रविवार, 19 जुलाई 2026

सपने का बोझ: एक मां की स्वीकारोक्ति। संस्मरण।

जीवन की सबसे बड़ी शिक्षाएं पुस्तकें नहीं देती, वे हमारी अपनी भूलें देती हैं। कुछ स्मृतियां समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि हर बीतते वर्ष के साथ और अधिक स्पष्ट होती जाती हैं। वे भीतर कहीं चुपचाप बैठी रहती हैं और अवसर मिलते ही आत्मा से प्रश्न पूछने लगती हैं। यह संस्मरण मेरी ऐसी ही एक स्मृति का दस्तावेज़ है। यह किसी आदर्श मां की कहानी नहीं है। यह एक ऐसी मां की स्वीकारोक्ति है, जिसने अपने बच्चे से अथाह प्रेम किया, पर उसी प्रेम के आवेग में अनजाने ही उसकी मासूमियत पर अपनी महत्वाकांक्षाओं का भार रख दिया।

विवाह के बाद जीवन का प्रारंभिक दौर संघर्षों से भरा था। हमारा परिवार आर्थिक रूप से साधारण था। मेरे पति एक कालेज में इलेक्ट्रिशियन थे। आय सीमित थी, लेकिन सपनों पर कोई सीमा नहीं थी। हर मां की तरह मेरी भी इच्छा थी कि मेरा बेटा वह सब पाए जो हमें कभी नहीं मिला। मुझे विश्वास था कि यदि उसे शहर के सबसे प्रतिष्ठित विद्यालय में पढ़ा दूंगी, तो उसका भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल हो जाएगा। और हमने बेटे का दाखिला दिल्ली पब्लिक स्कूल में करा दिया।

उस विश्वास ने मुझे दिन- रात सिलाई मशीन के सामने बैठा दिया। मशीन की सुई केवल कपड़े नहीं सीती थी, वह मेरे सपनों को भी जोड़ती चली जाती थी। देर रात तक चलती मशीन की घरघराहट में मुझे अपने बेटे का सुनहरा भविष्य सुनाई देता था। 

धीरे- धीरे घर का हर महीना फीस की तारीख के इर्द- गिर्द सिमटने लगा। हमारी छोटी- छोटी खुशियां घूमना-फिरना, अपनी इच्छाएं, त्योहारों की सहज मुस्कान सब कुछ उस एक बार फीस की रसीद के नीचे दबता चला गया। हम जी तो रहे थे, लेकिन खुलकर नहीं जी पा रहे थे।

मेरा बेटा पढ़ाई में औसत था। वह अपनी क्षमता भर प्रयास करता था, लेकिन मेरी अपेक्षाएं उसकी क्षमता से कहीं बड़ी थीं। जब भी उसके अंक कम आते, मैं उसकी कापी नहीं देखती थी, उसकी मेहनत भी नहीं देखती थी। मुझे केवल वह भारी फीस दिखाई देती थी, जिसे भरने के लिए हमने अपने जीवन की अनेक आवश्यकताओं का त्याग किया था।

मैं उसे बार- बार यही कहती, "इतने महंगे स्कूल में पढ़ रहे हो, इतना पैसा खर्च हो रहा है, अभी मन लगाकर नहीं पढ़ते, नंबर देखो जरा अपने, किसी को बता भी नहीं सकते, लोग क्या कहेंगे?"

मैं आज सोचती हूं, मैं उसे पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर रही थी, बल्कि अनजाने में उसके मन पर अपराधबोध का बोझ रख रही थी। मैंने कभी यह नहीं सोचा कि हर बच्चे की अपनी बौद्धिक क्षमता होती है। जो जितना कर सकता है, वह उतना ही करेगा। अपेक्षाएं प्रेरणा बनें तो सुंदर होती हैं, लेकिन जब वे तुलना और दबाव बन जाएं, तो बच्चे का आत्मविश्वास धीरे- धीरे टूटने लगता है।

एक घटना आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है, मानो वह कल ही घटित हुई हो। उस समय मेरा बेटा लगभग सात- आठ वर्ष का था। रविवार का दिन था। पतिदेव ओवरटाइम के कारण आफिस चले गए थे। घर के सभी काम निपटाकर मैं नहाने के लिए बाथरूम में गई।

अभी कुछ ही समय बीता था कि अचानक बाहर से बाथरूम का दरवाज़ा बंद हो गया।  मैंने बेटे को आवाज दी, "बेटा शुभम! दरवाज़ा खोलो।" परंतु उधर से कोई उत्तर नहीं आया।

मैंने फिर पुकारा। कभी प्यार से तो कभी गुस्से से पुकारा, कभी घबराकर रूंवासी आवाज में पुकारा। और साथ ही किसी अनहोनी के डर से मेरी बेचैनी भी बढ़ रही थी। किंतु आश्चर्य! न कोई उत्तर मिला, न कोई आहट सुनाई दी। बड़ी मुश्किल से लगभग आधे घंटे के आसपास उसने दरवाज़ा खोला। बाहर निकलते ही मैंने उसके कान जोर से खींचे और कहा, "तुम्हारी शरारतें  तो दिन- प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। आज तुम बाहर खेलने नहीं जाओगे। सिर्फ पढ़ाई करोगे। मैंने दंडस्वरूप उसे जबरन पढ़ने बैठा दिया और स्वयं अपनी सिलाई मशीन पर जाकर काम में लग गई। उस समय मुझे लगा कि बात यहीं समाप्त हो गई है

लेकिन आज, वर्षों बाद, जब उस घटना को याद करती हूं, तो समझ में आता है कि वह शरारत नहीं थी। वह एक छोटे से बच्चे का मौन विद्रोह था। उसके भीतर जमा हुआ आक्रोश, जिसे वह शब्दों में नहीं कह सकता था, उसने उसी तरह व्यक्त किया।

उस दिन मेरा बेटा मुझे बाथरूम में बंद नहीं कर रहा था; वह शायद उन शब्दों का प्रतिरोध कर रहा था, जिनसे मैं रोज उसके मन को बंद कर रही थी।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट, 

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।

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