१- बाग़ों में उगने लगी, हरी-हरी है दूब।
नये दौर की बेटियां, करें पढ़ाई खूब।।
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२- खुश नसीब हैं नारियां, उनके दो घर-बार |
पीहर हो, ससुराल हो, उसके हैं परिवार।।
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३- नये दौर की बहू को, मत समझो कमजोर।
घर- आफिस दोनों जगह, करती श्रम पुरजोर।।
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४- मौसम- साल बदल गए, बदल गया इंसान।
नये दौर की नारियां, खुद की है पहचान।।
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५- नये दौर की नारियां, रखतीं शक्ति अपार।
जीवन की बाधा करें , सूझ बूझ से पार।।
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६- नये दौर की नारियां, करें बखूबी काम।
लेखन-सत्ता खेल में, कमा रहीं हैं नाम।।
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७- हरीतिमा के बीच में, लागे मंजु मकान।
शुद्ध समीरण के लिए, रोको पेड़ कटान।।
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८- हरियाली देती हमें, प्राणवायु का दान।
कर दो वृक्ष कटान पर, लागू सख्त विधान।।
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९- वर्षगाँठ पर यदि सभी, खा लें ये सौगन्ध।
पेड़ लगाकर कीजिए, कुदरत से सम्बन्ध।।
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१०- जल को जीवन मानिए, संचित करिए नीर।
हाट पौसरा लगाकर, दूर सभी की पीर।।
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११- बरबादी को नीर की, क्यों करते हैं लोग।
जलदूषण से ही लगें, तन में सारे रोग।।
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१२- खग-मृग सब आकुल भए, भटके चारों ओर।
जेठ मास की धूप में, प्यास लगे पुरजोर।।
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स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।