Thursday, 29 January 2026

कान्हा: हिंदी कविता।33

कान्हा तेरी लगन लगी, मैं रोई- रोई जाऊं।

वह राह बता दे इसमें चलकर, मैं तुझको पा जाऊं।।

मंदिर- मंदिर तुझको ढूंढूं, कहीं ना तुझको पाऊं।

तेरी सेवा करके कान्हा, मैं तुझको रिझाऊं।।


जानती हूं मैं भी कान्हा, मेरे मन मंदिर में तू बैठा है।

लेकिन मन बावरा फिर भी, तुझको ढूंढने निकला है।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह बाती कैसे बनाऊं।

जिससे मन मंदिर के अंदर, मैं तेरी ज्योति जलाऊं।।


सुना है तेरे नाम सुमिरन से, मैं तुझको पा सकती हूं।

पर! इस गृहस्थ जीवन में, तेरा नाम बिसरा देती हूं।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह भक्ति कैसे जगाऊं।

जिससे माया के बन्धन से, मैं बाहर निकल जाऊं।।


भाव देखेगा इस दासी के, कभी तो कृपा बरसायेगा।

आस का दीप जलाये बैठी हूं, मन- मन्दिर में दर्शन देगा।

मेरे लाडले है ये भरोसा, मेरी सेवा स्वीकार होगी।

इस जन्म में नहीं अगले जन्म में सही, तुझे पाने की मन्नत पूरी होगी।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट। 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सर्वाधिकार सुरक्षित।