Wednesday, 3 June 2020

गिरधारी विनय: कविता। -12

वो कौन सी राह है;
जिसमें चलकर!
मैं दिल में तुम्हारे;
बस जाऊंं,,,,,,,!!
कैसे आऊं;
पास तुम्हारे!
कैसे तुम्हें मनाऊं,,,,,,,,!!
जरा पास तो बैठो;
मुझको बताओ!
क्या है तुमको भाता,,,,,,,,?
विनती करूं मैंं;
इतना बता दो!
क्या है तुमको सुहाता,,,,,,,?
बयां करो,;
वो ख्वाहिशें अपनी!
जो दबी हुई है दिल में!!
मैं पल-पल सोचूंं;
सोचूं- विचारूं!
कैसे तुम्हें मनाऊं,,,,,,,,!!
क्या मैं ऐसा कर जाऊं;
कि प्रिय तुम्हारी,,,,,।
बन जाऊं।।
            अब तू ही बता दे;
गिरधर मेरे!
मैं कौन सी राह में चली चलूंं,,,,,,,?
जिसमें चलकर;
धन्य हो जीवन।
और परम गति मैंं पाऊं।।
समझ जायें वो पीड़ा मेरी।
मैं उनके उर बस जाऊं।।
ना चाहिए मुझे हीरा- पन्ना;
ना गाड़ी ना बंगला।
बस मैं चाहूं इतना गिरधर;
हर दिल में जगह बना लूं,,,,,,,।।
आंखों से ममता छलकाए;
और बरसाएं मुझ पर।
बातों में मिश्री सी घुली हो;
स्नेह लुटाएं वो मुझ पर,,,,,,।।
ना चाहूं मैं इससे ज्यादा;
नित निज अर्जी लगाऊं।
गिरधर अर्ज जो पूरी कर दे;
तेरी मुरली को सोने से मढ़ दूं,,,,,।।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश