एक गरीब घर की बेटी हूं मैं, ज्योति है मेरा नाम।
घर की जिम्मेदारी मुझ पर आई करने लगी मैं कंपनी में काम।।
2020 से महामारी और बिमारियों का शोर है
प्राइवेट नौकरी करने वाले अभी भी बेरोजगार हैं।।
बाबू जी जब से बेरोजगार हुए, मेरे भी घर के बूरे हाल हुए।
छोटी सी नौकरी मिलने पर मुझे, मां- बाबू जी निहाल हुए।।
कुछ दिनों में पता चला, कंपनी में होते हैं काले धंधे तमाम।
सोच लिया तब ही मैंने, छोड़ दुंगी यह नौकरी ढूढुंगी दूसरा काम।।
हवसी दरिंदों के बीच आ गई हूं, कतई समझ न पाईं मैं।
दरिंदों की काली दृष्टि से, स्वयं को बचा नहीं पाई मैं।।
रसूखदार हवसी दरिंदों ने, आज बनाया मुझे शिकार।
रो- रोकर दे रही थी दुहाई मैं, चीख- चीखकर लगा रही थी गुहार।।
ना सुनी किसी ने मेरी फरियाद, और ना सुनी चीख- पुकार ।
समाज के ठेकेदारों ने कर दिया, मेरे जीवन में अंधकार।।
तन, मन और आत्मा की यह पीड़ा, मुझसे सही नहीं जा रही थी।
आंखों में झरझर आंसू, थमने का नाम नहीं ले रही थी।।
हे भगवान! यह सब क्या हो गया?, क्यों मेरी जिंदगी उजड़ गई?
किससे कहूं? कैसे कहूं?, मेरी ये जिंदगी बेमतलब सी हो गई।।
ज्यों ही मां- बाबू जी, भाई- बहनों का चेहरा, आया नजरों के सामने।
हिम्मत जुटाकर उठी और खाई कसम, हार नहीं मानुंगी इन दरिंदों के सामने।।
इनके सारे काले कारनामे, आज सरेआम करूंगी।
इन हवसी दरिंदों को, मैं सलाखों के पीछे भेजुंगी।।
दर्द- पीड़ा से कराहती और लंगड़ाती, मैं कंपनी से आईं बाहर।
मेरे स्त्रीत्व का दाम देने लगे, हवसी दरिंदे मुझे धमका कर।।
अब भी निडर होकर, स्वाभिमान से खड़ी थी मैं।
आंखें मिलाकर, दुष्कर्मियों से लड़ रही थी मैं।।
हार नहीं मानी जब मैंने, दरिंदों ने मुझे जिंदा मार दिया।
अपने कुकृत्यों को ढकने के लिए, मुझे नदी में फेंक दिया।।
समाज के ठेकेदारों ने, एक गरीब घर की ज्योति को बुझा दिया।
और सोचा अपने दुष्कर्म का हमने, नामों निशान मिटा दिया।।
मेरी इन आंखों ने कई सपने संजोए थे।
गरीब होने पर भी मां-बापू जी मुझे पढ़ा-लिखा रहे थे।।
दरिंदों ने नहीं भरने दी, मेरे सपनों को उड़ान।
तन, मन और आत्मा को, नोंचकर ले ली मेरी जान।।
क्या कसूर था मेरा, तू ही बता दे ऐ भगवान।
हंसते- खेलते मेरे परिवार को, दुःख दे दिए क्यों तमाम।।
बन गई मेरी कहानी, एक दर्दनाक अफसाना।
जिसे बरसों याद रखेगा, ये सारा जमाना।।
मेरा दर्द, संघर्ष और साहस की, मेरी ये कहानी।
किताबों में मिलेगी, अब मेरी जिंदगी की निशानी।।
मेरे न्याय के लिए, एक दिन आवाज जरूर उठेगी।
न्याय मिलगा तब मुझे, दोषी को मौत की सजा मिलेगी।।
दूसरी ज्योति कोई ना बने, ऐसा शक्त कानून बना दो सरकार।
महिलाएं और बेटियां बेफिक्र जिएं, उन्हें दे दो ये अधिकार।।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।