जीवन की कुछ घटनाएं समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि स्मृतियों के आकाश में और अधिक उजली हो जाती हैं। वे केवल बीते हुए दिनों की कहानी नहीं होती, बल्कि हमारे व्यक्तित्व के निर्माण की आधारशिला बन जाती हैं। यह संस्मरण भी मेरे जीवन के ऐसे ही एक अनुभव की कथा है, जिसने मुझे सिखाया कि समाज सेवा का मार्ग जितना आकर्षक दिखाई देता है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी होता है।
कुछ वर्ष पूर्व की एक घटना आज भी मेरे मन में संस्मरण बनकर पूरी ताज़गी के साथ जीवित है। उस समय गाज़ियाबाद में उत्तराखंड समाज की एक नई संस्था का गठन हुआ था। यह पहल समाज को एक नई दिशा देने का अवसर बन सकती थी, किंतु उस समय परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल नहीं थीं। हमारी सोसाइटी सहित अनेक अन्य सोसायटियों के उत्तराखंडी परिवार संस्था के संचालन की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं थे।
इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि जिन पुराने साथियों ने वर्षों की मेहनत से उत्तराखंड समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया था, संस्था बनने के बाद उन्हें अपेक्षित सम्मान और स्थान नहीं मिला। जिन्होंने समाज को जोड़ने की नींव रखी, वही स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे। यह स्वाभाविक था, उनके मन में पीड़ा और निराशा थी, और उनके साथ जुड़े लोगों के मन में भी असंतोष की भावना घर कर गई। ऐसे वातावरण में समाज दो अलग- अलग विचारधाराओं में बंटा हुआ दिखाई देता था।
इन परिस्थितियों से मैं भी अनभिज्ञ नहीं थी, मेरे मन में भी अनेक प्रश्न थे, कुछ खिन्नता भी थी। किंतु अंतर्मन से एक स्वर बार- बार कहता था- "व्यक्ति से बड़ा समाज होता है और समाज से बड़ी संस्कृति।" यदि उत्तराखंड की संस्कृति और समाज के हित में कोई सकारात्मक प्रयास हो रहा है, तो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर उसमें अपना योगदान देना ही सच्चा दायित्व है।
सौभाग्य से संस्था के प्रथम सांस्कृतिक महोत्सव की सांस्कृतिक जिम्मेदारियों में मुझे भी सम्मिलित किया गया। मैंने सभी व्यक्तिगत मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए यह दायित्व सहर्ष स्वीकार किया। परिणामस्वरूप मेरे कुछ परिचित और आत्मीय उत्तराखंडी परिवार भी मुझसे नाराज़ हो गए, किंतु मैंने अपने निर्णय को समाज हित की दृष्टि से उचित माना।
महोत्सव की तैयारियों में मैंने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उत्तराखंड के बच्चों और महिलाओं को खोज- खोजकर जोड़ा, उन्हें मंच के लिए तैयार किया, निरंतर अभ्यास करवाया। मेरी लगन और परिश्रम को देखकर कार्यक्रम के मंच संचालन का दायित्व भी मुझे सौंपा गया। यह मेरे लिए अत्यंत प्रसन्नता और गर्व का क्षण था। मैंने बहुत लगन और मेहनत से तैयारी की। मेरे मन में केवल एक ही संकल्प था कि संस्था का पहला सांस्कृतिक महोत्सव इतना सफल हो कि लोगों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति नया विश्वास और आत्मीयता जागृत हो।
कार्यक्रम का दिन आया। सभागार दर्शकों से खचाखच भरा था। बच्चों का उत्साह, महिलाओं की सहभागिता और उत्तराखंड की लोक संस्कृति के रंग पूरे वातावरण को जीवंत बना रहे थे।
लेकिन मंच संचालन का अनुभव मेरी अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग था। माइक मुझे तभी मिलता, जब मैं स्वयं आग्रह करती। उस समय मन बहुत आहत भी हुआ। पर मैंने अपने भावों को अपने दायित्व से बड़ा नहीं होने दिया। मैंने सोचा कि मेरा उद्देश्य स्वयं को साबित करना नहीं, बल्कि कार्यक्रम को सफल बनाना है। इसलिए जितना भी अवसर मिला, पूरे मन, निष्ठा और आत्मीयता के साथ मंच संचालन किया। अंत में जब कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ और दर्शकों का स्नेह, उत्साह तथा सराहना मिली, तो लगा कि यही मेरे प्रयासों का सबसे बड़ा पुरस्कार है।
उस अनुभव ने मुझे सिखाया कि समाज सेवा का असली अर्थ बिना किसी स्वार्थ के अपना कर्तव्य निभाना है। इस रास्ते पर कभी उपेक्षा मिलती है, तो कभी हमारी मेहनत का श्रेय किसी और को चला जाता है।
यदि हमारे मन में समाज और अपनी संस्कृति के लिए सच्चा समर्पण है, तो हर संघर्ष एक नई सीख देता है और आगे चलकर किसी अच्छे सृजन का कारण बनता है।
वर्ष 2015 में दो गरीब बच्चियों को पढ़ाने से मैंने समाज सेवा के क्षेत्र में अपना पहला कदम रखा, 2020 से मैं उत्तराखंड की बोलि- भाषा, और सांस्कृतिक के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य कर रही हूं और भविष्य में भी इसी संकल्प के साथ कार्य करती रहूंगी।
आज फिर जीवन के द्वार पर एक नए संघर्ष ने दस्तक दी है। अनुभव ने सिखाया है कि हर संघर्ष अपने साथ एक नई सीख, नई शक्ति और नए अवसर लेकर आता है। इसलिए इस बार भी मन में न कोई भय है, न निराशा, सिर्फ एक विश्वास है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह संघर्ष भी मेरे जीवन में एक नई शुरुआत का आधार बनेगा। आज जो कठिनाई प्रतीत हो रही है, वही कल किसी सुंदर सृजन का कारण बनेगी। जीवन की हर ठोकर ने मुझे आगे बढ़ना सिखाया है, इसलिए इस बार भी मैं पूरे साहस, धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ुंगी।
"क्योंकि संघर्ष कभी अंत नहीं होता, वह एक नए सृजन की शुरुआत होती है।"
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट
गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश