अक्सर मन की दहलीज़ पर एक सपना दस्तक देता था, हम सब प्रवासी मिलकर एक संसार बसाएँ।
इस परदेस की अपरिचित गलियों में, अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू फिर से महकाएँ।।
सोचा था ! क्यों न दूर वादियों की स्मृतियों को, दिलों के आँगन में उतार लें।
क्यों न इस अजनबी शहर में, अपना सा एक छोटा उत्तराखंड सँवार लें।।
बिखरे चेहरों में अपनापन खोजा, संकोच की दीवारें धीरे-धीरे गिराईं।
उत्रैणी–मक्रैणी के पावन अवसर पर, मिलन की दीपशिखाएँ जगमगाईं।।
ढूँढ-ढूँढ कर सबको जोड़ा, स्नेह के धागों में विश्वास पिरोया।
बोली भले अलग-अलग थी, पर हर हृदय ने पहाड़ों का प्रेम संजोया।।
धीरे-धीरे मुस्कानों ने रिश्तों को आकार दिया, विश्वास ने जड़ों को गहरा किया।
एक छोटे से मंच से आरंभ हुआ सफ़र, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में नव इतिहास रच दिया।।
हाँ, राह में मतभेद भी आए, कुछ क्षणों ने मन को डगमगाया।
पर हमने साहस की ज्योति थामे रखी, हर तूफ़ान को हँसकर अपनाया।।
जीवन ने सिखाया, दुख की छाया में भी सुख का सूरज छिपा होता है।
बस धैर्य से ढूँढो तो, हर अँधेरा उजाले में बदला होता है।।
अब हौसलों के पंख लगाकर, आकाश को छूना है।
दोस्तों का हाथ थामे, साथ-साथ आगे बढ़ना है।।
इस परदेस की धरती पर, अपनत्व का दीप जलाना है।
अपने इस मिनी उत्तराखंड को, एक सजीव परिवार बनाना है।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।