१- पाप धरा में ज्यों बढ़े, हरि लेते अवतार।
रूप धरा घनश्याम का, कंस किया संहार।।
२- रखे कृष्ण टोकरी में, चले नंद के गॉव।
राह दिये यमुना नदी, ज्यों ही छूए पॉव।।
३-बस इतनी सी चाह है, जपूं श्याम का नाम।
रूह तजे जब देह को, मिले कृष्ण का धाम।।
स्वरचित मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।