Thursday, 26 February 2026

प्रवास में पहाड़। कविता। 38

अक्सर मन की दहलीज़ पर एक सपना दस्तक देता था, हम सब प्रवासी मिलकर एक संसार बसाएँ।
इस परदेस की अपरिचित गलियों में, अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू फिर से महकाएँ।।

सोचा था ! क्यों न दूर वादियों की स्मृतियों को, दिलों के आँगन में उतार लें।
क्यों न इस अजनबी शहर में, अपना सा एक छोटा उत्तराखंड सँवार लें।।

बिखरे चेहरों में अपनापन खोजा, संकोच की दीवारें धीरे-धीरे गिराईं।
उत्रैणी–मक्रैणी के पावन अवसर पर, मिलन की दीपशिखाएँ जगमगाईं।।

ढूँढ-ढूँढ कर सबको जोड़ा, स्नेह के धागों में विश्वास पिरोया।
बोली भले अलग-अलग थी, पर हर हृदय ने पहाड़ों का प्रेम संजोया।।

धीरे-धीरे मुस्कानों ने रिश्तों को आकार दिया, विश्वास ने जड़ों को गहरा किया।
एक छोटे से मंच से आरंभ हुआ सफ़र, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में नव इतिहास रच दिया।।

हाँ, राह में मतभेद भी आए, कुछ क्षणों ने मन को डगमगाया।
पर हमने साहस की ज्योति थामे रखी, हर तूफ़ान को हँसकर अपनाया।।

जीवन ने सिखाया, दुख की छाया में भी सुख का सूरज छिपा होता है।
बस धैर्य से ढूँढो तो, हर अँधेरा उजाले में बदला होता है।।

अब हौसलों के पंख लगाकर, आकाश को छूना है।
दोस्तों का हाथ थामे, साथ-साथ आगे बढ़ना है।।

इस परदेस की धरती पर, अपनत्व का दीप जलाना है।
अपने इस मिनी उत्तराखंड को, एक सजीव परिवार बनाना है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Tuesday, 24 February 2026

जीवन के रंग कविता।

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बाग सजाया प्यारा।

मेहनत, लगन और प्रेम से, सींचा उसे दुलारा।।


धीरे-धीरे रंग बिखरने लगी, हरित हथेलियों पर।

फूल मुस्काए जैसे सपने, उतर आए हों धरा पर।।


किसी फूल की खुशबू मन हर लेती, जैसे मधुर कोई गान।

कोई रूप से बाँध लेता, चुपके-चुपके सबका ध्यान।।


कुछ पौधे थे कंटीले, यह भी प्रकृति का है संदेश।

सिर्फ कोमलता ही नहीं, कठोरता भी है परिवेश।


काँटों की गोद में पलते हैं, सबसे सुंदर फूल।

जैसे संघर्षों में निखरता है जीवन का असली उसूल।।


विविध रंगों से सजा यह बाग, जीवन का ही है रूप।

हर स्वभाव, हर रंग यहाँ, है ईश्वर का स्वरूप।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


खूबसूरती के रंग: कविता । 37

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बागान बनाया प्यारा।

अपनी मेहनत और लगन से, सींचा, पाला- पोसा न्यारा।।

कुछ ही समय में रंग-बिरंगे फूलों से,

मेरा बागान सजा था।

किसी फूल की खुशबू मन मोहक थी,

तो कोई फूल मन मोह रहा था।।

कुछ पौधे कटीले थे, पर सारे कटीले फूल, बेहद खूबसूरत थे।।

बागान में फूलों की खूबसूरती, सभी को करती थी आकर्षित।

जिसे देख बागान, स्वयं भी होता था हर्षित।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

परदेश में अपना घर। कविता। 36

 अक्सर मैं भी सोचा करती थी, हम प्रवासी परदेश में मिल-जुलकर रहें।

परदेस में हम अपना, मिनी उत्तराखंड बना कर रहें।।


सबको साथ लाने के लिए, मैंने एक जुगत लगाई।

उत्रैणी- मक्रैणी महोत्सव मनायें, दोस्तों संग प्लानिंग बनाई।।


ढूंढ-ढूंढ कर समझा- बुझाकर, हम सबको एक मंच में लाए।

बोली में अंतर भले ही था, लेकिन सब थे उत्तराखंड से आए।।


धीरे-धीरे सब में प्रेम बढ़ा, प्रेम के साथ विश्वास बढ़ा।

मंच से शुरू हुआ सफर, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में हुआ खड़ा।। 


अक्सर उलझने आती सामने, मतभेद लेकर आते थे बहाने।

सभी मजबूती से खड़े रहे, कभी हार नहीं मानी हमने।।


सीख लिया है अब हमने, जीवन को समझना।

दुख में सुख का रास्ता, कैसे है हमें ढूंढना।।


सखियों के संग मिलकर, सपनों को साकार करना है।

हाथ थामकर एक- दूसरे का, हमें आगे बढ़ते जाना है।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Friday, 20 February 2026

मेरे प्रेरणा स्रोत व्यक्तित्व: आलेख।

 मेरे आदर्श और प्रेरणास्त्रोत मेरे माता-पिता हैं। मेरा जन्म उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में हुआ है। मैं एक किसान की बेटी हूं। जब भी किसी को मैं अपना परिचय देती हूं कि मैं एक किसान की बेटी हूं, तो मुझे स्वयं पर बहुत गर्व होता है।,,,,,,

हम पांच भाई बहन हैं। १९९८ में मेरे पिताजी का देहान्त हो गया था। उसके बाद परिवार की सारी जिम्मेदारी मेरी माताजी के कंधों में आ गई। मेरी माता जी ने बहुत मेहनत और लगन से हम बच्चों की परवरिश की। और हम बच्चों को कभी भी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।,,,,,
मुझे आज भी याद है, मेरे माता-पिता दोपहर की प्रचंड धूप में भी खेतों में काम करते रहते थे; चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियां क्यों ना हो जाय, मेरे माता-पिता के चेहरे में कभी भी उदासी नजर नहीं आती थी, और नहीं कभी चिड़चिड़ापन दिखाई देता था। मेरे माता-पिता हम भाई-बहनों की शिक्षा का बहुत ध्यान रखते थे। आज से २२-२३ साल पहले गांवों में लड़कियों के लिए १२वी कक्षा से बाद अपनी शिक्षा को जारी रखना बहुत मुश्किल काम था। क्योंकि तब साधन सीमित थे! और महाविद्यालय बहुत दूर थे। मैं पढ़ने में बहुत होशियार थी; तो मेरे माता-पिता ने मेरी पढ़ाई में आने वाली परेशानी को ही दूर कर दिया। वो मेरे लिए एक साइकिल खरीद कर ले लाए, और तब मैं अपने गांव की पहली लड़की थी, जो महाविद्यालय में पढ़ने गईं। मेरे माता-पिता ने मुझे स्नातकोत्तर तक की उच्च शिक्षा प्रदान की।,,,,,,
आज भी गांवों में कई लोग पुरानी विचारधारा के हैं। वो अक्सर अपनी लड़कियों को बहुत सारे कायदों- कानून और नियमों में बांध देते हैं। हमारे माता-पिता ने हम पर कभी भी कोई बंदिशें नहीं थोपी। उन्होंने हमसे कभी नहीं कहा कि तुम एक लड़की हो, तुम ऐसा मत करो, वैसा मत करो। यहां मत जाओ, वहां मत जाओ।,,,,,
पिताजी के देहांत के बाद भी हमारी माता जी ने हम बहनों को हर कार्य में दक्ष और निपुण बनाया। और हमें स्वाभिमान से जीना सिखाया।,,,,,,,
मेरे माताजी और पिताजी अक्सर कहते थे। "जीवन में हमेशा कर्मप्रधान बनो। कभी भी किसी के बारे में बुरा मत सोचो। अपने हर सपने को पूरा करने की हर संभव कोशिश करो। यदि तन-मन से मेहनत करोगे तो एक दिन सफलता अवश्य ही तुम्हारे कदम चूमेगी"।,,,,
जीवन में आने वाले संघर्षों और चुनौतियों का सामना करना मैंने अपने माता-पिता से ही सीखा है, और उन्हीं के परवरिश और संस्कार की वजह से आज मैं एक सफल और कुशल गृहणी हूं, और अपने परिवार जनों की बेहद प्रिय हूं। साथ ही मैं बच्चों को सिलाई सिखाती हूं। और आज मैं एक आत्म-निर्भर महिला भी हूं। 


स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।