Wednesday, 21 July 2021

संस्मरण: वो रिश्ता अपना सा 3

 आज मैं सुबह से ही कोशिश कर रही थी, कि घर का सारा काम जल्दी से जल्दी निपट जाय और मैं स्कूल पहुँच जाऊँ। आज एक अलग ही उत्साह था मन में। आज मैं अपनी जिंदगी में एक नया अध्याय जोड़ने जा रही थी। लगभग एक बजे के आसपास घर के सभी कामों को निपटा कर मैं स्कूल जाने के लिए निकली, बाहर देखा तो अभी भी कोहरे की चादर फैली हुई थी। और ठंड भी बहुत पड़ रही थी। मैंने अपनी स्कूटी पकड़ी और थोड़ी ही देर में एक सरकारी स्कूल में पहुँच गई।

स्कूल में केवल तीन ही कमरे थे। एक ही कमरे में दो कक्षाएं साथ- साथ चल रही थी। मैंने अध्यापिका महोदया से इजाजत ली और कक्षा में प्रवेश किया, मैंने प्रधानाचार्या जी से मिलने के लिए निवेदन किया; अध्यापिका महोदया बोली! "प्रधानाचार्या जी आज छुट्टी पर हैं। मैं आपकी कुछ मदद कर सकती हूँ"! मैंने उन्हें अपना पूरा परिचय दिया और स्कूल में आने का प्रयोजन बताया,,,,, मैंने बताया कि "मैं एक सामान्य परिवार की महिला हूँ; लेकिन मेरी बहुत इच्छा है कि मैं भी समाज सेवा में अपना एक छोटा सा योगदान दूं लेकिन अपने बजट की वजह से मैं कुछ भी नहीं कर पाती हूँ। मेरी एक छोटी सी तमन्ना है कि मैं एक बच्चे की पढ़ाई-लिखाई में थोड़ा मदद करूं"।
मेरी बात सुनकर अध्यापिका महोदया बोली, "यह तो बहुत ही नेक और पुण्य का काम है। वैसे सरकार और NGO से मदद मिलती तो है; लेकिन गरीबी इतनी ज्यादा है कि कई बार तीव्र बुद्धि होने के बावजूद भी बच्चा आगे पढ़ नहीं पाता है। यदि आप जैसे और लोग भी इन बच्चों की मदद करते हैं तो कई बच्चों का भविष्य उज्जवल और बेहतर हो जायेगा"। उसके बाद अध्यापिका महोदया ने मुझे कक्षा ३ के बच्चों से मिलाया और बोली......"बच्चों आंटी जी किसी एक बच्चे की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी लेना चाहती हैं। कोई बच्चा तैयार है"? इतना कहते ही सारे बच्चे चिल्लाने लगे "आंटी जी मैं तैयार हूँ; 'मुझे पढ़ा दो', 'मुझे पढ़ा दो,",,,,,मेरे लिए अब उन बच्चों में से एक बच्चे को चुनना बहुत मुश्किल था।
कुछ देर सोचने के बाद मैंने अध्यापिका महोदया से कहा कि ,"महोदया जो बच्चा पढ़ने में मेहनती और होशियार है मैं उस बच्चे की जिम्मेदारी लेती हूँ"। अध्यापिका महोदया बोली, "ठीक है प्रिया और सकीना कक्षा में सबसे होनहार बच्चियाँ हैं। दोनों की आर्थिक स्थिति सबसे दयनीय है। आप दोनों में से किसी एक बच्ची को पढ़ा सकती हैं"!
अध्यापिका महोदया ने उन दोनों बच्चियों को आगे बुलाया,,,,, तो दोनों ही बच्चियों ने आकर मुझे अपनी नन्ही बाहों से कसकर पकड़ लिया।,,,,, उन दोनों बच्चियों का मासूम चेहरा देखकर मैंने दोनों की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी ले ली।,,,,
२०१७  में दो बच्चियों से मैंने यह सफर शुरू किया। और आज हम कई सहेलियां मिलकर ३५० से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई लिखाई में मदद कर रहे हैं। और साथ ही मैं गरीब लड़कियों को निःशुल्क सिलाई-कढ़ाई और फैशन डिजाइनिंग का कोर्स भी सिखाती हूं।,,,,,,
मैं चाहती हूं कि ये सभी बच्चें शिक्षित होकर अपने पैरों में खड़े हो जाएं, और साथ ही अपने माता- पिता का एक मजबूत सहारा बनें।
स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश। *