गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

श्रीमद्भागवत महापुराण कथा: सुख सागर; अध्याय -1 ( भक्ति, ज्ञान और वैराग्य क) कुमाऊनी बोलि में अनुवाद।1

 एक दिन नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक और अठ्टासी हजार बैठि ऋषियोंल वेदव्यास ज्यूक लाडिल शिष्य सूत ज्यू ह्वै कौनी- "द्याब ज्यू ! तुम हमकैं यसि अलौकिक कहानि सुनावा जिमै भक्ति, ज्ञान और वैराग्य क बार में सकर खबर हो, किलै कि आजक यौ कलयुग में सबै प्राणी न में गुस्स, लालच, मायाजाव सकर पाईं जां। यई कारणैल सबै प्राणी आठो पहर दुःख और डरल परेशान छैं, आपुं परमपिता परमेश्वर क यस चरित्र क वर्णन करौ जकै सुणि और पढ़िबेर सबै प्राणीनाक क्वाठक दुख, पीड़ और डर दूर ह्वै जौ और उ परमेश्वर क खुटांन में ध्यान लगैबेर यौ दुःख भरि भवसागर बै पार ह्वै जौ।

यह सुणिबेर सूत ज्यू कोनी-"हे ऋषिवरो ! आपूं लोगों ल कलयुगक मंखियोंक ल्यी भौते भलि बात पुछि रौ, मैं आपूं लोगोंन कै श्रीमद् भागवत महापुराण कि कथा सुणौनूं।

जो कि श्रृंगी ऋषि क श्राप दीणक बाद महाराज परीक्षित कै शुकदेव ज्यूल सात दिन सुणैं छ। 

यौ अमृत रुप में कथा कै सुणन पढ़नक बाद सबै प्रणी आवागमन चक्र बै छुटिबेर मुक्त ह्वै जां। यौई पुराण कै सनकादिक ऋषियों ल द्याप्त नारद ज्यू के सात दिन सुणै और यौ पुराण कै सुणनैकि विधि लै बतै।"

इतुक कथा सुणिबेर शौनकादिक ऋषि कुण लागि- "सूत ज्यू! द्याप्त नारद ज्यू एक जाग द्वी घड़ि से सकर टैम नै रुक सकन, त द्याप्त नारद ज्यू एक हप्त तक एक जाग कै कसिक टिक गईं। और सनकादिक ऋषियों त दर्शन मिलन बड़ दुर्लभ छू। उं द्याप्त नारद ज्यू कै कसिक मिलि और सबूं ह्वे पैलि हप्त भरी यौ पारायण क्वै जाग होछ, आपूं जरा विस्तारै ल हम सबूंकै बतावौ।"

यौ सुणिबेर सूत ज्यू कोणी- एक बार सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार चारों भई घुमन घुमने बद्रीकाश्रम पहुंची त वां उनुल द्याप्त नारद ज्यू कै उदेखी बेर बैठी द्येखौ, उनकें उदेख लागि देख सनकादिक ऋषि कुणी- "ओ नारद ज्यू के बात छू? आपूं इतुक किलै उदेखी रौछा?

द्याप्त नारद ज्यू उन चारों ऋषियों ह्वै पैलाग कै बेर कुणी, -"हे मुनिश्वरो मैं आपूं लोगों कै आपण उदेखीणक कारण बतौनू। आपूं लोग ध्यानल सुणिया, मैं काशि, गया, गोदावरि, जगन्नाथ और ऋषिकेश सबै पवित्र तीर्थ में घुमि बेर ऐ रैयूं। लेकिन मैं यौ द्यैखिबेर दुखी ह्वै गयूं कि यां जतुक लै प्राणी छै सबै मायाजाव में इतुक सकर ह्वै फंस रैयीं, उनर उ रूप द्यैख बेर सत्य, दया और धर्म वां है भागि बेर दूर नै गई, और काम, क्रोध, मद, लोभ और क्लेश आपणी सेना क साथ सबै मंखियां कै डरै धमकै बेर मौज ल राज करनौ। 

सबै मन्खी आठों पहर आपण और आपणी परिवार क पालण - पोषणक बार में सोचण रौं, छल, कपट और झूठ ल आपण जीवन कै चलौणौ। इज- बाज्यू और गुरुनों कि कैं नै मानिबेर सैंणी, सासु- सौर और सावै कि कै मानि बेर काम करनौं, रूपैं - पैसों क लालच में आपणी च्यैलि ब्या बुढ़ांक साथ और आपुं ह्वै नानि जात में कर दिणौ, सबै जाग बामन, ठाकुर, बैश्य, शूद्र कोई लै आपणी धर्मक पालन नै करनै। 

घूमने- घामने जब मैं मथुरा में यमुना नदी क किनार पहुंची, तब मैं ल वां एक भौते आश्चर्य चकित नजार द्येखी, एक जवान सैंणी बिहोश हुईं द्वी बुड़ आदिमों क पास बैठिबेर जोर- जोर ल डाढ़ मारन छी और आपणी सहायता ल्यी बुलौण छी, अचानक उ सैंणी क नजर मैं में पढ़ी त उ ठाड़ि ह्वैगे और मैं थै कुणी- 

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"महाराज म्यर अहोभाग्य जो मैं के तुमर दर्शन ह्वै गईं, तुम त म्यर फुटी भाग क कहाणी सुण ल्या। उ सैंणी क बात सुणि बेर मैंल वी थै पुछौ- को छा तुम? यौ बिहोश हुईं बुड़ को छैं? म्येरी बात सुणबेर उ सैंणी कुणी - मैं भक्ति छूं, यौ द्विनों म्यर च्याल छैं, एक क नौ ज्ञान छौ, दुसरक नौ वैराग्य छौ। और यौ जो द्वि-चार सैंणिन भै रयीं, यौं गंगा-यमुना और बकैं नदि छन, यौ सबै म्येरि सेवा करण हुणि म्यर पास ऐ रयीं।

मैंल द्रविड़ देश में जन्म ल्यी रौ, कर्नाटक में ज्वान ह्वैबेर मैं भौत टैम तक दक्षिण देश में रयूं, मैं गुजरात गयूं, वां जाईबेर मैं बुड़ी ह्वै गयूं।

लेकिन जसै मैं वृंदावन आयूं, मैं फिर ज्वान ह्वै गयूं, लेकिन म्यर द्विनों च्याल भौत बुड़ और कमजोर ह्वै गई। बोलण त भौत दूरकि बात ह्वैगै यौ आंख खोलि बेर द्येख लै नै सकनै। मैं ज्वान छौं और म्यर च्याल बुड़, जब यौ दुणी हमर तरफ द्यैखें त मैं कैं भौत शरम लागि जैंछ, और भौते दुख लै हौंछ। हे द्याब ज्यू यौ सब कसिक हो हुन्यौल?"

भक्ति रूपकि उ सैंणी बात सुणीबेर  और भौत सोच विचार बेर मैं ल वी थैं क, हे- "भक्ति घोर कलयुग औण पर त्वै में और ज्ञान और वैराग्य में मन्खियोंक जरा लै श्रद्धा भाव नैहैं, यौइ कारणेंल तुम तीनों इतुक कमजोर ह्वै गछा, वृंदावन में आइ बेर तु त ज्वान ह्वै गछी, लेकिन त्यर द्विनों च्यलां कै यौ कलयुग में क्वै नैं जाणन।यौइ कारणेंल त्यर द्विनों च्याल बुड़ और कमजोर ह्वै ग्यान।"

द्याप्त नारद ज्यू कि बात सुणीबेर भक्ति कौणी- "यदि कलयुग इतुकै दुष्ट और पापि छौ त महाराज परीक्षित ज्यूल उकै जिन्द किलै छोड़ी, किलै कि वी पै दया दिखैबेर सबै मन्खियोंक धर्म - कर्म छुटि गो। यकै त मौत दिण भौते जरूरी छौ।"

भक्ति बात सुणिबेर द्याप्त नारद ज्यू कौणी- " भक्ति यौ कलयुग में कई अवगुण हुण पारी एक भौत खास गुण यौ छौ, कि दुसर युगों में सैकड़ों वर्षों तक जप, तप, यज्ञ, दान और धर्म करण पर लै मनखी कै भगवान क दर्शन नै हौंछी, लेकिन कलयुग में जो मनखी सच्च मनल कै भगवान क ध्यान करल और नाम जपल करल, वी पै भगवान भौत जल्दी खुशि ह्वै जाणी, और आपण दर्शन द्यी दिणी, लेकिन दुर्भाग्य यौ छौ कि कलयुग क मन्खी यौ सितिल उपाय लै नै करणै, किलैकि उनूल धर्म - कर्म सबै छोड़ि हालि। बामन लै सकर दान दक्षिणा ल्यी बैर प्रायश्चित नै करणै। नाणतिन ईजा- बोज्यूक कै नै माणनै, सैणीं आपणी मैंसक कै नै माणनैं, बाबा, साधु-संत गृहस्थी ह्वै सकर मायाजाव में बादि रौ, सबै प्राणी न में सत्य, धर्म, दयाभाव नै ह्वैबेर काम, गुस्स और पाप भौतै बढ़ गो, सबै मन्खियोंक कर्तव्य छौ उ सत्य और संतोष क साथ आपण धर्म और कर्म में मगन रै बेर भगवान क भजन और नाम जप करौ और सबन प्राणीन पै दया भाव रखौ।"

द्याप्त नारद ज्यू कि बात सुणी बेर भक्ति कौणी- "मुनिवर आपूं भौत महान छा। म्यर अहो भाग्य मैं कैं तुमर दर्शन ह्वै गईं, तुम सबूं क दुःख कै दूर कर सकै छा, मैं  तुमर खुटा में पड़ि हाथ जोडि बेर विनती करनूं कि तुम कोई यस सरल उपाय बतै द्यौ जकै कर बेर म्यर द्विनों च्याल ज्वान ह्वै जौ और‌ म्यर दुःख दूर ह्वै जौ।"

अनुदित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।