१- हरे-भरे पर्वत रुचिर, मन को लेते मोह।
पवन, नीर, भू मंजु से, शांति मिले अति रूह।।
२-गंगा- जमुना नदी में ,बहता निर्मल नीर।
डुबकी लगी आस्था से, पावन हुआ शरीर।।
३- सड़क बने, आलय बने, तुंग-तुंग को तोड़, ।
चौमासा में दरक रहे, पर्वत आपहु फोड़।।
४- धरणीधर तुमसे हुआ, गंगा का अवतार।
जन-जन को पावन करे, पुर्वज होय उद्धार।।
स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश।