अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बाग सजाया प्यारा।
मेहनत, लगन और प्रेम से, सींचा उसे दुलारा।।
धीरे-धीरे रंग बिखरने लगी, हरित हथेलियों पर।
फूल मुस्काए जैसे सपने, उतर आए हों धरा पर।।
किसी फूल की खुशबू मन हर लेती, जैसे मधुर कोई गान।
कोई रूप से बाँध लेता, चुपके-चुपके सबका ध्यान।।
कुछ पौधे थे कंटीले, यह भी प्रकृति का है संदेश।
सिर्फ कोमलता ही नहीं, कठोरता भी है परिवेश।
काँटों की गोद में पलते हैं, सबसे सुंदर फूल।
जैसे संघर्षों में निखरता है जीवन का असली उसूल।।
विविध रंगों से सजा यह बाग, जीवन का ही है रूप।
हर स्वभाव, हर रंग यहाँ, है ईश्वर का स्वरूप।।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।