Monday, 19 July 2021

संस्मरण: वो रिसता अपना सा १

अपनी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखने के बाद मेरी बेचैनी और बढ़ गई। डाक्टर ने मेरी रिपोर्ट देखने के बाद मुझे बायोप्सी टेस्ट के लिए बोल दिया और बायोप्सी का खर्चा २५-३० हजार रुपए बताया। "यदि एक टेस्ट इतना मंहगा है तो आगे का इलाज कितना मंहगा पड़ेगा"! मैं यह सोच ही रही थी कि तभी डाक्टर बोली, "आप लोग टेस्ट के लिए कल आ जाइये"।

मेरे पति बोले "जी, ठीक है"। यह कहकर हम अस्पताल से बाहर निकल गए। एक तो बिमारी के नाम से मैं टूट सी गई थी, ऊपर से इतने मंहगे इलाज ने मेरी चिंता और बढ़ा दी। "हे भगवान कहां से आयेंगे इतने रूपए"? मैं और मायूस हो गई, मेरे पति मेरे मन की बात समझ गए और मेरे पास आकर बोले "क्या सोच रही हो" ?

मैंंने धीरे कहा, "कुुछ नहीं।"
मेरे पति अपने दोनों हथेलियों के बीच मेरे चेहरे को लेकर बोले। "ये हमारी जिंदगी की परीक्षा का समय है और इस परीक्षा में हमेें पास होना है।,,,, मेेेरी श्रीमती तो बहुत हिम्मत वाली है, आज एक छोटे से तूफान से वो इतना परेशान कैसे हो गई "?,,,,,
मैंने उनकी बात काटते हुए कहा, "क्यों ना एक बार मैं खुद को एम्स में दिखा लूँ"।,,,,,
मेरी बात सुनकर वो कुछ देर तक मेरे चेहरे को देखते रहे, फिर मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, "अच्छा बाबा ठीक हैै। हम कल ही एम्स जायेंगे।"  
अगले दिन सुबह तड़के हम दिल्ली एम्स के लिए रवाना हुए, और लगभग दो घंटे मेंं हम एम्स अस्पताल पहुंच गए।
एम्स में मेरे नंदोई नौकरी करतेे थे। इसलिए वहां हमें ज्यादा दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। और वहां मेरा इलाज शुरू हो गया। और १५ दिन बाद की मुझे बायोप्सी टेस्ट की तारीख मिल गई।,,,,
     १५ दिन बाद आज एम्स में मेरा बायोप्सी टेस्ट होना था। दोपहर १२ बजे के आसपास मेरा नंबर आया। तब मुझे पहली बार पता चला कि एम्स में बिना एनेस्थीसिया इंजेक्शन दिए बायोप्सी टेस्ट होता है। बिना एनेस्थीसिया दिए शरीर के किसी अंग से टिसू (कोशिका) निकालना,,,, उफ़!!! मैं उस तकलीफ को बयान ही नहीं कर सकती,,, बेहद दर्दनाक और असहनीय था।  कैसे बताऊं,,, मेरा यह दर्द प्रसव पीड़ा के समतुल्य ही था ,,, और घंटे भर बाद मुझे हास्पिटल ने छुट्टी भी दे दी। उस स्थिति में गाजियाबाद आना तो सम्भव नहीं था। मैं अपनी ननद के घर चली गई। और शाम ६ बजे घर वापसी के लिए ‌हम मैट्रो में बैठ गये।,,,,,
अपने स्वास्थ्य को लेकर मैं अंदर से टूट चुकी थी। अपने स्वास्थ्य से ज्यादा मैं अपने बेटे और पति के भविष्य को लेकर चिंतित थी। पता नहीं कैसे- कैसे ख्यालात मन में आ रहे थे। और इसी उधेड़बुन में कब वैशाली मैट्रो स्टेशन आ गया मुझे पता ही नहीं चला।,,,
दिसम्बर का महीना था, बाहर बहुत ठंड पड़ रही थी। दर्द के कारण मैं धीरे- धीरे गाड़ी के पास जा रही थी। तभी मेरी नजर एक ११- १२ साल के बच्चे पर पड़ी, जिसने कोई गर्म कपड़े नहीं पहने थे। मैंने देखा वह ठंड से कांप रहा था। फिर भी स्ट्रीट लाइट के नीचे किताब पढ़ रहा था; और साथ ही एक टोकरी में चने बेच रहा था। मैं उसके पास गयी। और बोली "बेटा क्या पढ़ रहे हो?"
वह बोला "आंटी मेरी मैैडम ने किताब सेे एक पाठ याद करने को दिया है वही याद कर रहा हूँ।"
मैंने उससे पूछा,"इतनी ठंड पड़ रही है, तुमने गर्म कपड़े क्यों नहीं पहन रखे हैं? इस कड़कड़ाती ठंड में इतनी रात तुम चनें क्यों बेच रहे हों? पापा से कहो, वो बेचेंगे!"
वह सिर झुकाकर बोला "आंटी मेरे पापा नहीं हैं। और मेरे पास एक ही बनियान है, आज मम्मी ने बनियान धो रखी है, वह सूखी नहीं है।" मेरी ओर देखकर फिर वह चहकते हुए बोला, "आंटी मैं दिन में स्कूल जाता हूं और रोज शाम को ४- ९ बजे तक यहीं पर चने बेचता हूँ और पढ़ाई भी करता हूं।"
"अरे वाह,,, बहुत अच्छा,, मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा पढाई करना तो बहुत अच्छी बात है, पर !!! क्या तुम्हें ठंड नहीं लग रही?"
वह बोला "लग तो रही है पर थोड़ी-थोड़ी।"
मैं देख रही थी वह ठंड से कांप रहा था पर उसके चेहरे पर दुःख और परेशानी वाले भाव बिल्कुल भी नहीं थे। उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। उसको इस तरह कांपते हुए देखकर मैंने उससे कहा" यदि मैं तुम्हें अपना ये शाल दे दूं , तो क्या तुम ओढ लोगे!"
वह खुश होकर बोला, "हाँ आंटी!"
मैंने अपनी शाल उस बच्चे को उड़ा दी। और अपने पति से कहा इस बच्चे को बनियान खरीदने के लिए कुछ रूपए दे दीजिए ना। मेरे पति  पर्स से रूपये निकाल कर उस बच्चेेेे के साथ में रखते हुए बोले, "कल ही बाजार जाकर एक बनियान खरीद लेना!"
उसने अविश्वास भरी नजरों सेे देखा, और झिझकते हुए उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए।,,, रुपए पकड़ते हुए खुुुश होकर बोला, जी बाबूजी"।
हम जैसे ही आगे बढ़ने लगे तभी वह बच्चा बोला "आंटी ये सारे चने आप ले जाइए।"
उसका भोला सा चेहरा देखकर मैं बोली, "पढ़ाई के प्रति तुम्हारी लगन देखकर हमने ये रूपए तुम्हें ईनाम में दिये हैं; ऐसे ही खूब मन लगाकर पढाई करना; और मेरी तरफ से आज ये चने तुम खा लेना;... ठीक है।" यह कहकर हम आगे बढ़ गये।,,,,,,,
उस बच्चे को देखकर मैं अपना सारा दर्द और तकलीफ़ भूल गयी। और जो फालतू विचार मेरे मन में चल रहे थे, वो सारे विचार गायब हो चुके थे। अब मुझे लग रहा था, कहीं ना कहीं मेरा मन कुछ हल्का सा हो गया है। उस छोटे से बच्चे ने मेरे जीने का नजरिया ही बदल‌ दिया। उस वक्त मुझेे एहसास हुआ कि चाहे जिंदगी में कितने ही कष्ट या मुश्किलें क्यों ना आ जाय हमें कभी भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए; हमें हर परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए; हर हाल में हमें धैर्य से काम लेना चाहिए; और खुश रहना चाहिए। खुश रहने से मुश्किलें खत्म तो नहीं होती।... पर हां कम अवश्य हो जाती है और जीना आसान हो जाता है।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।