चारों ओर मुखौटों का मेला,
सच का चेहरा लाचार है।
दिखावे की चकाचौंध में,
हर संवेदना बीमार है।।
भोले मन को मूर्ख समझना,
अब जग की पहचान हुई।
चापलूसी के ऊंचे सिंहासन,
मेहनत फिर उपेक्षित हुई।।
छल- प्रपंच की आंधी ऐसी,
विश्वास बिखर- बिखर जाता है।
मित्रों के ही बदले चेहरे,
मन को भीतर तक छल जाता है।।
रिश्तों की चौखट पर देखो,
स्वार्थ का पहरा गहरा है।
हर मुस्कान के पीछे जैसे,
कोई छिपा अंधेरा है।।
मेहनत का मूल्य कहां मिलता,
झूठ यहां सम्मानित है।
मक्खन बाजी के दरबारों में,
सत्य सदा तिरस्कृत है।।
फिर भी मन से हार न मानो,
सत्य कभी मरता नहीं।
मुखौटों के इस संसार में,
ईमान कभी झुकता नहीं।।
स्वरचित- मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।