Thursday, 28 May 2020

आशा: लघुकथा

कोरोना के बढ़ते केस देखकर लाॅकडाउन लगाना जरूरी हो गया था। शाम के समय प्रधानमंत्री मोदी जी ने टीवी पर लाइव आकर घोषणा कर दी, कि २४ मार्च से १४ अप्रेल तक देश में लाॅकडाउन रहेगा, यह सुनकर आशा बहुत विचलित सी हो गई। अपनी पड़ोसन राधा के लिए उसकी फिक्र और बढ गई। हे भगवान! आप किरण को ये कैसी दोहरी मार से मार रहे हैं, अभी तो महिना भर भी नहीं हुआ है उसके पति की तेरहवीं को! जो कमाने वाला था वह भी उन्हें छोड़कर चला गया है, छोटे-छोटे से दो मासूम सी लड़कियां हैं उसकी, कैसे संभालेगी वो खुद को और अपने लड़कियों को। लाॅकडाउन की खबर सुनकर तो वह पूरी तरह से टूट गई होगी। थोड़ी देर सोचने के बाद आशा उठी और बाजार के लिए तैयार होने लगी।
बाजार जाकर आशा ने किराने की दुकान से महिने भर का राशन लिया; और कपड़े की दुकान से अलग-अलग रंगों में ५० मीटर कपड़ा खरीदा। वहां से रिक्सा लेकर वह सीधे किरण के घर पहुंच गई। घर तक पहुंचने में आशा को शाम हो गई थी। आशा ने दरवाजे की कुंडी को खटखटाया! दरवाजा किरण ने खोला। किरण के चेहरे में दुःख और चिंता के भाव साफ नज़र आ रहे थे। किरण की नज़र ज्यों ही सामान पर पड़ी वह सामान देखकर बोली "दीदी क्या है इन बैगों में"।
आशा ने कहा, "तुमने आज का सामाचार सुन ही लिया होगा"।
बिमला बोली, " हां दीदी" और यह कहकर उसकी आंखों से अविरल अश्रु धारा बहने लगी। आशा ने किरण के सिर पर हाथ फेरा और बोली, "किरण इस समय तुम्हारे भीतर क्या चल रहा है, मैं समझ सकती हूं। मैं तुम्हारी आर्थिक स्थिति से भी परिचित हूं!  इसलिए मैं तुम्हारे लिए महिने भर का राशन लाई हूं। तुम घबराओ मत मैं तुम्हारे साथ हूं। विजय हमेशा के लिए जा चुका है, अब वह चाहकर भी लौट कर नहीं आ सकता। तुम्हें इस सच्चाई को स्वीकार करना है। और अब तुम्हें  ही अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करना है। इसलिए सबसे पहले तुम खुद को सशक्त और मजबूत बनाओं"।
किरण तुमने मुझे एक दिन बताया था, कि शादी से पहले तुमने सिलाई-कढ़ाई का काम सिखा है। मैं तुम्हारे लिए कपड़ा लाई हूं, मैं चाहती हूं तुम दोबारा से अपने उस हुनर को निखारो, और खूब मेहनत करो। अपनी मेहनत और लगन से एक आत्म निर्भर औरत बनों। आशा के इस कदम से और उसकी बातों ने किरण को एक मजबूत सहारा दिया। किरण आशा के गले लिपट गई, और फूट-फूटकर रोने लगी। "जीजी मैं आपका यह एहसा....... आशा ने किरण की बात को बीच में काट दिया और बोली " "किरण आज तुम मुझसे एक वादा करो, कल से तुम बिल्कुल भी नहीं रोओगी,  अब तुम्हें एक मजबूत औरत बनना है, और आगे अपने बच्चियों के लिए जीना है, तुम्हें  माता-पिता दोनों का फर्ज निभाना है, और अपने बच्चों की जिंदगी में एक नई किरण बनना है," ....'मानेगी ना मेरी ये बात'। किरण ने सिर हिलाकर हामी भर दी। आशा की बात सुनकर किरण के आंसू थम चुके थे।
फिर किरण से विदा लेकर आशा अपने घर आ गई। और अब कहीं ना कहीं उसके मन में एक सुकून था।

स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

कोरोना क केस दिन पर दिन बढ़ते जाण छी, कोरोनावायरस कै रोकण क बस एक उपाय छी लाकडाउन। आज ब्याखुली कै प्रधानमंत्री ज्यू ल घोषणा कर द्यी, कि २४ मार्च बै १४ अप्रैल तक देश मा लाकडाउन रौल। यौ खबर सुणी बाद आशा भौतै परेशान है पड़ी; आपणी पड़ौसी किरण ल्यी वीक फिकर और बढ़ गै। उ आकाश कै चै बेर कुणी! "हे द्याप्तौ! तुम किरण कै यौ कसि दोहरी मार मारण छा। आजि त वीक मैंस क पीपल- पाणी कै महैण दिण लै न्हैं रै। मलि बै यौ लाकडाउन और लागि गौ।" ..... आशा आपुण मनै-मन बुदबुदाणी, उ दिण गाड़ी क टक्कर ल कतुक घर कुड़ी उज्याड़ द्यी।.... मोहन ड्यूटी बै रोज ब्याखुली कै घर औंछी, पत्त न्हैं! उ दिण दुपहरी कै किलै ऐगो? 'काव आफुं मा नौं न्हैं लिण कुणी' ठीक कुणी, काव लै बुलै रौ हुन्यौल; ब्याखुली कै औंणौ त शायद बच जांण। जो कमौणी छी, उ ई छोड़ि बेर न्हैं गौ।..... द्वी नाणी- नानि च्येलियां छैं किरण क। कसिक समावनेर भै उ आपूं कै और आपणी च्येलियां कै? वीक मलि बै त आसमानै गिर गो! इतुक नाणि उमर मा ख्वोरि जो फुट गै ! अब कसिक काटिनेर भै यौ पहाड़ जैसी जिंदगी।,,, 'सिबौ लै' कै खनैर भै? और कसिक खनैर भै?...लाकडाउन क खबर सुणि बेर त उ औरे टुटि गै हुन्यैल।,,,,,,,,,, भौत देर तक सोचण बाद आशा ल निर्णय ल्यी कि उ हर हाल मा किरण क मदद करैली। उ किरण कै इकैलै कभै न्हैं छोड़ैलि। यौ बाबत उ नाणा क बाज्यू थै बात करैली। और फिर उ उचाट मन कै खेत मा न्हैं गै, गोरू- बाछा ल्ही घा काट लै, और फिर वील आघिन दिण क काम लै आजै निपटै ल्ही। रात मा खाणु खन-खनै आशा ल आपुण मैंस क सामणि जिगर छैड़ी द्यी। आशा क मैंस लै भौतै मयालू मणखी छी। आशा क मने की बात सुणी बेर उ कुणी, "त्वैल म्येरी मन क जसि बात कर द्यी, मैं लै द्वी-तीन दिणों बै यौई बात सोचणे छी, कि किरण क घर खर्च अब कसिक चलल? तू एक काम कर, राशन क एक पर्च बणै लै। भोल म्येरी त ड्यूटी छू, पर तू बाजार जाये, हम द्विनों परिवार क ल्यी महैण- महैण भरी क राशन भर ल्याये। पत्त न्हैं! यौ लाकडाउन कब तक रौल!"... आपुण मैंस क बात सुणी बेर आशा ल राहत क सांस ल्ही, और दुसर दिण घर क काम- धाम निपटै बेर उ बाजार कै बाट लागि गै। बाजार मा आज भौतै भीड़- भाड़ है रौछी। जसिक- तसिक कै आशा ल बणियै क दुकान बै राशन खरीदौ, फिर कपड़िये क दुकान बै ५० मीटर रंग- बिरंगी कपाड़ खरीदौ, और घंटों तक ठाड़ हुई बाद साग- पाते की दुकाण मा नंबर आछौ, वां बै आशा ल २० धड़ी आलू और साग- पात खरीदौ। अंत में वील टैंपो बुक करौ और सब सामान एक बटियै बेर टैंपो में धरौ और घर कै चल द्यी। घर जाण- जाणें आशा रात है गैछी। थ्वाड़ सामान कै अपुण घर छोडि बेर आशा टैंपो कै किरण क घर ल्ही गै, टैंपो क आवाज सुणी बेर किरण क द्विनों च्येलियां आपणी आंगण मा ऐ गयीं। आशा और द्विनों च्येलियां ल टैंपो बै सामान निकाल बेर घर भीतेर एक कुण मा रख द्यी। और उई कमर क एक कुण मा किरण उदास, निराश, पत्त न्हैं कै सोच मा भै रौछी, भीतैर को औंणा, को जांणा वीकै इतुक ल्है होश न्हैं छी। आशा क बुलौण पर किरण स्वीण बै जसि उठी और कुणी "अरे! दीदी तुम?... कब आछा?... बैठो!" और वीक नजर जसै सामानों ल भरी झ्वालों मा पड़ी, त उ पुछैणी! "दीदी इतुक सकर सामान ल्ही बेर यौ रात मा कां बै औंण छां? और कां जांण छा ?"

“त्वैल आज क समाचार त सुणी हालि हुन्यैल?"

"होई दीदी।" इतुकै कुण म किरण क आंखों बै आंसू'क तड़तड़ाट है पड़ी। धोती क टुकै ल आपुण आसूं कै पोछते हुए कुणी,"पत्त न्हैं दीदी मैं कैं क्वै जनमा क कर्मों क दंड मिलैणी"।

आशा, किरण क मुनई कै मुसारते हुए कुणी, "बली लै, यौ बखत त्यर मन मा कै चल रौ हुन्यौल मैं भली कै समझ सकनूं। मैं कैं त्यर घर क रत्ती-रत्ती हाल पत्त छैं। लाकडाउन क खबर सुण बेर मैं बेली बै तुमरी बार मा सोचणै छी। आज मैं आपुण घर क ल्यी राशन-पाणि खरीदण बाज़ार जाई रौछी, मैं ल सोचि तुमर ल्यी लै राशण खरीद ल्यूं। यौ झ्वौला मा राशण किरण कै आपुण आंखों मा विश्वास न्हीं हुणै छी। उ कभी समान कै त कभै आशा क मुखड़ी द्यैखणै छी। आशा किरण क मनैं की उथल-पुथल कै समझ गैछी। आशा कुणी! “किरण मैं हमेशा त्यर साथ ठाड़ि छू। तू बिल्कुल हिम्मत झन हारिये, मोहन यौ दूणी कै छोडिबेर न्हैं गौ, तू कतु लै ख्वार- मुनव फोड़ लै, अब उ लौटिबेर कभै न्हैं आल। यौ बात कै अब तू माणि लै और आपुण जीवन मा आघिन बढ़।...  और आपुण परिवार कै पाव। तू यौ सब तबै कर पाली जब खुद आपुण मन कै पक्क और मजबूत करैली”।... “एक बात बता? त्येरी सास जब ज्यूंन छी उ बतौंछी, म्येरी ब्वारि ल सिलाई- कढ़ाई सबै सीख राखौ। त्वै कैं सिलाई- कढ़ाई ऐंछ”?... 

"दीदी ब्या है पैली सीख त रौछी,, पर! अब सबै भुलि- भालि गयूं"।

"कोई बात न्हैं, पोरखिन बै लाकडाउन लागणों, औणीं- जाणी कम है जाल। मैं यौ कपाड़ ल्है रैयूं। तू दुबारा मेहनत कर, और खूब मेहनत कर। जो सिलाई क हुनर त्वै मा छू,,,, उ हुनर कै अब दोबारा निखार।...खेती- पाति तुमरी छै न्हैं। लेकिन सिलाई करिबेर तू एक आत्मनिर्भर सैणी बण सकै छी। आपणी दमै ल आपणी च्येलियां कै पाऊ सकै छी और द्विनों कै भलि-भलि भांति पढ़े- लिखे सकै छी।... तू कैं त पत्त छू न्हैं? आस-पास कोई कपाड सिणैनी न्हैं, सब कपाड़ सिणै हों बाजार जाणी।...तू काम त शुरू कर,…..  मैं त्येरी मदद करूंल। मैं गौं- गौं, घर-घर जौंल और त्यर सिलाई क प्रचार करुंल। बस तू मन लगै बेर काम करिए”।

मुसीबत क यौ घड़ी मा आशा क सहार और वीक बातों ल किरण कै भौते हिम्मत द्यी। आपुण ल्यी आशा मन में इतु सकर फिकर और मायाजाव द्यैखिबेर किरण ल आशा कै कसि बेर अंगवाव भ्येड़ी द्यी। और फिर त उ आपणी डाढ़ कै रोकि न्हैं पै। उ डाढ़ मारते हुए कुणी, "दीदी यौ टैम मा तुम म्यर ल्यी देवी मां क रुप धरि बेर ऐ रौछा। मैं कैं यौ फिकर ल खै हालि छी, कि मैं आघिन कै के करूंल? और कसिक आपणी च्येलियां कै पाउंल?..

दीदी तुमुल मैं कै सहार दिण क साथ- साथ आघिन कै जिंदगी बितौंण क रास्त लै दिखै हालौ,,,, मैं तुमर यौ एहसान कै"….आशा ल किरण क गिजां मा आपणु आंगुलि रख द्यी, "न्हैं,,, आपणी ज़बान में कभै यौ बात झन ल्याये। तू मैं कैं आपणी जिठाणी माणै छी नैं, और दीदी कौंछी। आज बै तू मैं कै बस आपणी दीदी माणिंयै,,,, दीदी, बैणी पर कभै एहसान न्हैं करैनी... समझ गैछी। एक टैम छी, जब त्येरी सासु ल लै हमैरी भौत मदद कर रैखी। बस,,, यौ त जीवन मा अल्ट- पल्ट छौ। ' आज म्येरी बारि, त भोल त्येरी बारि”।

“तू बस म्येरी एक बात माणि ल्यिये, अब अपुण यूं आंसू कभै न्हैं खड़िये। आघिनै क जिंदगी मा त्वैल आपणी च्येलियां क ईज और बाज्यू द्वीनों बणन छू। और तू कैं अब आपुण खुटां मा ठाड़ हुण भौत जरूरी छू। तबै तू आपुण सबै फ़र्ज़ पुर कर पाली, और आपुण च्येलियां क जिंदगी मा एक नई किरण बण पालि।....’समझ गैछी, माणैली नैं म्येरी बात"। किरण ल माठु- माठ "होई" मा आपणी मुनई कै हिलै दी। आशा क बातों ल किरण कै भौत ढांढस और हिम्मत मिली और अब किरण क डाढ़ थ्वाड़़ थम गैछी। थोड़ी देर इथा- उथा बात करि बेर आशा ल किरण क मुखड़ी मा एक नज़र मारी। किरण क मुखड़ी मा चिंता कुछ कम है गैछी। फिर उ किरण थै कुणी, रात भौत हैगे अब मैं लै घर जांणू। और तू लै खांणू बणैं लै, और टैम पर ख्यै ल्यियौ। और फिर आशा आपुण घर कै बाट लागि गै।.. किरण आंगण मा ठाढ़ है बेर देर तक आशा कै घर जांण देखते रै।…………किरण तब तक आशा कै द्यैखते रै, जब तक कि आशा बिजुली क उज्याव में द्यिखीण लागि रौछी,,,वील आशा क बार मा आपणी सासु और मैस है सुण रैछी,…… पर सांचि मा आज वील साक्षात देवी क दर्शन करौ,,,, और फिर किरण माठु- माठु कदम बढ़े बेर आपुण भीतेर ऐ गै। वील द्वार मा सांगव लगाईं, और फिर आपणी द्वीनों च्येलियां कै आपुण क्वाठ मा भर ल्ही।

आपुण घर पहुंच बेर आशा ल मास्क उतारौ, और सबूं है पैली नाण- ध्वैंण करौ। नैं- ध्वै बेर आशा ल गरमागरम चहा बणैं, और फिर चहा क गिलास ल्यी बेर खाट मा भै गै। किरण क ल्यी वीक मन मा जो फिकर है रौछी, उ फिकर अब थ्वाड़ कम है गौछी।... पर देश मा कोरोना क बढ़ते केश द्यैख बेर आशा क शांत मुखड़ी मा फिर चिंता क रेखा द्यीखीण लागि


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी- हल्द्वानी, 

नैनीताल, उत्तराखंड।