Wednesday, 20 January 2021

दोहा: जल

 १- जल को जीवन मानिए, संचित करिए नीर।

हाट पौसरा लगाएं, पिपासु हरिए पीर।।


२- व्यर्थ नीर की बर्बादी, क्यों करते हैं लोग।

 जल दूषित हो जाय तो, होते सारे रोग।।


३- खग-मृग सब आकुल भए, भटके चारों ओर।

जेठ मास की गर्मी में, प्यास लगी पुरजोर।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट,

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।