मेरे घर के सामने बस्ती में रहता था, कालूराम का परिवार।
'पत्नी भूरी और बेटी मुनिया थे', 'उसके संसार'।।
शिक्षा से, अनभिज्ञ थे दोनों।
मेहनत- मजदूरी, करते थे दोनों।।
बस्ती से कुछ ही बच्चे, स्कूल जाते थे।
बाकी बच्चे डोलते- फिरते, और खेलते रहते थे।।
अपनी सोसाइटी से कपड़े इकट्ठे कर, मैं अक्सर बस्ती में जाती।
महिलाओं और बच्चों को, शिक्षा का महत्व समझाती।।
छोटी- छोटी बच्चियों को, गुड टच- बैड टच का अंतर समझाती।
इसलिए बस्ती की महिलाएं और बच्चियां, टीचर दीदी कहकर बुलाती।।
उन बच्चों में, मुनिया मुझे बेहद प्रिय थी।
क्योंकि उसे, पढ़ने की बड़ी ललक थी।।
मुनिया हमेशा स्कूल जाते, बच्चों को देखती।
काश! "मैं भी स्कूल जाती," वह अक्सर सोचती।।
भूरी से मुनिया कहती, "मां मुझे भी स्कूल जाना है।"
भूरी कहती, "बेटी स्कूल जाकर क्या करना है?"
"बड़ी होकर तूने, चूल्हा- चौका करना है।"
"और शादी हो जाने पर, अपना घर संभालना है।।"
मां की बातें सुनकर मुनिया का, कोमल मन टूटता था।
पर स्कूल जाने का, उसका सपना हमेशा जिंदा रहता था।।
मजदूरी से लौटकर शाम को, सभी मजदूर इकट्ठे होते।
कच्ची देशी शराब पीकर, आपस में लड़ते- भिड़ते।।
पड़ोस के हामिद चाचा, कालूराम के घर आते- जाते।
मीठी- मीठी बातें करके, अपनापन जताते रहते।।
कभी वो कुरकुरे लाते, कभी टॉफियां लाते।
और आकर मुनिया से, खूब सारा लाड़- लड़ाते।।
एक दिन मुनिया घर में, अकेले ही खेल रही थी।
दुनिया से वो, बिल्कुल ही बेखबर थी।।
रोजाना की भांति, हामिद चाचा घर पर आये।
मुनिया को अकेली देख, कुकृत्य के कीड़े कुलबुलाये।।
बोले! चल मुनिया बेटा, तुझे आइसक्रीम खिलाऊंगा।
संग में एक चटपटा सा, कुरकरा भी दिलाऊंगा।।
छुपा हुआ था, धोखा उसकी बातों में।
विकृत मानसिकता छुपाई थी, शांत चेहरे में।।
आइसक्रीम- कुरकुरे दिलाकर, मुनिया को अपने घर ले गया।
गोद में बैठाकर नन्ही मासूम को, वह कुकृत्य को तैयार हुआ।।
हामिद चाचा के छूने पर, मुनिया को असहज महसूस हुआ।
देखते ही देखते हामिद चाचा, राक्षस सा प्रतीत हुआ।।
मुनिया को झट से, टीचर दीदी की बात याद आ गई।
हामिद चाचा की हरकतें गंदी हैं, यह बात उसके समझ में आ गई।।
“कोई भी छुए, अगर गलत तरीके से।
तो मना करना है, दूर रहना हर हाल में।।”
तभी “अंकल छोड़ो मुझे,” मुनिया चिल्लाई।
मम्मी- पापा बचाओ मुझे, उसने पूरी ताकत से आवाज लगाई।।
सुन मुनिया की आवाज, पास- पड़ोसी दौड़ कर आए।
हामिद की हरकत देखकर, सभी लोग स्तब्ध हुए।।
मुनिया ने रो- रोकर, सारा हाल बताया।
पड़ोसियों ने पुलिस बुलाकर, हामिद को अरेस्ट कराया।।
सुनी खबर कालू- भूरी ने, वो बेतहाशा घर को दौड़े।
कोई अनहोनी ना हो प्रभु, दोनों ने हाथ जोड़े।।
देख मुनिया को भूरी ने, अपने सीने से चिपका लिया।
सकुशल देख बिटिया को, कालू ने प्रभु का धन्यवाद किया।।
कालू- भूरी को मुनिया ने, हामिद की सारी करतूत बताई।
टीचर दीदी की बात याद आने पर, खुद को कैसे बचाया बात दोहराई।।
कालू- भूरी अन्य सभी अब, शिक्षा का महत्व समझ गये।
अगले दिन ही मुनिया और अन्य बच्चों को, स्कूल में दाखिला के लिए ले गये।।
मुनिया और बच्चे गये, पहली बार स्कूल के द्वार।
खुल गया सभी बच्चों का, ज्ञान का सुंदर संसार।।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश