एपिसोड 3 – “दिल की उलझन”
गांव में सुबह की धूप फैली हुई थी, लेकिन राधिका के दिल में आज भी रात का अंधेरा ही छाया हुआ था।
रात भर वह ठीक से सो नहीं पाई थी।
राघव का फोन न उठाना,
विनय की बातें,
और मन में उठते हजार सवाल!
राधिका ने आंगन में बैठकर चाय का कप हाथ में लिया।
तभी आदित्य उसके पास आकर बैठ गया।
“मा, तुम फिर से उदास लग रही हो।”
बच्चे की बात सुनकर राधिका हल्का मुस्कुराई-
“नहीं बेटा, बस थोड़ा सिर दर्द है।”
आदित्य ने मासूमियत से कहा-
“मां, अगर पापा हमें छोड़कर चले गए तो?”
यह सवाल राधिका के दिल में तीर की तरह लगा।
वह कुछ देर चुप रही।
फिर बेटे का हाथ पकड़कर बोली-
“ऐसा कभी मत सोचना।”
लेकिन उसकी आवाज कांप रही थी।
उस दिन गांव में हाट लगा था।
राधिका कुछ सब्जियाँ खरीदने हाट की तरफ चली गई।
वहां उसकी मुलाकात कमला दादी से हुई।
कमला दादी ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।
“बहू, तू बहुत परेशान लग रही है।”
राधिका ने झूठी मुस्कान दी-
“नहीं दादी, मैं ठीक हूं।”
दादी ने धीरे से कहा-
“सच छिपाने की कोशिश मत कर। दर्द अंदर ही अंदर बढ़ जाता है।”
राधिका चुप रही।
उसी समय उसे दूर से वही अजनबी आदमी विनय दिखा।
विनय उसके पास आया।
“मैंने सोचा था कि आप मुझसे फिर बात करेंगी।”
राधिका ने कहा-
“मैं क्या पूछूं?”
विनय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला-
“रोहित पर लगा आरोप बहुत गंभीर है। अगर सच सामने आया तो उनका नौकरी से जाना तय है।”
राधिका का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“लेकिन ! राघव ऐसा नहीं कर सकते,” उसने धीरे से कहा।
विनय ने गहरी नजर से उसकी तरफ देखा —
“कभी-कभी हम जिन पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं… वही हमें सबसे ज्यादा चोट देते हैं।”
यह सुनकर राधिका की आंखें भर आईं।
वह बिना कुछ बोले वहां से चली गई।
घर पहुंचकर उसने दरवाजा बंद कर लिया।
उसके हाथ काँप रहे थे।
वह सोचने लगी-
क्या राघव सच में कुछ छिपा रहे हैं?
अगर राघव दोषी निकले तो?
आदित्य का क्या होगा?
उसका अपना भविष्य क्या होगा?
शाम होने लगी थी।
गाँव की पहाड़ी के पीछे सूरज छिप रहा था।
तभी अचानक घर के बाहर एक गाड़ी रुकी।
राधिका बाहर आई।...
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स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।