१- गोपी ललिता रूप में, चली लिए गोपाल।
दूध पिलाने लगी ज्यों, रूप बना विकराल।।
२- कजरारे से नैन हैं, मन मोहिनी सूरत।
मेरे हृदय बैठ गई, तेरी श्याम मूरत।।
३- तारण हार बने कृष्णा, मीरा, गोपी, ग्वाल।
मेरा भी तारण करो, गिरधारी गोपाल।।
स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।