गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हरेला पर्व: हिंदी कविता।

जब सावन की पहली आहट,

धरती मां का श्रृंगार बने।

तब देवभूमि के हर आंगन में,

हरेला बनकर प्यार खिले।।


सात अन्न की पावन माटी,

नौ दिन तक स्नेह से सींची जाए।

हर अंकुर में जीवन मुस्काए,

हरियाली का संदेश सुनाए।।


दसवें दिन शुभ घड़ी जो आए,

हरेला श्रद्धा से काटा जाए।

पहले अपने इष्ट को अर्पित हो,

फिर हर माथे पर सजाया जाए।।


बड़ों के शुभ आशीषों से,

जीवन में सुख- समृद्धि आए।

दीर्घायु, यश, वैभव और मंगल,

हर परिवार का भाग्य जगाए।।


रसोई में पकवान महकें,

घर- आंगन उत्सव बन जाए।

बेटी, बंधु, सखा, पड़ोसी,

सबमें प्रेम का प्रसाद बंट जाए।।


हरेला केवल पर्व नहीं,

यह प्रकृति का अभिनंदन है।

धरती, जल, वन और जीवन का,

सदियों पुराना वंदन है।।

आओ आज यह प्रण दोहराएं,

हर वर्ष एक पौधा लगाएं।

हरी- भरी हो अपनी धरती,

आने वाली पीढ़ियां मुस्काए।।


स्वरचित : मंजू बोहरा बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

16/07/2026