बड़ी कठिनाई से मिलती है,
दो जून की रोटी।
अक्सर सुनने में आती है,
यह जीवन की सच्ची बात अनूठी।।
आज स्टेटस में देखा मैंने,
सबने यह संदेश लगाया था।
दो जून की रोटी लिख- लिख कर,
अपना भाव बतलाया था।।
तब मन में जिज्ञासा जागी,
क्या इसका मर्म सभी ने जाना है?
क्या केवल दो जून तिथि भर है,
या कोई गूढ़ खज़ाना है?
जब अर्थों की राह चली,
ज्ञान- द्वार पर पहुंची मैं।
तब खुला रहस्य इस मुहावरे का,
मिट गई मन की सारी दुविधा क्षण में।।
तब ज्ञात हुआ यह तिथि नहीं है,
न महीने का कोई संकेत।
दिन के दो बेला के भोजन का,
इसमें छिपा हुआ है हेत।।
दो जून की रोटी का मतलब,
दो समय भोजन पा जाना।
इतना श्रम और इतनी आय,
कि भूखा न सोये कहीं जमाना।।
पर इसका अर्थ रोटी भर नहीं,
इसमें संघर्षों का इतिहास छिपा है।
मजदूरों के श्रम- बिंदु में,
जीवन का विश्वास छिपा है।।
हर पसीने की बूंद कहती,
परिश्रम ही है पहचान हमारी।
कर्मभूमि पर हम डटे हुए हैं,
यहीं है जगत की सच्ची क्यारी।।
किसी के लिए यह सामान्य आवश्यकता,
किसी के लिए जीवन का स्वप्न महान।
कितने हाथ निरंतर श्रम करते,
तब मिलता है अन्न का सम्मान।।
इस छोटे से मुहावरे में,
जीवन- दर्शन गहरा बसता।
रोटी के प्रत्येक कण में,
मानव- श्रम का गौरव खिलता।।
तब समझ सकी मैं यह कारण,
क्यों कहते हैं सब दिन- राती।
बड़ी कठिनाई से मिलती है,
दो जून की रोटी।।
स्वरचित- मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।