Tuesday, 24 February 2026

परदेश में अपना घर। कविता। 36

 अक्सर मैं भी सोचा करती थी, हम प्रवासी परदेश में मिल-जुलकर रहें।

परदेस में हम अपना, मिनी उत्तराखंड बना कर रहें।।


सबको साथ लाने के लिए, मैंने एक जुगत लगाई।

उत्रैणी- मक्रैणी महोत्सव मनायें, दोस्तों संग प्लानिंग बनाई।।


ढूंढ-ढूंढ कर समझा- बुझाकर, हम सबको एक मंच में लाए।

बोली में अंतर भले ही था, लेकिन सब थे उत्तराखंड से आए।।


धीरे-धीरे सब में प्रेम बढ़ा, प्रेम के साथ विश्वास बढ़ा।

मंच से शुरू हुआ सफर, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में हुआ खड़ा।। 


अक्सर उलझने आती सामने, मतभेद लेकर आते थे बहाने।

सभी मजबूती से खड़े रहे, कभी हार नहीं मानी हमने।।


सीख लिया है अब हमने, जीवन को समझना।

दुख में सुख का रास्ता, कैसे है हमें ढूंढना।।


सखियों के संग मिलकर, सपनों को साकार करना है।

हाथ थामकर एक- दूसरे का, हमें आगे बढ़ते जाना है।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।