१- जल को जीवन मानिए, संचित करिए नीर।
हाट पौसरा लगाएं, पिपासु हरिए पीर।।
२- व्यर्थ नीर की बर्बादी, क्यों करते हैं लोग।
जल दूषित हो जाय तो, होते सारे रोग।।
३- खग-मृग सब आकुल भए, भटके चारों ओर।
जेठ मास की गर्मी में, प्यास लगी पुरजोर।।
स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।