Sunday, 15 March 2026

फूलदेई: कविता।

जब मेरे पहाड़ों में बसंत आता है,

धरती का कण- कण मुस्काता है।

डालियों पर सजे रंग- बिरंगे फूल,

खुशियों की मधुर बहार ले आता है।।


नन्हे-नन्हे हाथों में फूलों की टोकरी लेकर, 

जब बच्चे देहलीज पर आते हैं।

“फूल देई, छम्मा देई” गाते हुए,

हर आंगन को आशीष दे जाते हैं।।


देहलीज पर बिखरे वो नन्हे-नन्हे फूल,

सिर्फ फूल नहीं, स्नेह से भरे अनमोल फूल।

इनमें छिपा रहता है अपनापन और प्यार,

दुआओं की गर्माहट, मेरे पहाड़ का सत्कार।। 


छोटे- छोटे बच्चों की मासूम हंसी में, 

 मेरे पहाड़ की सादगी बसती है।

उनकी चमकती आंखों में, 

नई उम्मीदों की रोशनी दिखती है।।


फूलदेई का यह प्यारा त्योहार,

देहलीज पर बिखेरता खुशियों की बहार।

सिर्फ फूल ही नहीं बरसाता हर द्वार,

दिलों में प्रेम जगाता, रिश्तों में घोलता मिठास अपार।। 


जैसे! मंजू बसंत की नरम हवा, 

थके हुए मन को सहला जाती है।

वैसे ही फूलदेई हर दिल में फिर से, 

खुशियों की कोपलें खिला जाती हैं।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।