देव की नज़र दरवाजे पर ही थी। वह शालू को कई बार काॅल कर चुका था; शालू का मोबाइल स्विच आफ आ रहा था। देव की चिंता अब और बढ़ने लगी।
शालू ने आफिस से निकलते समय देव को काॅल करके बताया था, कि मैं आफिस से निकल रही हूं।... हर रोज तो शालू ७ बजे तक घर पहुंच ही जाती है। आज ८ बजने वाले हैं; अभी तक क्यों नहीं आईं होगी। अब देव के मन में एक अनजाना सा डर घर कर रहा था। देव मन ही मन बुदबुदाने लगा हे भगवान! शालू सकुशल घर पहुंच जाय। देव फिर से शालू का नम्बर मिलाने लगा। तभी दरवाजे की घंटी बजी। देव लपककर दरवाजे के पास गया और जल्दी से दरवाजा खोला सामने शालू खड़ी थी। शालू को देखकर देव ने एक सुकून भरी सांस ली। और बोला शुक्र है भगवान का, तुम सकुशल हो; शालू मुस्कुराते हुए बोली साॅरी थोड़ी देर हो गई ना। दरवाजे को बंद करते हुए देव बोला; "तुम जल्दी से नहा-धोकर आओ तब तक मैं चाय बनाता हूं"।...
कुछ ही देर में शालू नहा-धोकर बाहर आई; तब तक देव ने चाय बना दी थी।गरमागरम चाय का कप शालू को थमाते हुए देव ने पूछा "तुम तो ६ बजे आफिस से निकल गई थी। फिर इतनी देर कैसे हो गई ? और तुम अपना मोबाइल क्यों नहीं उठा रही थी? मेरी फिक्र से जान ही निकली जा रही थी"।
शालू ने कहा "काम की अधिकता के कारण मैं मोबाइल चार्ज करना भूल गई। और आते समय बैटरी लो होने के कारण मोबाइल बंद हो गया था। मैं सोच ही रही थी, आप फ़िक्र कर रहे होंगे।.... और आज से तो आटोरिक्शा वालों ने २० रूपये से किराया बढ़ाकर ५० रूपए कर दिये हैं; मैं आफिस से लाल बत्ती चौराहे तक ओटोरिक्शा में आईं,,, और फिर लालबत्ती से पैदल आ रही हूं। मैंने सोचा थोड़ी ही दूर पर तो घर है पैदल ही चलती हूं। कम-से-कम ५० रूपए तो बचेंगे। और इन ५० रूपयों से कल की सब्जी आ जाएगी"।
"पता नहीं यह महामारी कब तक खत्म होगी।.... ऊपर से इस बढ़ती हुई महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ कर रखी है"।
शालू की बातें सुनकर देव बोला "मेरी नौकरी छूट जाने के कारण घर ख़र्च की सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर पड़ गई है। मुझे यह बात अंदर ही अंदर बहुत कचोटती है।... मैं घर में खाली बैठा हूं, और तुम आफिस जा रही हो... सच कहूं मुझे खुद पे बहुत गुस्सा आ रहा है, और कभी-कभी तो बड़ी ग्लानि सी महसूस हो रही"...... देव आगे कुछ कहता शालू ने देव के होंठों पर अपना हाथ रख दिया और बोली,,,, "तुम्हारी नौकरी छूटने में तुम्हारा क्या दोष है। इस बात से स्वयं पर क्यों गुस्सा होते हो? और नहीं ये ग्लानि करने वाली बात है। इस महामारी से समस्त विश्व की आर्थिक व्यवस्था चरमराई गई है। जिसके चलते लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। तुम टीवी में देख ही रहे हो ना। बेरोज़गारी की वजह लाखों लोग भूखे प्यासे और पैदल ही अपने- अपने गांवों को जा रहे हैं।.... हमें तो भगवान का शुक्रिया करना चाहिए कि हम-दोनों में से कोई एक तो नौकरी कर रहा है ना, और उससे भी बड़ी बात यह है कि इस महामारी में हम दोनों स्वस्थ्य- सुरक्षित हैं। और साथ- साथ हैं"।....
महामारी का यह समय यूं ही नहीं रहेगा। इस कोरोनावायरस से हम लोगों को एक दिन अवश्य मुक्ति मिलेगी।... कुछ समय बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा।.... तुम्हें बहुत जल्दी दुसरी और बेहतर नौकरी मिलेगी।... बस मेरा हाथ यूं ही थामे रखना। सफ़र आसान हो जाएगा"।
शालू की बातें सुनकर देव ने शालू का हाथ कसकर पकड़ लिया और फिर मुस्कुराते हुए बोला "तुम सही कह रही हो "। शालू ने घड़ी की ओर देखा ९: ३० बज चुके थे। फिर दोनों उठकर रसोई की ओर चल दिये।
कुछ ही देर में शालू नहा-धोकर बाहर आई; तब तक देव ने चाय बना दी थी।गरमागरम चाय का कप शालू को थमाते हुए देव ने पूछा "तुम तो ६ बजे आफिस से निकल गई थी। फिर इतनी देर कैसे हो गई ? और तुम अपना मोबाइल क्यों नहीं उठा रही थी? मेरी फिक्र से जान ही निकली जा रही थी"।
शालू ने कहा "काम की अधिकता के कारण मैं मोबाइल चार्ज करना भूल गई। और आते समय बैटरी लो होने के कारण मोबाइल बंद हो गया था। मैं सोच ही रही थी, आप फ़िक्र कर रहे होंगे।.... और आज से तो आटोरिक्शा वालों ने २० रूपये से किराया बढ़ाकर ५० रूपए कर दिये हैं; मैं आफिस से लाल बत्ती चौराहे तक ओटोरिक्शा में आईं,,, और फिर लालबत्ती से पैदल आ रही हूं। मैंने सोचा थोड़ी ही दूर पर तो घर है पैदल ही चलती हूं। कम-से-कम ५० रूपए तो बचेंगे। और इन ५० रूपयों से कल की सब्जी आ जाएगी"।
"पता नहीं यह महामारी कब तक खत्म होगी।.... ऊपर से इस बढ़ती हुई महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ कर रखी है"।
शालू की बातें सुनकर देव बोला "मेरी नौकरी छूट जाने के कारण घर ख़र्च की सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर पड़ गई है। मुझे यह बात अंदर ही अंदर बहुत कचोटती है।... मैं घर में खाली बैठा हूं, और तुम आफिस जा रही हो... सच कहूं मुझे खुद पे बहुत गुस्सा आ रहा है, और कभी-कभी तो बड़ी ग्लानि सी महसूस हो रही"...... देव आगे कुछ कहता शालू ने देव के होंठों पर अपना हाथ रख दिया और बोली,,,, "तुम्हारी नौकरी छूटने में तुम्हारा क्या दोष है। इस बात से स्वयं पर क्यों गुस्सा होते हो? और नहीं ये ग्लानि करने वाली बात है। इस महामारी से समस्त विश्व की आर्थिक व्यवस्था चरमराई गई है। जिसके चलते लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। तुम टीवी में देख ही रहे हो ना। बेरोज़गारी की वजह लाखों लोग भूखे प्यासे और पैदल ही अपने- अपने गांवों को जा रहे हैं।.... हमें तो भगवान का शुक्रिया करना चाहिए कि हम-दोनों में से कोई एक तो नौकरी कर रहा है ना, और उससे भी बड़ी बात यह है कि इस महामारी में हम दोनों स्वस्थ्य- सुरक्षित हैं। और साथ- साथ हैं"।....
महामारी का यह समय यूं ही नहीं रहेगा। इस कोरोनावायरस से हम लोगों को एक दिन अवश्य मुक्ति मिलेगी।... कुछ समय बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा।.... तुम्हें बहुत जल्दी दुसरी और बेहतर नौकरी मिलेगी।... बस मेरा हाथ यूं ही थामे रखना। सफ़र आसान हो जाएगा"।
शालू की बातें सुनकर देव ने शालू का हाथ कसकर पकड़ लिया और फिर मुस्कुराते हुए बोला "तुम सही कह रही हो "। शालू ने घड़ी की ओर देखा ९: ३० बज चुके थे। फिर दोनों उठकर रसोई की ओर चल दिये।
स्वरचित: मंजू बिष्ट, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।