Monday, 9 February 2026

अंकिता: मैं च्यैलि पहाड़कि। कुमाऊनी- कविता। 12

उत्तराखंड कि मैं च्येलि छूं, अंकिता छू म्यर नाम।

आपणी घर चलौण कै, मैं करनूं एक रिजाॅट में काम।।


कोरोना कालक य टैंम छौ, महामारीक प्रकोप छन।

प्राइवेट नौकरी करनण वाल, आज सबै बेरोजगार छन।।


जब बै बाज्यू बेरोजगार हुईं, हम खाणक ल्यी मोहताज हुईं।

आपण बाज्यूक हाथ बटौण हुणि, मैं काम ढूंढण निकल गईं।।


एक रिजॉर्ट में म्येरी नौकरी लागि, इजा- बाज्यू कै थ्वाड़ सकून मिली।

घर- परिवार कै चलूण हुणि, उनुकै कुछ राहत मिली।।

 

थ्वाड़ दिंनों में मैकै पत्त लागौ, रिजाॅट में काव धंध तमाम हुणि।

सोचि! जसै दूणिय कै इनर करतूत बतूंल, उं म्येरी ज्यानक दुश्मन बणि।।


दरिंदोंल मैं कै मारबेर, चिल्ला नहर में फैंक गईं।।

उनुकैं लागो रिजाॅटक, काव धंध पर्द में छिप गईं।। 


दुश्मणौंल म्यर स्वीणों कै, नैं भरन द्यी उड़ान।

जीवन भरिक दुःख द्यी हालि, म्यर परिवार कै तमाम।।


कै कसूर छी म्यर? तुमी बता द्यौ हे! भगवान।

मैं एक चेली छूं! गरीब छूं, क्या? यैक करौ मैंल भुकतान।।


बन गै आज य अंकिता, पहाड़ क एक दर्दनाक कहानि।

अब किताबों में मिलेलि, म्येरी जिंदगीक निशानि।।


पहाड़ों में मैंकैं न्याय दिलौंण हुणि, कबै त आवाज उठेलि।

न्याय मिलल मैं कै तबै, जब दोषिन कै मौतेंक सजा मिलेलि।।


दुसरि अंकिता क्वै चेलि नै बणों, क्वै विधान शक्त बणै द्यौ सरकार।। ‌

च्यैलि, सैंणियां बेखौफ जी सकौ, उन्हां द्यी द्यौ य अधिकार।।


स्वरचित: मंजू बोहरा, बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।