Tuesday, 20 July 2021

संस्मरण: वो रिश्ता अपना सा २

पिछले साल २९-३० मई को हमारे घर (नैनीताल) में शादी थी। मेरा बेटा १० वी कक्षा में था। तो इस बार उसके विद्यालय में अभी तक छुट्टियां नहीं पढ़ी थी। मैंने २८ मई को विद्यालय से ही बेटे को लेकर नैनीताल जाने का निर्णय लिया।

मैं सुबह से ही घर जाने की तैयारी में जुट गई। काम निपटाने के चक्कर में मुझे खाना खाने का समय भी नहीं मिल पाया, तो मैंने सफर के लिए खाना बनाकर रख दिया। बस स्टेशन घर से काफी दूर था। हमने बस स्टाॅप से बस में बैठने का निर्णय लिया और अपराह्न १२ बजे के आस-पास बेटे को विद्यालय से लेते हुए हम लोग बस स्टाॅप पर पहुंच गए और बस का इंतजार करने लगे। दोपहर का समय था। बाहर गर्मी आग उगल रही थी। और साथ ही भयंकर लू भी चल रही थी। उस भीषण गर्मी में हम लोग गर्मी से बेहाल हो चुके थे।
अचानक मेरी नजर एक बुजुर्ग पर पड़ी, जो कभी बेंच में सोने की कोशिश कर रहे थे, कभी जमीन पर। वो कोई भिखारी तो नहीं लग रहे थे, पर उनके चेहरे पर गहरी उदासीनता साफ झलक रही थी। उनको देखकर मुझे लग रहा था! "हे भगवान' इतनी गर्मी और लू में तो ये बुजुर्ग बिमार हो जायेंगे"। मेरी नजर एक जूस बनाने वाले पर पड़ी, मैंने उससे मौसंबी का जूस बनवाया और जूस लेकर उस बुजुर्ग के पास गई और बोली,,,,, "बाबा जूस पीयेंगे? "वो बुजुर्ग जमीन पर लेटे हुए थे। मेरी आवाज़ सुनकर उन्होंने अपना चेहरा मेरी ओर किया। मैंने देखा उनकी आंखों में आंसू थे। मैंने फिर से कहा,,,, "बाबा, गर्मी बहुत पढ़ रही है, हम लोग जूस पी रहे थे। आप भी हमारे साथ जूस पी लीजिए।" वो धीरे से उठकर बैठ गयेे और उन्होंने  कांपते हाथों से गिलास पकड़ लिया। 
तब मैंने उन्हें करीब से देखा। उनकी उम्र लगभग ८०- ८५ वर्ष के आसपास होगी। उनकी पीठ पूरी तरह झुकी हुई थी, चेहरे में झुर्रियां पड़ी हुई थी, उनकी आंखें चेहरे के अंदर धंसी हुई थी। उनकी हालत देखकर मैंने फिर पूछा !
"बाबा आपने खाना खाया है?"
वो कुछ नहीं बोले और उनकी आंखों से अविरल अश्रु धारा बहने लगी। और वो चाहकर भी उन आंसुओं को रोक नहीं पा रहे थे। उनका इस तरह रोना देखकर मेरी भी आंखें छलक पड़ी। मैं पहले ही समझ गई थी कि उन्होंनेे खाना नहीं खाया है?
मैं जल्दी से गाड़ी के पास गई और सफर के लिए जो मैं खाना बनाकर लाई थी वह खाना निकाल कर बाबा के  हाथों में देते हुए बोली,,,,"बाबा, ये खाना मैं घर से बनाकर लाई हूं, आप खा लीजिए"।
उन्होंने बिना कुछ कहे वह खाना पकड़ लिया शायद उन्हें बहुत भूख लगी हुई थी।
"बाबा जब तक मेरी बस नहीं आ जाती, क्या मैं आपके साथ बात कर सकती हूं?" उन्होंने "हां" में सिर हिला दिया। मैंने उनसे पूछा !
"बाबा कहां रहते हैं आप"?
उन्होंने  धीरे से बताया "विजय नगर"!
"विजय नगर? विजय नगर तो यहां से काफी दूर है। आप किसी रिश्तेदार से मिलने जा रहे हैं"?
मेरा सवाल सुनते ही उन्होंने अपना चेहरा नीचे कर लिया। मानो अपना दर्द छुपाने की कोशिश कर रहे हो। या उत्तर देना ही नहीं चाहते हों ।
मैंने उनसे फिर कहा,
"बाबा आप मुझसे बहुत बड़े हैं, फिर भी मैं आपसे एक बात कहना चाहती हूं, कहूंं?"
उन्होंने "हां" में सिर हिला दिया।
मैं हिम्मत करके बोली!
"बाबा, भगवान ने हमें जो यह जीवन दिया है; उसके साथ संघर्ष भी दिये है; संघर्ष दिये है तो; उनसे जूझने की शक्ति भी दी है; बाबा जो इंसान जितना अच्छा होता है; उसके जीवन में संघर्ष भी उतने ही अधिक होते हैं; बाबा ये जिंदगी बेहद कीमती है; इसे यूं अश्रु बहाकर सड़कों में जाया मत कीजिए; मेरी बात मानिए आप इसी वक्त अपने घर जाइए; इस प्रचंड गर्मी में इस तरह भूखे-प्यासे रहकर अपने शरीर को कष्ट देना सरासर बेवकूफी है।"
मैंने देखा बाबा के आंसू थोड़े थम चुके थे। मैं बैंच से उठी और बाबा से कहा!
"आप खाना खा लीजिए, तब तक मैं आपके लिए एक रिक्शा बुला देती हूं "!
मैंने एक रिक्शेवाले को बुलाया और उसे किराया देकर कहा!
"खाना खाने के बाद, बाबा को विजयनगर छोड़ना है"।
रिक्शावाला बोला! "ठीक है मैडम जी।"
रिक्शेवाला रोड़ के किनारे पर रिक्शा लगाकर बाबा का इंतजार करने लगा! मैं जाकर अपनी गाड़ी में बैठ गई और बस का इंतजार करने लगी। थोड़ी देर बाद मैंने देखा बाबा मेरी तरफ आ रहे थे! उन्होंने बहुत ही स्नेह से मेरे सिर पर हाथ रखा; फिर धीरे-धीरे जाकर रिक्शे में बैठ गए! और रिक्शा विजयनगर की ओर बढ़ गया। कुछ देर बाद हमारी बस भी आ गई और हम बस में बैठकर नैनीताल की ओर रवाना हो गए।
मैं रास्ते भर यही सोच रही थी कि 'बाबा सकुशल घर तो पहुंच गए होंगे'? 'ऐसा कौन सा दर्द होगा जिसकी वजह से इस प्रचंड गर्मी में वो अपने आप को सजा दे रहे थे' ?
आज भी बाबा के वो अविरल आंसू याद आते मेरी आँखें नम हो जाती है।
स्वरचित: मंजू बिष्ट;
गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।