एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकक ऋषिल वेदव्यास ज्यूक लाडिल शिष्य सूत ज्यू थै पैलाग कै बैर उन्हा है कौणी- "द्याब ज्यू ! तुमर ज्ञान अज्ञान रूपी अंयार कै खत्म कर दिणी वाल करोड़ों सूर्यक समान छौ, आज तुम हम सबूंकै अमृत रूपी, सारगर्भित एक काथ सुनावौ। हम सबै मन्खी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य ल कसिक आपणी बुद्धि कै शुद्ध करौं? वैष्णव लोग यौ मायाजाव बै कसिक आपणी पिण्ड छुणौनी? आजक यौ कलयुग में सबै जीव राक्षस स्वभाव क है गयी, मन्खी में गुस्स, लालच, मायाजाव सकर पाईं जांणौ।
आपुं हमूं कै कोई यस शाश्वत उपाय बतावौ जो पवित्र है पवित्र, कल्याणकारी हो, जो हमूकै श्री कृष्ण क प्राप्ति करै द्यौ। और उ उपाय ल कै सबै जीवों क क्वाठक दुख, पीड़ और डर दूर है जौ, और उ भगवान में ध्यान लगैबेर यौ दुःख भरि भवसागर बै पार है जौ।"
यौ सुणिबेर सूत ज्यू कोनी- "हे शौनक ज्यू! तुमर क्वाठ में भगवानक ल्यी शुद्ध मायाजाव छू, आपूं ल कलयुगक मंखियोंक ल्यी भौते भलि बात पुछि रौ, मैं आज आपूं सबूं कै सबै सिद्धांतोंक निष्कर्ष निकालि हुई काथ सुणौंल, जो मरण- ज्यूनिक डर कै खत्म कर द्यौल, और क्वाठ में भक्ति क दी जगै द्यौंल।"
सूत ज्यू कौणी- "द्याप्त व्यास ज्यूल जीवों कै मरण- ज्यूनि चक्र बै बचौणक ल्यी और बैकुंठ धाम जाणक ल्यी श्रीमद्भागवत महापुराण काथ लिख रौ, मन कि शुद्धि ल्यी यौ है बढ़बेर कोई साधन नैं हैं, जब मन्खियांक जन्म जन्मांतर क पुण्य उदय हुणी, तबै यौ भागवत महापुराण शास्त्र सुणन और पढ़न हुणी मिलौं। अमृत रुपी यौ काथ कै सुणन- पढ़नक बाद सबै जीव आवागमन चक्र बै छुटिबेर मुक्त है जांणी।
यौ काथ कै उनर च्यल शुकदेव ज्यू क श्री मुख बै मैंल लै सुण रौ, अब मैं आपूं लोगोंन कै श्रीमद्भागवत महापुराण कि कथा सुणौनूं। सबै ध्यानल सुणौं- यौ काथ सबूं है पैली श्रृंगी ऋषि क श्राप दीणक बाद महाराज परीक्षित कै शुकदेव ज्यूल सात दिन सुणैंछ।
यौई काथ कै सनकादिक ऋषियोंल द्याप्त नारद ज्यू के सात दिन सुणै और यै कै सुणनैकि विधि बतै।"
इतुक कथा सुणिबेर शौनक ऋषि कुणी- "सूत ज्यू! द्याप्त नारद ज्यू एक जाग द्वी घड़ि बै सकर टैम नै रुक सकन, त द्याप्त नारद ज्यू एक हप्त तक एक जाग कै कसिक टिक गईं? और सनकादिक ऋषियों त दर्शन मिलन बड़ दुर्लभ छू। उं द्याप्त नारद ज्यू कै कसिक मिल गईं? और सबूं है पैलि हप्त भरी यौ पारायण क्वै जाग होछ ? आपूं जरा विस्तारै ल हम सबूंकै बतावौ।"
यौ सुणिबेर सूत ज्यू कोणी-" एक बार सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार चारों भई घुमन- घुमने बद्रीकाश्रम पहुंची त वां उनुल द्याप्त नारद ज्यू कै उदेखी बेर बैठी द्येखौ, उनकें उदेख लागि देख सनकादिक ऋषि कुणी- "हे नारद ज्यू के बात छू? तुम इतुक किलै उदेखी रौछा? ऐल तुम यस मन्खी लागन छा जसिक कि तुमर सबै धन लुटि गै हुन्यौल, तुम जस विरक्त संतक ल्यी यौ सही बात नै हैं, कै कारण छू हमूकै बतावा?"
द्याप्त नारद ज्यू उन चारों ऋषियों है पैलाग कै बेर कुणी, -"हे मुनिश्वरो मैं आपूं लोगों कै आपण उदेखीणक कारण बतौनू। आपूं लोग ध्यानल सुणिया, मैं पुष्कर , प्रयाग, काशि, गया, गोदावरि, जगन्नाथपुरी, हरिद्वार, और ऋषिकेश सबै पवित्र तीर्थ में घुमि बेर ऐ गयूं। मन कै संतोष दिणी वालि शांति मैके कांईं नै मिलि। मैं यौ द्यैखिबेर भौते दुखी है गयूं कि यां जतुक लै मन्खी छैं, सबै मायाजाव में इतुक सकर है फंस रैयीं, उनर उ रूप द्यैख बेर सत्य, दया और धर्म वां बै भागि बेर दूर नै गईं, सबै जीव आपणी परिवार क पालण - पोषणक बार में सोचणौं, सबै जीव आलसी, मंदबुद्धि और भाग्यहीन है गयीं। काम, गुस्स, घमंड, लालच और क्लेशल मन्खी कै कस बेर जकड़ राखौ। उ छल, कपट और झूठ ल आपण जीवन कै चलौणौं, घर में सैणी क राज हैरौ, घरक हर काम में साव कि सलाह ल्यी जाणैं, रूपैं - पैसों क लालच में आदिम आपणी च्यैलि ब्या बुढ़ांक साथ और आपुं है नानि जात में कर दिणौ, बामन रूपै ल्यी बेर वेद पणौंनौ, बामन, ठाकुर, बैश्य, शूद्र कोई लै जातिक लोग आपण धर्मक पालन नैं करनैं।
घूमने- घामने जब मैं मथुरा में यमुना नदी क किनार पहुंची, तब मैंल वां एक भौते आश्चर्य चकित नजार द्येखौ, एक ज्वान सैंणी बिहोश हुईं द्वी बुढ़ आदिमों क पास बैठिबेर जोर- जोर ल डाढ़ मारनै छी, वां कै हैरौ हुन्यौल? यौ जाणनाक ल्यी मैं उनर पास गयूं, मैं कै द्यैकते ही उ सैंणी ठाड़ि हैगे, और डाढ़ मारते हुए मैं थै कुणी- "द्याब ज्यू ! तुम त म्यर फुटी भाग कि कहाणी सुण ल्या, और म्यर चिंता कै खत्म कर द्यिया। तुमरि बातों ल है सकों म्यर दुखी मन शांत है जौ, किलैकि भौत भाग्यल तुमर दर्शन हुनि।"
उ सैंणी क बात सुणि बेर मैंल वी थै पुछौ- "को छा तुम? यौ बिहोश हुईं बुढ़ आदिम को छैं?" म्येरी बात सुणबेर उ सैंणी कुणी- "मैं नौं भक्ति छूं, यौं द्विनों म्यर च्याल छैं।" एक क नौं ज्ञान छौ, दुसरक नौं वैराग्य छौ। और यौ जो द्वि-चार सैंणिन भै रयीं, यौ गंगा- यमुना और बकै नदि छन, यौ सबै म्येरि सेवा करण हुणि म्यर पास ऐ रयीं। लेकिन मैं कै फिर लै शांति नैं हैं।
मैंल द्रविड़ देश में जन्म ल्यी रौ, कर्णाटक में ज्वान हैं यूं, और मैं भौत टैम तक दक्षिण देश महाराष्ट्र में रयूं, और जब मैं गुजरात आयूं, वां घोर कलयुग और पाखंड ल जड़ फैल रौछी, वां जाईबेर मैं और म्यर च्याल बुढ़ है गईं। लेकिन जसै मैं वृंदावन आयूं, मैं फिर ज्वान है गयूं, अब मैं यौ जाग कै छोड़ि बेर नै जाण चान,, लेकिन म्यर द्विनों च्याल भौत बुढ़ और कमजोर है गईं। बोलण त भौत दूरकि बात हैगै यौ आंख खोलि बेर द्येख लै नैं सकनैं। मैं ज्वान और म्यर च्याल बुढ़! यौ बात ल मैं कैं भौत दुख हैरौ। हे द्याब ज्यू ! मैं ज्वान और म्यर च्याल बुड़ यौ सब कसिक है गौ हुन्यौल? हुन त यौं चैण छी मैं बुढ़ि हुन और म्यर च्याल ज्वान। तुम त भगवान क भौत ठुल भक्त छा, और तुमु कै ज्ञान लै भौत छौ, मैं कै यैक कारण बतै द्यौ।"
भक्ति रूपकि उ सैंणी बात सुणीबेर द्याप्त नारद ज्यू आपणी ज्ञान और ध्यान लगै बेर कौणीं- "हे भक्ति घोर कलयुग औण पर त्वै में, ज्ञान और वैराग्य में मन्खियोंक जरा लै श्रद्धा भाव नैं हैं, यौइ कारणेंल तुम तीनों इतुक कमजोर है गौछा।
वृंदावन में आइ बेर तू त ज्वान है गछी, धन्य छौ यौ वृंदावन धाम। लेकिन त्यर द्विनों च्यलां कै यौ कलयुग में क्वै नैं जाणन। यौइ कारणेंल त्यर द्विनों च्याल इतुक बुढ़ और कमजोर है गईं।"
द्याप्त नारद ज्यू कि बात सुणीबेर भक्ति कौणी- "यदि कलयुग इतुक दुष्ट और पापि छौ त महाराज परीक्षित ज्यूल उकै जिन्द किलै छोड़ी? किलै कि वी पै दया दिखैबेर सबै मन्खियोंक धर्म - कर्म छुटि गौ। यकै त मौत दिण भौते जरूरी छी। भगवान यौ सब अधर्म कसिक द्यैखण लागि रैयी? हे द्याब ज्यू म्येरी शंका दूर करौ।"
भक्ति बात सुणिबेर द्याप्त नारद ज्यू कौणी- "हे भक्ति भगवान श्री कृष्ण जब यौ धरती कै छोडि बेर परमधाम गईं, तबै कलयुग आछ, राजा परीक्षित ल जब जाणौ कि कलयुग में कई अवगुण हुण पारी एक भौत खास गुण छौ, कि दुसर युगों में सैकड़ों वर्षों तक जप, तप, यज्ञ, दान और धर्म करण पर लै मनखी कै भगवान क दर्शन नै है पाछी, लेकिन कलयुग में जो मनखी सच्च मनल कै भगवान क ध्यान करल और नाम जप करल, वी पै भगवान भौत जल्दी खुशि है जाल, और आपण दर्शन द्यी द्याल, यौई कारणैल महाराज परीक्षित ज्यूल कलयुग कै रौण द्यी।
लेकिन दुर्भाग्य यौ छौ कि कलयुग क मन्खी यौ सितिल उपाय लै नै कर सकनैं, किलैकि उनूल धर्म - कर्म सबै छोड़ि हालिं। बामन पुज- पाठ में सकर दान- दक्षिण ल्यी बेर प्रायश्चित नै करणै। यौ कारणेंल पूज- पाठक सार खत्म हैगौ, तीर्थों में नास्तिक और पाखंडी मन्खी ज्यादा रौणीं, यौ कारणैल तीर्थोंक प्रभाव खत्म हैगौ। चित्त में राग-द्वेष रखबेर मन्खी तप करणौं। यौ कारणेल आज तप क सार नैं हैं मन वश में नै हुन पर लालच, पाखंड और घमंड में शास्त्रोंक स्वाध्याय नैं करण पर ध्यान योगक फल लै मिट गौ।
यौ कलयुग में नाणतिन ईजा- बोज्यूक कै नैं माणनै, सैणीं आपणी मैंसक कै नैं माणनैं, बाबा, साधु-संत गृहस्थी है सकर मायाजाव में बादि रौ, सबै मन्खियोंल सत्य, धर्म, दयाभाव छोड़ि हालौ। और सबै जीव काम, गुस्स, लालच, झगड़- पतड़ में फंसि बेर आपणी यौ जीवन कै काटनौं।
भक्ति यौई कलयुग क स्वभाव छौ। और भगवान सब द्यैखण रैंयी और सहन करनैईं।
कलयुग में सबै जीवोंक कर्तव्य छौ उ सत्य और संतोष क साथ आपण धर्म और कर्म में मगन रै बेर भगवान क नाम संकीर्तन-भजन, जप करौ और सबन जीवों पै दया भाव रखौ।"
भक्ति कुणी - "द्याब ज्यू म्यर अहोभाग्य छै जो आज मैं कैं तुमर दर्शन हुईं, तुमर बातोंल मैं के भौतै शांति मिलि। सही कौणी संसार में साधु-संतोंक दर्शनोंल हमेशा सही दिशा मिलैं और सौभाग्य बढ़ौं। तुमर उपदेश दिण पर प्रहलाद ल मायाजाव पर जीत हासिल करी। ध्रुव कै ध्रुवपद मिलौ। सृष्टि पैद करनि और सबूं क मंगल चाणी ब्रह्मा ज्यूक तुम महान च्याल छा, तुम हमेशा सबूं क दुःख कै दूर कर छा।
म्यर द्विनों हाथ जोडि बेर तुमर खुटा में पैलाग, और मैं विनती करनूं कि तुम मैं कै कोई यस सरल उपाय बतै द्यौ जकै कर बेर म्यर द्विनों च्याल ज्वान है जौ, और म्यर दुःख दूर है जौ।"
अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।