Thursday, 29 January 2026

कान्हा: हिंदी कविता।

कान्हा तेरी लगन लगी, मैं रोई- रोई जाऊं।

वह राह बता दे इसमें चलकर, मैं तुझको पा जाऊं।।

मंदिर- मंदिर तुझको ढूंढूं, कहीं ना तुझको पाऊं।

तेरी सेवा करके कान्हा, मैं अपने मन को बहलाऊं।।


जानती हूं मैं भी कान्हा, मेरे मन मंदिर में तू बैठा है।

लेकिन मन बावरा फिर भी, तुझको ढूंढने निकला है।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह बाती कैसे बनाऊं।

जिससे मन मंदिर के अंदर, मैं तेरी ज्योति जलाऊं।।


सुना है तेरे नाम सुमिरन से, मैं तुझको पा सकती हूं।

पर! इस गृहस्थ जीवन में, मैं नाम बिसरा देती हूं।।

मेरे लाडले इतना बता दे, वह भक्ति कैसे जगाऊं।

जिससे माया के बन्धन से, मैं बाहर निकल जाऊं।।


लगन लगी है तेरी कान्हा, मेरे मन मंदिर में ज्योति जलेगी।

भाव देखेगा जब दासी के, कभी तो कृपा बरसेगी।।

उल्टी- सीधी सेवा लाडले, कभी तो स्वीकार होगी।

इस जन्म में नहीं अगले जन्म में सही, तुझे पाने की मन्नत पूरी होगी।।


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट। 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

सर्वाधिकार सुरक्षित।

Saturday, 24 January 2026

मैया: कुमाऊनी कविता।

 मुखड़ा- ऊंच- नीचा डांड्यू कै करी पार।

ओ मैया, ऐ गयूं त्यर द्वार मा।।

दर्शन दी जा वे इक बार।

ओ मैया, ऐजा वे बैठि शेर मा।।


कोरस- बैठि शेर मा, बैठि शेर मा,बैठि शेर मा, बैठि शेर मा 

ऐजा वे ऐजा एक बार ओ मैया ऐ जा वे बैठि शेर मा।।

शेर मा।।


अंतरा1- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई झांवरी, कोई बिछ्छू ल्यै रैयीं,

झांवरी पैरेली मैया आज। ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

बिछछू पैरैली मैया आज, ओ मैया ऐ जा वै बैठी शेर मा।


अंतरा2- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई लंहगा, कोई साड़ी ल्यै रैयीं,

चुन्नी ओडूंल मैया आज, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।


अंतरा3 - दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई मैहदी, कोई चूड़ी ल्यै रैयीं,

मेहंदी रचा ली मैया आज, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

चूड़ी पैरेली मैया आज ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।



अंतरा4- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

गउ क हरूवा, कोई नथुलि ल्यै रैयीं,

हार पैरेली मैया आज ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

नथुलि पैरैली मैया आज ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।


अंतरा5- दूर- दूरां बै मैया भक्ता ऐ रैयीं,

कोई टिकुलि कोई बिंदुलि ल्यै रैयीं,

बिदुलि सजालि मां कपाल, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा,

टिकुलि लगानी ख्वर माथ, ओ मैया ऐ जा वे बैठी शेर मा।


स्वरचित- मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी- हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड।





Friday, 9 January 2026

योगी आदित्य नाथ ज्यूक जीवन परिचय: कुमाऊनी कविता

 राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


१- आंनद ज्यू' क घर मा, आनंद छाई रौ।

जन्म ल्ही रौ भौ लै, कै धूम मची रौ।।

जो द्यैखैनी भौ कै, द्यैखियै रै जाणी, द्यैखियै रै जाणी।

सावित्री ज्यू काखी मा, एक तेज़ खेलैंणी।।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली,पधानी रधुली,,ओ।२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


४- पौड़ी- गढ़वाला, पढ़ायो- लिखायो।

ऋषिकेश जै बेर दीक्षा छू पायो।।

अब जाणौं अजय, नाथों' क पंथ मा,नाथों' क पंथ मा।

गोरखनाथ मंदिर में, जोगी बणना।।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली, पधानी रधुली,, ओ।२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जपलै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


३- देवभूमि' क लाल लै, जोग धरि यो।

भारि तपस्या करि बैर, योगी बणि गो।।

यौ सिंदूरी रंग में, योगी रंगी गो,,,जोगी रंगी गो।

म्यर देश' क आज, हर मनखी रंगी ग्यौ।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली, पधानी रधुली। ओ२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।

 

४- भल भला छा शिष्य तुम, आपुण गुरु का।

साहसी, निडर मुख्यमंत्री, यू पी राज का।।

भ्रष्टाचार कौ तुमुल कर दी सफ़ाया, कर दी सफ़ाया।

पांच सौ साल बाद, राम राज संवारा।।

हिट द्येखी बेर औनूं, पधानी रधुली, पधानी रधुली,,,ओ।२..

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


राम नाम जप लै, पधानी रधुली।

सारी दूणी है गे, सिंदूरी- सिंदूरी।।


सर्वाधिकार सुरक्षित।

स्वरचित मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

(मूल निवासी-हल्द्वानी, नैनीताल।)

Wednesday, 7 January 2026

पीड़: कुमाऊनी कविता।

 तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसि रूंला तुमरी बग़ैरा।। 

तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसि रूंला तुमरी बग़ैरा।।


कसमों- रस्मों कै भुुली गैछा।

बीच भंवर में छोड़ि गैछा।।

ओ,,,,,,,कसमों- रस्मों कै भुुली गैछा

बीच भंवर में छोड़ि गैछा।

किलै न्हीं सोचि,,,,,,किलै न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

ओ,,,,तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौली तुमरी बग़ैरा।।

तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौली तुमरी बग़ैरा।।


तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसिक रूंला तुमरी बग़ैरा।। 


नाण-तीना कै छोड़ि गैछा।

छ्वार-मुवा तुम करी गैछा।

ओ,,,,,,नाण-तीना कै छोड़ि गैछा।

छ्वार-मुवा तुम करी गैछा।

कलै न्हीं सोचि,,,,,,किलै न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

ओ,,,, तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौला बाज्यू' क बगैरा।।

तुमुल न्हीं सोचि इक बारा,,,,?

कसिक रौला बाज्यू' क बगैरा।।


तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसि रूंला तुमरी बग़ैरा।। 


सासू- सौर ढूंढण में रेंगीं।

तुमर बाटा देखण में रेंगीं

ओ,,,,,,,सासू- सौर ढूंढण में रेंगीं।

तुमरी बाटा देखण में रेंगीं

कब आलौ लाड़िल हमरा,,,?

ओ,,,,कब आलौ पोथिल हमरा,,,,?

रुणैं- रूणैं पड़ीं छैं बेसुुुधा।।

कब आलौ लाड़िल हमरा,,,?

कब आल पोथिल हमरा,,,,?

रुणैं- रूणैं पड़ीं छैं बेसुुुधा।।


तुमी न्हैं गैछा छोडि बैरा।

कसिक रूंला तुमरी बग़ैरा।। 


सर्वाधिकार सुरक्षित।

स्वरचित: मंजू बिष्ट; 

गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी: हल्द्वानी; नैनीताल।

(उत्तराखंड)


Saturday, 3 January 2026

मेरी सुवा- कुमाऊनी गीत।

 मुखड़ा - जा रे, जा रे चंदा, आपणी देश मा।

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे की आड़ मा।।

त्येरी नज़र पड़ेली, सुवा की मुखड़ी मा।

ज्यों नज़र पड़ेली सुवा की मुखड़ी मा।।

जली भुनी जालै, आपणी देश मा। 

तू, जली भुनी जालै, आपणी देश मा।।


 (१) अंतरा- कपाला में बिंदी चमकने चमाचम।..२

नाक में नथुली, दमकने दमादम।।२..

जब द्यैखलै चंदा, सुवा कति बाना।

ज्यों द्यैखलै चंदा, सुवा म्येरी बाना।।

जली भुनी जालै, आपणी देश मा।

 तू, जली- भुनी जालै,आपणी देश मा।।


मुखड़ा- जा रे,जा रे चंदा, आपणी देश मा।

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे की आड़ मा।। 


(२) अंतरा - आंखों में काजला, लाली छू ओंठ मा। २..

सुवा देखी बढ़ गे, दिले की धड़कना।। म्येरी, २..

जब द्यैखलै चंदा, सुवा कै हंसणा।

ज्यों द्यैखलै चंदा, मुलमुलौ हंसणा।।

जली- भुनी- जालै, आपणी देश मा। 

तू,तो जली- भुनी जालै, आपणी देश मा।।


मुखड़ा - जा रे,,,, जा रे चंदा, आपणी देश मा,,,,

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे' की आड़ मा,,,,


(३) अंतरा - खन-खन, खन- खन चूड़ी, खनकणी हाथ मा। २..

छम- छम, छम- छम झांवर, बाजणी खुटा मा।। २..

जब सुणलै चंदा, झांवर की रुनझुना।

ज्यों सुणलै चंदा झांवर की रुनझुना।।

जलि- भुनी जाले, आपणी देश मा। 

तू, तो जलि- भुनी जाले आपणी देश मा।।


मुखड़ा- जा रे, जा रे चंदा, आपणी देश मा।

बैठी रै म्यर सुवा, घुंघटे की आड़ मा।।२.


स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट।

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

मूल निवासी- हल्द्वानी, नैनीताल। उत्तराखंड।

सर्वाधिकार सुरक्षित।