीछे छोड़ती हुई पर्वतीय मार्ग पर चढ़ने लगी। सड़क के हर मोड़ के साथ प्रकृति अपना नया रूप दिखाने लगी। हरे- भरे ऊंचे- ऊंचे वृक्ष आकाश से बातें करते दिखाई देते, कहीं सीढ़ीनुमा खेत मानो पहाड़ों की गोद में सजे हुए हों। दूर-दूर तक फैली हरियाली मन को अनायास ही मोह लेती थी।
यात्रा अभी आगे बढ़ ही रही थी कि अचानक एक अप्रत्याशित घटना हो गई। वीर भट्टी (नैनीताल) के पास बस खराब हो गई। सभी यात्रियों को उतरना पड़ा। पहाड़ों के बीच सुनसान सड़क पर लगभग एक घंटे तक नई बस की प्रतीक्षा करनी पड़ी। शुरू- शुरू में सभी के चेहरे पर चिंता और झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी। दिनभर का लंबा सफर सामने था और यह विलंब बेचैन कर रहा था। परंतु पहाड़ शायद धैर्य सिखाना जानते हैं। थोड़ी देर बाद जब नई बस आई तो सभी यात्रियों के चेहरों पर फिर से मुस्कान लौट आई। ऐसा लगा मानो यात्रा ने एक बार फिर गति पकड़ ली हो।
जून का महीना था। जैसे- जैसे बस अल्मोड़ा की ओर बढ़ी, मौसम ने अचानक करवट ली। घने बादल उमड़ आए और फिर मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। वर्षा थमने के बाद चारों ओर कोहरा छा गया। देवदार के वृक्ष धुंध की चादर में ऐसे लिपट गए थे मानो प्रकृति ने उन्हें अपने आंचल में छिपा लिया हो।
उस समय बस की खिड़की से बाहर झांकते हुए मुझे सचमुच ऐसा लग रहा था कि हमारी बस सड़क पर नहीं, बल्कि बादलों के बीच चल रही है। कभी नीचे गहरी घाटियां दिखाई देती, तो अगले ही क्षण सब कुछ सफेद धुंध में विलीन हो जाता। वह दृश्य इतना मोहक था कि आंखें झपकाने का भी मन नहीं करता था।
दोपहर के समय भोजन के लिए बस सेराघाट में रुकी। वहां अधिकांश होटलों में मांसाहारी भोजन बनता था। मैं शुद्ध शाकाहारी हूं, इसलिए थोड़ा संकोच हुआ। तभी किसी स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि पास में एक छोटा- सा भोजनालय है जहां शुद्ध शाकाहारी भोजन बनता है। मैंने अपना मनपसंद खाना आलू के गुटके, गरमागरम रोटियां मंगाई, भोजन के बाद गरमागरम जलेबी और दही खाया, मन तृप्त हो गया। पहाड़ की ठंडी हवा में दही और गरम जलेबी का स्वाद आज भी स्मृतियों में उतना ही ताज़ा है।
शाम को लगभग साढ़े सात बजे हम डायट यूनिवर्सिटी डीडीहाट पहुंचे। सुबह छह बजे शुरू हुई यात्रा रात तक चलती रही थी। शरीर थक चुका था, पर मन उत्साह से भरा था।
डायट पर पहुंचते ही सम्मेलन के आयोजक और कुछ साहित्यकार हमारा स्वागत करने के लिए पहले से उपस्थित थे। उनके आत्मीय व्यवहार ने दिनभर की सारी थकान पलभर में दूर कर दी। ऐसा लगा जैसे किसी अपरिचित स्थान पर नहीं, बल्कि अपने ही लोगों के बीच आ पहुंची हूं।
डायट पर पहुंचने के बाद मुझे रूम नंबर 23 दिया गया, उसमें तीन बेड लगे हुए थे, उस कमरे में मेरे साथ दो अन्य नवोदित महिला रचनाकार थीं। साहित्यिक आयोजनों में प्रायः यह संकोच रहता है कि कहीं बड़े- बड़े साहित्यकारों के बीच स्वयं को छोटा न महसूस करना पड़े, पर यहां ऐसा कुछ भी नहीं था। हमारे बीच किसी प्रकार का औपचारिक दबाव नहीं था। बातचीत सहज थी, व्यवहार आत्मीय था और वातावरण बिल्कुल पारिवारिक। हम तीनों अलग- अलग स्थानों से आई थीं, पर साहित्य ने हमें एक ही सूत्र में बांध दिया था।
रात्रि भोजन के बाद एक परिचय- गोष्ठी आयोजित की गई। बाल साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकार और संपादक उदय सिंह किरौला जी ने उत्तराखंड के सभी आमंत्रित साहित्यकारों को एक साथ बैठाकर परिचय कराया। वह दृश्य मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक था। वहां वरिष्ठ साहित्यकार भी थे, युवा रचनाकार भी और हम जैसे नवोदित लेखक भी। किसी के चेहरे पर अहंकार नहीं था; केवल साहित्य के प्रति समर्पण और एक- दूसरे के प्रति सम्मान दिखाई दे रहा था।
उस गोष्ठी में अनेक साहित्यकारों से पहली बार मिलने का अवसर मिला। रेखा जी, मंजू पांडे उदिता जी, रेखा बिष्ट जी, हयात सिंह जी, धारा बल्लभ पांडे जी, नीरज पंत जी तथा कई अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों का सहज और स्नेहपूर्ण व्यवहार मेरे मन को गहराई से छू गया। मैंने अनुभव किया कि किसी व्यक्ति की महानता केवल उसके लेखन से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से भी पहचानी जाती है। उन सबके बीच बैठकर ऐसा लगा मानो वर्षों से परिचित लोगों के बीच हूं।
अगली सुबह बच्चों का सांस्कृतिक कार्यक्रम होना था, पर प्रकृति की अपनी ही योजना थी। सुबह से घनघोर वर्षा आरंभ हो गई। पहाड़ों पर बरसती वर्षा का सौंदर्य शब्दों में बांधना कठिन है। बादल कभी पहाड़ियों को ढंक लेते, कभी हवा का एक झोंका आता और सामने दूर तक फैली हरियाली अचानक दिखाई देने लगती। वर्षा इतनी तेज़ थी कि हम बच्चों के कार्यक्रम में नहीं जा पाये, जिसका मुझे बहुत अफसोस भी हुआ।
दोपहर में साहित्यिक गोष्ठी आरंभ हुई। देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों ने भाषा, साहित्य, संस्कृति और बाल साहित्य पर अपने विचार रखे। विचारों की विविधता देखकर बार- बार यह अनुभूति होती रही कि भारत सचमुच अनेक भाषाओं और संस्कृतियों का विराट देश है, और साहित्य उन सबको जोड़ने वाला सबसे सुंदर सेतु है।
इसी सम्मेलन में मैंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने मुझे भीतर तक प्रभावित किया। कवि सम्मेलन के एक सत्र में वरिष्ठ साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया, किंतु उनकी समीक्षा करने के लिए बच्चों को मंच पर आमंत्रित किया गया। छोटे-छोटे बाल समीक्षक पूरे आत्मविश्वास के साथ कविता की भाषा, भाव और प्रस्तुति पर अपने विचार रख रहे थे। यह मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। मैंने पहले कभी किसी साहित्यिक आयोजन में ऐसा प्रयोग नहीं देखा था। उस क्षण लगा कि यदि बचपन से ही बच्चों को साहित्य को समझने और उस पर विचार व्यक्त करने का अवसर मिले, तो भविष्य में संवेदनशील पाठकों और श्रेष्ठ साहित्यकारों की एक नई पीढ़ी तैयार होगी।
उस दिन मैंने जाना कि साहित्य केवल लिखने और सुनाने की विधा नहीं है; वह संवाद की संस्कृति भी है, जहां आयु नहीं, विचारों का महत्व होता है।
शाम 5 बजे से कवि सम्मेलन आरंभ हुआ। सभागार में उत्सुकता का वातावरण था। एक- एक कर कवि मंच पर आ रहे थे और अपनी रचनाएं सुना रहे थे। मैं भी अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी। मन में हल्का-सा कंपन था, पर उससे कहीं अधिक गर्व था, क्योंकि मैंने निश्चय कर लिया था कि मैं अपनी मातृभाषा में ही कविता सुनाऊंगी।
सभागार में देश के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकार, शिक्षक और विद्यार्थी उत्सुकता से कवि सम्मेलन का आनंद ले रहे थे। किसी की कविता में देशभक्ति थी, किसी में प्रकृति का सौंदर्य, तो किसी में समाज की विडंबनाओं का चित्रण।
जब संचालिका ने मेरा नाम पुकारा, तो मैंने मंच पर पहुंचकर सबसे पहले देवभूमि और आयोजकों को प्रणाम किया। फिर मैंने उत्तराखंड की अपनी लोकभाषा में रचित कविता "गोपी" का पाठ प्रारंभ किया।
यह केवल एक कविता नहीं थी, यह संयुक्त परिवार की आत्मीयता, दादा- दादी का स्नेह, चाचा- चाची व माता- पिता के कर्तव्य तथा भारतीय पारिवारिक संस्कारों का जीवंत चित्र थी। कविता आगे बढ़ती गई और सभागार में एकाग्रता बढ़ती गई। बहुत से श्रोता भाषा नहीं समझ रहे थे, पर भावों की भाषा सब समझ रहे थे। कविता समाप्त होते ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों ने आकर कहा, "भाषा हमारे लिए नई थी, लेकिन भाव सीधे हृदय तक पहुंचे।"
उन शब्दों ने मेरे मन को गहराई तक छू लिया। उस क्षण मुझे अनुभव हुआ कि भाषा का वास्तविक सौंदर्य उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनाओं में बसता है। मेरी मातृभाषा उस दिन केवल मेरे गांव या मेरे प्रदेश की भाषा नहीं रही; वह पूरे सभागार की साझा अनुभूति बन गई। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे यह सम्मान केवल मेरा ही नहीं हुआ, मेरे साथ मेरी मातृभाषा, मेरी संस्कृति और मेरे उत्तराखंड का भी सम्मान हुआ है।
रात्रि में हमें सूचना दी गई कि प्रातः पांच बजे पक्षी- दर्शन के लिए जंगल की सैर पर निकलना है। यह सुनकर मन में सहज ही विचार आया, जंगल तो पहले भी कई बार देखे हैं और पक्षियों को भी, फिर इतनी सुबह, वह भी ठंड में उठने की क्या आवश्यकता है? यही सोचकर मैंने निश्चिंत होकर सो जाना ही उचित समझा।
किन्तु प्रातः जब आंख खुली, तो देखा कि लगभग सभी साथी जंगल की सैर के लिए बड़े उत्साह के साथ तैयार हो चुके थे। उनके चेहरे का उल्लास देखकर मैंने स्वयं से कहा,"अरे आलसी! सोना तो रोज़ ही होता है, आज उठ, कुछ नया देख, कुछ नया सीख।"
बस फिर क्या था, मैं तुरंत उठी, स्नान कर तैयार हुई। इतने में किरौला जी सभी के लिए गरमागरम ब्लैक टी लेकर आ गए। उस सर्द सुबह में ब्लैक टी की चुस्कियों ने मानो नई ऊर्जा भर दी। चाय समाप्त करते ही मैं भी पूरे उत्साह के साथ समूह में शामिल हो गई और प्रकृति की उस अनूठी यात्रा पर निकल पड़ी।
वहां पहुंचकर समझ में आया कि प्रकृति को देखना और प्रकृति को पहचानना दो अलग बातें हैं। जिम कॉर्बेट क्षेत्र से आए विशेषज्ञ हमारे साथ थे। उन्होंने विभिन्न पक्षियों की आवाज़ों की इतनी सजीव नकल की कि क्षणभर के लिए लगा मानो पूरा जंगल हमारे स्वागत में गा उठा हो। दूरबीन से रंग-बिरंगे पक्षियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखना मेरे लिए एक नया अनुभव था। वर्षों से उत्तराखंड में रहते हुए भी जिन पक्षियों को केवल उड़ते हुए देखा था, उस दिन पहली बार उनके नाम, स्वभाव और विशेषताओं को जानने का अवसर मिला। मुझे लगा कि प्रकृति एक खुली हुई पुस्तक है। उसे पढ़ने के लिए केवल आंखें नहीं, संवेदनशील मन भी चाहिए।
इसी बीच अवसर मिला तो हमारे समूह की तीन कवयित्रियों ने मलयनाथ महादेव के दर्शन का निश्चय किया। डायट विश्वविद्यालय से मंदिर की दूरी अधिक होने के कारण हमने एक वाहन बुक किया और मलयनाथ महादेव मंदिर की ओर प्रस्थान किया।
मंदिर एक ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थित था। वहां तक पहुंचने के लिए लगभग 325 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती थीं। यह चढ़ाई बिल्कुल भी सरल नहीं थी। कुछ दूर बढ़ते ही सांसें तेज हो जातीं, फिर कुछ क्षण विश्राम कर हम पुनः आगे बढ़ जाते। शरीर थकान का अनुभव कर रहा था, किन्तु शिव- दर्शन की अटूट आस्था और मन की श्रद्धा उस थकान पर भारी पड़ रही थी। हर सीढ़ी के साथ ऐसा लगता मानो हम केवल पर्वत की ऊंचाई ही नहीं, बल्कि अपनी आस्था की ऊंचाइयों को भी स्पर्श कर रहे हों।
आखिरकार हम मलयनाथ महादेव मंदिर पहुंच ही गए। गर्भगृह में विराजमान भगवान शिव के दर्शन करते ही मन को गहरा सुकून मिला। ऐसा लगा जैसे सारी थकान पल भर में दूर हो गई हो और तन-मन नई ऊर्जा से भर गया हो।
मंदिर से बाहर निकले तो सामने हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां सूर्य की किरणों में चांदी की तरह चमक रही थीं। ऐसा मनमोहक दृश्य जीवन में बार- बार देखने को नहीं मिलता। हम तीनों कुछ देर वहीं बैठकर उस अद्भुत नज़ारे को निहारते रहे। सूर्य की किरणें जब बर्फ से ढकी चोटियों पर पड़तीं, तो वे और भी सुंदर दिखाई देती। उस पल प्रकृति का सौंदर्य मन को मंत्रमुग्ध कर रहा था। कुछ देर बाद हम सीढ़ियां उतरकर नीचे अपनी गाड़ी के पास पहुंचे। तभी अचानक ध्यान आया कि मैं अपना स्वेटर मंदिर परिसर में ही भूल आई हूं। यह याद आते ही मन उदास हो गया। उस समय फिर से 325 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाना संभव नहीं था।
पास ही एक स्थानीय दुकानदार से मैंने अपनी समस्या कही। उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़े विश्वास से कहा, "चिंता मत कीजिए, आपकी स्वेटर आपको मिल जाएगी। उनकी सहजता ने मेरे मन का आधा बोझ उसी क्षण हल्का कर दिया।, उनका मोबाइल नंबर लेकर हम वापस आ गए।
शाम को मैंने उन्हें फोन किया। उन्होंने बताया कि किसी श्रद्धालु ने स्वेटर सुरक्षित उनके पास पहुंचा दी है। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने एक परिचित के माध्यम से वह स्वेटर हमारे ठहरने के स्थान डायट तक भिजवा भी दी।
रात्रि में जब मैंने अपनी स्वेटर सुरक्षित अपने सामने रखी देखी तो मन अनायास ही भर आया। वह केवल एक ऊनी वस्त्र नहीं था; वह उत्तराखंड के लोगों की ईमानदारी, संवेदनशीलता और आत्मीयता का सजीव प्रमाण था।
गाजियाबाद में किसी वस्तु के खो जाने पर उसके वापस मिलने की आशा बहुत कम रह जाती है, और यहां अनजान लोगों ने बिना किसी स्वार्थ के केवल मानवीय संवेदना के कारण इतना प्रयास किया। वाकई में हमारी देवभूमि उत्तराखंड के लोग बहुत सरल और सच्चे होते हैं।
यात्रा का अंतिम दिन भी अनेक सुखद स्मृतियां लेकर आया। समापन समारोह में विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों की उपस्थिति में प्रतिभागियों का सम्मान किया गया।
सम्मान-चिह्न हाथ में लेते समय मुझे लगा कि यह पुरस्कार केवल मेरे लिए नहीं है। यह मेरी मातृभाषा, मेरे गांव, मेरी संस्कृति और उन लोक परंपराओं का सम्मान है, जिन्होंने मुझे लिखना सिखाया। उस क्षण मन गर्व से भर उठा।
विदा का समय हमेशा थोड़ा उदास करता है। जब डीडीहाट से लौटने के लिए बस चली तो खिड़की से बाहर दूर तक फैले पर्वत, चीड़, देवदार के वन और बादलों में लिपटी घाटियां धीरे- धीरे पीछे छूटती चली गईं। ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ चुपचाप विदा दे रहे हों। मैं बार- बार मुड़कर उन पर्वतों को देखती रही।
वापसी की पूरी यात्रा में मैं सोचती रही कि इस प्रवास ने मुझे क्या दिया। एक साहित्यिक मंच मिला, अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों का सान्निध्य मिला, नवोदित रचनाकारों की आत्मीय मित्रता मिली, बच्चों की नई दृष्टि से साहित्य को देखने का अवसर मिला, प्रकृति को नए रूप में समझने का सौभाग्य मिला और सबसे बढ़कर अपनी मातृभाषा पर गर्व करने का नया आत्मविश्वास मिला।
आज भी जब आंखें बंद करती हूं तो बहुत- से दृश्य एक साथ मन में उतर आते हैं, हल्द्वानी बस अड्डे की वह भागती हुई सुबह, बस की आख़िरी खाली सीट, रास्ते में खराब हुई बस, नई बस आने पर यात्रियों के चेहरों पर लौटी मुस्कान, अल्मोड़ा और सेराघाट की वर्षा बादलों के बीच चलती बस, देवदार के भीगे वन, पहाड़ की ठंडी हवा, आलू के गुटकों, दही और गरमागरम जलेबी का स्वाद, साहित्यकारों का आत्मीय सान्निध्य, बच्चों की निष्पक्ष समीक्षा, अपनी लोकभाषा में गूंजती कविता, जंगल में पक्षियों का मधुर संगीत, मलयनाथ महादेव की दिव्य शांति, हिमालय की हिमाच्छादित चोटियां, और एक साधारण- सी स्वेटर के माध्यम से मिली असाधारण मानवीय संवेदना। इन सब स्मृतियों ने मिलकर मेरे जीवन की ऐसी निधि बना दी है जिसे समय कभी कम नहीं कर सकता।
सच ही कहा गया है, देवभूमि केवल अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण महान नहीं है; उसकी वास्तविक महिमा वहां के लोगों की सरलता, ईमानदारी, आत्मीयता और संवेदनशीलता में बसती है। मैं डीडीहाट से केवल लौटकर नहीं आई, मैं अपने साथ प्रकृति की हरियाली, साहित्य का संस्कार, मानवीय रिश्तों की ऊष्मा और जीवन भर साथ रहने वाली अनमोल स्मृतियां लेकर लौटी।
यही मेरी डीडीहाट यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे अमूल्य स्मृति है।
स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।