सोमवार, 3 अगस्त 2026

संघर्ष से सृजन तक। संस्मरण।

जीवन की कुछ घटनाएं समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि स्मृतियों के आकाश में और अधिक उजली हो जाती हैं। वे केवल बीते हुए दिनों की कहानी नहीं होती, बल्कि हमारे व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिला बन जाती हैं। यह संस्मरण भी मेरे जीवन के ऐसे ही एक अनुभव की कथा है, जिसने मुझे सिखाया कि समाज सेवा का मार्ग जितना आकर्षक दिखाई देता है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है।

कुछ वर्ष पूर्व की एक घटना आज भी मेरे मन में संस्मरण बनकर पूरी ताज़गी के साथ जीवित है। उस समय गाज़ियाबाद में उत्तराखंड समाज की एक नई संस्था का गठन हुआ था। यह पहल समाज को एक नई दिशा देने का अवसर बन सकती थी, किंतु उस समय परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल नहीं थीं। हमारी सोसाइटी सहित अनेक अन्य सोसायटियों के उत्तराखंडी परिवार संस्था के संचालन की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं थे।

इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि जिन पुराने साथियों ने वर्षों की मेहनत से उत्तराखंड समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया था, संस्था बनने के बाद उन्हें अपेक्षित सम्मान और स्थान नहीं मिला। जिन्होंने समाज को जोड़ने की नींव रखी, वही स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे। यह स्वाभाविक था, उनके मन में पीड़ा और निराशा थी, और उनके साथ जुड़े लोगों के मन में भी असंतोष की भावना घर कर गई। ऐसे वातावरण में समाज दो अलग- अलग विचारधाराओं में बंटा हुआ दिखाई देता था।

इन परिस्थितियों से मैं भी अनभिज्ञ नहीं थी, मेरे मन में भी अनेक प्रश्न थे, कुछ खिन्नता भी थी। किंतु अंतर्मन से एक स्वर बार- बार कहता था- "व्यक्ति से बड़ा समाज होता है और समाज से बड़ी संस्कृति।" यदि उत्तराखंड की संस्कृति और समाज के हित में कोई सकारात्मक प्रयास हो रहा है, तो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर उसमें अपना योगदान देना ही सच्चा दायित्व है।

सौभाग्य से संस्था के प्रथम सांस्कृतिक महोत्सव की सांस्कृतिक जिम्मेदारियों में मुझे भी सम्मिलित किया गया। मैंने सभी व्यक्तिगत मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए यह दायित्व सहर्ष स्वीकार किया। परिणामस्वरूप मेरे कुछ परिचित और आत्मीय उत्तराखंडी परिवार भी मुझसे नाराज़ हो गए, किंतु मैंने अपने निर्णय को समाज हित की दृष्टि से उचित माना।

महोत्सव की तैयारियों में मैंने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उत्तराखंड के बच्चों और महिलाओं को खोज- खोजकर जोड़ा, उन्हें मंच के लिए तैयार किया, निरंतर अभ्यास करवाया। मेरी लगन और परिश्रम को देखकर कार्यक्रम के मंच संचालन का दायित्व भी मुझे सौंपा गया। यह मेरे लिए अत्यंत प्रसन्नता और गर्व का क्षण था। मैंने बहुत लगन और मेहनत से तैयारी की। मेरे मन में केवल एक ही संकल्प था कि संस्था का पहला सांस्कृतिक महोत्सव इतना सफल हो कि लोगों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति नया विश्वास और आत्मीयता जागृत हो।

कार्यक्रम का दिन आया। सभागार दर्शकों से खचाखच भरा था। बच्चों का उत्साह, महिलाओं की सहभागिता और उत्तराखंड की लोक संस्कृति के रंग पूरे वातावरण को जीवंत बना रहे थे। 

लेकिन मंच संचालन का अनुभव मेरी अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग था। माइक मुझे तभी मिलता, जब मैं स्वयं आग्रह करती। उस समय मन बहुत आहत भी हुआ। पर मैंने अपने भावों को अपने दायित्व से बड़ा नहीं होने दिया। मैंने सोचा कि मेरा उद्देश्य स्वयं को साबित करना नहीं, बल्कि कार्यक्रम को सफल बनाना है। इसलिए जितना भी अवसर मिला, पूरे मन, निष्ठा और आत्मीयता के साथ मंच संचालन किया। अंत में जब कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और दर्शकों का स्नेह, उत्साह तथा सराहना मिली, तो लगा कि यही मेरे प्रयासों का सबसे बड़ा पुरस्कार है।

उस अनुभव ने मुझे सिखाया कि समाज सेवा का असली अर्थ बिना किसी स्वार्थ के अपना कर्तव्य निभाना है। इस रास्ते पर कभी उपेक्षा मिलती है, तो कभी हमारी मेहनत का श्रेय किसी और को चला जाता है।

यदि हमारे मन में समाज और अपनी संस्कृति के लिए सच्चा समर्पण है, तो हर संघर्ष एक नई सीख देता है और आगे चलकर किसी अच्छे सृजन का कारण बनता है।

वर्ष 2015 में दो गरीब बच्चियों को पढ़ाने से मैंने समाज सेवा के क्षेत्र में अपना पहला कदम रखा, 2020 से मैं उत्तराखंड की बोलि- भाषा, और सांस्कृतिक के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य कर रही हूं और भविष्य में भी इसी संकल्प के साथ कार्य करती रहूंगी।

आज फिर जीवन के द्वार पर एक नए संघर्ष ने दस्तक दी है। अनुभव ने सिखाया है कि हर संघर्ष अपने साथ एक नई सीख, नई शक्ति और नए अवसर लेकर आता है। इसलिए इस बार भी मन में न कोई भय है, न निराशा, सिर्फ एक विश्वास है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह संघर्ष भी मेरे जीवन में एक नई शुरुआत का आधार बनेगा। आज जो कठिनाई प्रतीत हो रही है, वही कल किसी सुंदर सृजन का कारण बनेगी। जीवन की हर ठोकर ने मुझे आगे बढ़ना सिखाया है, इसलिए इस बार भी मैं पूरे साहस, धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ुंगी।

"क्योंकि संघर्ष कभी अंत नहीं होता, वह एक नए सृजन की शुरुआत होती है।"

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट

गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

बिराऊक प्वौथ: कुमाऊनी कविता।

भौत दिनन बै इच्छा छी,

एक बिराऊक प्वौथ घर लौं।

काऊ, स्यैत या कुरबुरैल,

उ पर आपणी माया लुटौं।।


गूं- गूं मैं ढूंढ़ी आयूं,

बिराऊक प्वौथ कैं नै मिलौ।

मोबाइल में खोज करी मैंल जब,

एक स्यत विदेशी बिराऊ मिलौ।।


नीला- निल वीक आंख छन,

मखमल जस लाम बाल।

दूध- भात उ नै खांछी,

पेडिग्री छी वीक प्राण।।


कभै बौलक पाछिल त,

कभै ज्योड़क पाछिल दौड़े छी।

वीक नान- नानि हरकत देखि,

हम सब ओरी काउ हंसै छी।।


माठू- माठू हिटबेर जब ,

उ म्यर काखि मैं औछी।

नान- नानु पंजांल उ,

आपणी माया कै जतौछी।।


देखण वाल सब कौणी

कति मुलमुलौ छ य बिराऊ।

म्याऊं- म्याऊं करि नखार दिखैबेर,

घरम सबूंक लाडिल बणौ बिराऊ।।


स्वरचित- मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

बिल्ली रानी- बाल कविता।

बहुत दिनों से थी तमन्ना,

एक नन्ही बिल्ली घर लाऊं।

काली, धवल या चितकबरी,

जी भर उस पर प्यार लुटाऊं।।


गांव- गांव में ढूंढ़ा मैंने,

नन्ही बिल्ली नहीं मिली।

मोबाइल पर जब खोजा मैंने, 

तब एक पर्शियन बिल्ली मिली।।


नीली- नीली उसकी आंखें,

मखमल जैसे कोमल बाल।

राजकुमारी जैसी लगती,

उसकी प्यारी मतवाली चाल।।


रोटी- दूध उसे न भाता,

पेडिग्री ही उसे सुहाती।

अपने प्यारे नन्हे घर में,

रानी बनकर वह इठलाती।।


कभी गेंद के पीछे दौड़े,

कभी परछाईं से टकराए।

उसकी शैतानी देख- देख कर,

सबके चेहरे पर मुस्काए।।


धीरे- धीरे कदम बढ़ाकर,

वह मेरी गोदी में आती।

नन्हे- नन्हे कोमल पंजों से,

मन का सारा प्यार जताती।।


म्याऊं- म्याऊं करती जब आती,

घर में खुशियां नई जगाती।

उसकी नन्ही- सी अठखेलियां,

सबके मन को खूब लुभाती।।


स्वरचित- मंजू बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।


मंगलवार, 21 जुलाई 2026

चेहरों के पीछे- हिंदी कविता।

चारों ओर मुखौटों का मेला,

सच का चेहरा लाचार है।

दिखावे की चकाचौंध में,

हर संवेदना बीमार है।।


भोले मन को मूर्ख समझना,

अब जग की पहचान हुई।

चापलूसी के ऊंचे सिंहासन,

मेहनत फिर उपेक्षित हुई।।


छल- प्रपंच की आंधी ऐसी,

विश्वास बिखर- बिखर जाता है।

मित्रों के ही बदले चेहरे,

मन को भीतर तक छल जाता है।।


रिश्तों की चौखट पर देखो,

स्वार्थ का पहरा गहरा है।

हर मुस्कान के पीछे जैसे,

कोई छिपा अंधेरा है।।


मेहनत का मूल्य कहां मिलता,

झूठ यहां सम्मानित है।

मक्खन बाजी के दरबारों में,

सत्य सदा तिरस्कृत है।।


फिर भी मन से हार न मानो,

सत्य कभी मरता नहीं।

मुखौटों के इस संसार में,

ईमान कभी झुकता नहीं।।


स्वरचित- मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सोमवार, 20 जुलाई 2026

श्रीमद्भगवद्गीता- अथ प्रथमोऽध्याय:

 ॐ श्री परमात्मने नमः 

श्रीमद्भगवद्गीता 

अथ प्रथमोऽध्याय:

धृतराष्ट्र उवाच 

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। 

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ १

हिंदी भावार्थ- धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्र और पाण्डु के पुत्र क्या कर रहे हैं? 

कुमाऊनी में अर्थ- रज धृतराष्ट्र संजय ह्वै पूछनयी- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में लड़ैं करनैं ल्यी इकठ्ठ ह्वै रयी म्यर और पाण्डुक च्यल कै करनैई?

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

 गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

समीक्षा 

धृतराष्टृ संजय थें पुछण रईं, हे संजय धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध करणैकि इच्छा लिहबैर एकठ्ठ हई म्यर च्याल और पांडु च्याल के करणईं ?