Thursday, 5 March 2026

धूप भी अपनी, छांव भी अपनी। हिंदी धारावाहिक।

 एपिसोड 1- गांव की हवा में बसी खूशबू।

सुबह की हल्की- हल्की धूप पहाड़ों के पीछे से झांक रही थी। गांव की पगडंडी पर ओस की बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे धरती ने रात भर आसमान के आंसू समेट कर रखे हों।
कुनकुनी हवा में पहाड़ी फूलों की खुशबू घुली हुई थी। दूर कहीं से मंदिर की घंटी की आवाज आ रही थी और साथ ही सुनाई दे रहा था मुर्गों का बांग देना।
इसी गांव का नाम था- सूपी गांव।
सूपी गांव छोटा जरूर था, लेकिन यहां के लोगों के दिल बहुत बड़े थे। हर कोई एक-दूसरे के सुख- दुख में शामिल रहता था।
गांव के बीचों- बीच एक पुराना लेकिन सुंदर साफ सुथरा घर था। उसी घर के आंगन में खड़ी थी राधिका, उसकी उम्र बत्तीस साल है, उसने नयन- नक्श बेहद सुंदर हैं, गेरूआ कलर है, लंबे काले बाल हैं, स्वभाव से बेहद सरल और शांत है, उसे देखते ही लगता है कि वह अपनी  सजल आंखों में एक अनजाना सा दर्द छिपाए हुए है।
राधिका सुबह जल्दी उठना पसंद करती थी। प्रातः कालीन बेला में उठकर सर्व प्रथम वह घर में झाड़ू लगाती, गोशाला साफ करती, दूध दूहती, गाय को चारा देती थी, फिर नहा- धोकर सूर्य देव को अर्घ्य देती और तुलसी मां के सामने नियमित दीपक जलाती,  तत्पश्चात बेटे को उठाकर फिर वह नाश्ता बनाने रसोई में चली जाती।
आज भी  सुबह- सुबह नाश्ता बनाकर रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि आवाज आई- “मां मुझे स्कूल जाने में देर हो रही है।”
यह आवाज थी उसके दस साल के बेटे आदित्य की।
राधिका मुस्कुराई।
“अरे वाह आज तो बहुत जल्दी तैयार हो गया मेरा राजा बेटा। दो मिनट रुको बेटा, तुम्हारा टिफिन ला रही हूं।”
आदित्य बहुत समझदार और शांत बच्चा था। वह अपनी उम्र से ज्यादा होशियार और गंभीर था। कभी-कभी राधिका को लगता था कि उसके  बच्चे की आंखों में भी कुछ अनकहा दर्द बसता है।
राधिका ने टिफिन बैग में रखा और आदित्य का माथा चूम लिया। तब तक पास पड़ोस के बच्चे भी आ चुके थे, राधिका ने आदित्य से कहा, "मैं स्कूल तक छोड़ दूं क्या?" 

आदित्य कहने लगा, "मम्मी दो कदम पर तो स्कूल है, आप चिंता मत करो, मैं भईया लोगों के साथ चला जाऊंगा,"

राधिका मुस्कुराते हुए बोली, "अच्छा बाबा ठीक है, मन लगाकर पढ़ना और किसी से लड़ाई मत करना।”
"अच्छा मां" कहकर आदित्य बच्चों के साथ स्कूल के लिए निकल गया। स्कूल घर के पास में ही था। इसलिए देवांश अन्य बच्चों के साथ स्कूल चला जाता था।
घर में अब राधिका अकेली रह गई थी।
उसका घर, जो कभी खुशियों से भरा रहता था, अब सिर्फ यादों की आवाजें लिए खड़ा था।
राधिका की शादी ग्यारह साल पहले गांव के ही एक युवक राघव से हुई थी। राघव शहर में काम करता था। शुरू के कुछ साल सब ठीक रहे, लेकिन धीरे-धीरे रिश्ते में दूरी आने लगी।
राघव कई- कई महीने में घर आता था।
राघव राधिका से पहले बहुत प्यार करता था, लेकिन धीरे-धीरे उसने राधिका से बात करना कम कर दिया, अब तो ज्यातातर चुप ही रहता था, इधर कई महीनों से उन दोनों के बीच में हां- ना के सिवा कोई और बात नहीं हुई थी।


बच्चे पर कोई गलत असर ना पड़े, इसलिए वह राघव से कुछ नहीं कहती थी, लेकिन राघव का धीरे-धीरे बदलता व्यवहार देखकर राधिका अंदर से टूटने  लगी थी, अब अकेलापन धीरे-धीरे उसके दिल में घर करता चला जा रहा था।
आज भी राधिका ने मोबाइल देखा।
उसमें राघव का कोई मैसेज नही था, और नहीं कोई  मिस कॉल पड़ी थी।
उसने हल्की सांस छोड़ी और रसोई की तरफ बढ़ गई।  उसने  उठी रसोई साफ की, बर्तन धोये, कपड़े धोये, पौधों में पानी डाला। वह खुद को घर के काम में व्यस्त रखना चाहती थी, ताकि कोई भी ख्याल उसे कमजोर ना कर सके। घर का सारा काम निपटा कर राधिका ने प्लेट में थोड़ा सा नाश्ता लिया, प्लेट में रखा नाश्ता देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह सिर्फ जीने के लिए खा रही है, और नाश्ता करते समय वह राघव के बदलते व्यवहार के सवाल जवाबों में फिर घिर गई।
राधिका जब भी घर में बाहर निकलती, गांव की औरतें अक्सर कहते हुए मिल जाती थीं-
“राधिका बहू बहुत सहनशील है तू।”
लेकिन किसी को नहीं पता था कि सहनशीलता के पीछे कितना तूफान छिपा है।
आज दोपहर होते- होते गांव के चौक में हलचल बढ़ गई।
आज गांव में पंचायत की बैठक थी।
गांव के मुखिया ने घोषणा की थी कि गांव में एक नई योजना आने वाली है जिससे किसानों की मदद होगी। राधिका को जब यह बात पता चली थी, तब उसने भी सोचा था कि  पंचायत की बैठक में वह भी जायेंगी, किसानों की मदद के लिए जो नई योजना आ रही है उसकी जानकारी वह भी लेगी इसलिए राधिका भी पंचायत में गई।
चौक पर बैठी बूढ़ी दादी कमला देवी ने राधिका का हाथ पकड़ लिया।
“बहू, तू इतनी दुबली क्यों होती जा रही है? ठीक से खाया कर।”
राधिका मुस्कुराई-
“दादी, मैं ठीक हूं।”
कमला देवी ने उसकी आंखों में देखा और धीरे से कहा-
“झूठ मत बोल बहू। आंखें सब सच बता देती हैं।”
राधिका चुप हो गई।
उसी समय दूर से एक गाड़ी गांव में दाखिल हुई।
गाड़ी से उतरा एक आदमी, शहर का लगता था। काला कोट, हाथ में फाइल, और चेहरे पर गंभीरता।
गांव के मुखिया उसके साथ बात करने लगे।
राधिका को पता नहीं क्यों उस आदमी को देखकर अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। मीटिंग में 3- 4 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला, शाम होने को लगी थी,
सूरज पहाड़ों के पीछे छिपने लगा और आसमान नारंगी रंग में रंग गया। तेज कदमों से राधिका घर आई, उसने देखा आदित्य स्कूल से घर पहुंचा ही था। उसने चैन की एक लंबी सांस ली, आदित्य को अपनी बाहों में लेकर उसे लाड़ लड़ाने लगी, आदित्य को अपनी ममता की छांव देते समय उसे याद आया- शादी के शुरुआती दिन,,,,
राघव का प्यार,
उसके साथ गांव की पगडंडियों पर घूमना,
और सपनों की बातें करना।
लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया।
राधिका यादों के  बंधन से बाहर निकली, फिर अपने रोजमर्रा के काम में जुट गई। रात को सारा काम निपटा कर जब वह आदित्य को सुलाने लगी। आदित्य ने राधिका से पूछा-
“मां, क्या पापा हमसे प्यार नहीं करते?”
राधिका का दिल कांप गया।
उसने बेटे को गले लगा लिया-
“ऐसा नहीं बोलते बेटा। पापा बस काम में व्यस्त रहते हैं।”
लेकिन उसके शब्द खुद उसके दिल को ही झूठ लग रहे थे।
रात बहुत शांत थी। लेकिन राधिका के मन के अंदर बहुत शोर हो रहा था।
दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी।
राधिका खिड़की के पास खड़ी थी।
उसकी आंखों में आंसू नहीं थे,
बस एक गहरा सन्नाटा था।
उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आने वाला है जो उसके रिश्तों की सच्चाई सामने लाएगा।
गांव में आया हुआ वह अजनबी आदमी,
और राघव का अचानक बदलता व्यवहार,
इन सबके बीच छिपा था एक रहस्य, जो राधिका की जिंदगी बदलने वाला था।
लेकिन अभी कहानी शुरू हुई है
अभी तो रिश्तों की असली परीक्षा बाकी है।...


आगे पढ़ें।....

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


Friday, 27 February 2026

होली: रंगों का त्योहार। कविता।39

फाल्गुन के महीने में, हवा बांहें फैलाए जब आती है।

धरती पर रंगों की, चादर सी बिछ जाती है।।


पास और दूर के सभी यार, जाने और अनजाने परिवार।

सब मिलकर मनाते हैं, होली में रंगों का यह खूबसूरत त्योहार।।


होली में, गुलाल के बादल, छाते हैं आसमान में।

मस्ती की लहरें, दौड़ती हैं सबके मनों में।।


ढोलक की थाप पर, डीजे की धुन पर, थिरकते सबके पांव।

खुशियों से भर जाए जीवन, सखी शहर हो या गांव।।


पीले गुलाल में दिखे मुझे, सूरज का मधुर दुलार।

हरे रंग में झलके सखी, धरती का असीम उपकार।।


लाल रंग छूते ही, जागे हृदय में नव-ओज।

रग- रग में रोमांच उठे, सखी मिट जाए हर संकोच।।


होली में, भाभी करती हंसी- ठिठोली, देवर करते शरारत।

बुजुर्ग देते हैं आशीर्वाद तो, घर में आती है बरकत।।


जब ठंडाई की मिठास, होठों पर घुल जाती है।

सखी, पुरानी सारी रंजिशें, दिल से निकल जाती हैं।।


होली में, बच्चों की किलकारियां, गूंजती चहुं दिसाओं ओर।

होली है भाई होली है, मच जाए गली- गली में शोर।।


होली में, एक ही रंग में, रंग जाता है सारा संसार।

भेद- भाव सब मिट जाए, सिर्फ प्रेम बने आधार।।


फागुन आया है सखी, फिर नई उम्मीदें लेकर।

खिलखिला, गले लगे लगा, सभी सखियों को बाहों में भरकर।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Thursday, 26 February 2026

प्रवास में पहाड़। कविता। 38

अक्सर मन की दहलीज़ पर एक सपना दस्तक देता था, हम सब प्रवासी मिलकर एक संसार बसाएं।
इस परदेस की अपरिचित गलियों में, अपनी मिट्टी की सौंधी खुशबू फिर से महकाएं।।

सोचा था ! क्यों न दूर वादियों की स्मृतियों को, दिलों के आंगन में उतार लें।
क्यों न इस अजनबी शहर में, अपना सा एक छोटा उत्तराखंड संवार लें।।

बिखरे चेहरों में अपनापन खोजा, संकोच की दीवारें धीरे-धीरे गिराईं।
उत्रैणी–मक्रैणी के पावन अवसर पर, मिलन की दीप शिखाएं जगमगाईं।।

ढूंढ-ढूंढ कर सबको जोड़ा, स्नेह के धागों में विश्वास पिरोया।
बोली भले अलग-अलग थी, पर हर हृदय ने पहाड़ों का प्रेम संजोया।।

धीरे-धीरे मुस्कानों ने रिश्तों को आकार दिया, विश्वास ने जड़ों को गहरा किया।
एक छोटे से मंच से आरंभ हुआ सफ़र, उत्तराखंड मातृशक्ति के रूप में नव इतिहास रच दिया।।

हां, राह में मतभेद भी आए, कुछ क्षणों ने मन को डगमगाया।
पर हमने साहस की ज्योति थामे रखी, हर तूफ़ान को हंसकर अपनाया।।

जीवन ने सिखाया, दुख की छाया में भी सुख का सूरज छिपा होता है।
बस धैर्य से ढूंढो तो, हर अंधेरा उजाले में बदला होता है।।

अब हौसलों के पंख लगाकर, आकाश को छूना है।
दोस्तों का हाथ थामे, साथ-साथ आगे बढ़ना है।।

मंजू, इस परदेस की धरती पर, अपनत्व का दीप जलाना है।
अपने इस मिनी उत्तराखंड को, एक सजीव परिवार बनाना है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

Tuesday, 24 February 2026

जीवन के रंग कविता।37

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बाग सजाया प्यारा।

मेहनत, लगन और प्रेम से, सींचा उसे दुलारा।।


धीरे-धीरे रंग बिखरने लगी, हरित हथेलियों पर।

फूल मुस्काए जैसे सपने, उतर आए हों धरा पर।।


किसी फूल की खुशबू मन हर लेती, जैसे मधुर कोई गान।

कोई रूप से बाँध लेता, चुपके-चुपके सबका ध्यान।।


कुछ पौधे थे कंटीले, यह भी प्रकृति का है संदेश।

सिर्फ कोमलता ही नहीं, कठोरता भी है परिवेश।


काँटों की गोद में पलते हैं, सबसे सुंदर फूल।

जैसे संघर्षों में निखरता है जीवन का असली उसूल।।


विविध रंगों से सजा यह बाग, जीवन का ही है रूप।

हर स्वभाव, हर रंग यहाँ, है ईश्वर का स्वरूप।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।


खूबसूरती के रंग: कविता ।

अलग-अलग पौधे लाकर, मैंने एक बागान बनाया प्यारा।

अपनी मेहनत और लगन से, सींचा, पाला- पोसा न्यारा।।

कुछ ही समय में रंग-बिरंगे फूलों से,

मेरा बागान सजा था।

किसी फूल की खुशबू मन मोहक थी,

तो कोई फूल मन मोह रहा था।।

कुछ पौधे कटीले थे, पर सारे कटीले फूल, बेहद खूबसूरत थे।।

बागान में फूलों की खूबसूरती, सभी को करती थी आकर्षित।

जिसे देख बागान, स्वयं भी होता था हर्षित।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।