Saturday, 16 January 2021

दोहा: पर्वत

१- हरे-भरे पर्वत रुचिर, मन को लेते मोह।

पवन, नीर, भू मंजु से, शांति मिले अति रूह।।


२-गंगा- जमुना नदी में ,बहता निर्मल नीर।

डुबकी लगी आस्था से, पावन हुआ शरीर।।


३- सड़क बने, आलय बने, तुंग-तुंग को तोड़, ।

चौमासा में दरक रहे, पर्वत आपहु फोड़।।


४- धरणीधर तुमसे हुआ, गंगा का अवतार।

जन-जन को पावन करे, पुर्वज होय उद्धार।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट,

गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश।