बसंत ऋतु जा रही है, और ग्रीष्म ऋतु आ रही है
किसान के खेत में गेंहू की फसल, सोना बन लहरा रही है।।
गेहूं की हर बाली में, किसान का सपना सज रहा है।
देख- देखकर उसका मन, रोमांचित हो रहा है।।
साल भर की उसकी मेहनत, अब खुशियां लाने वाली हैं।
सपना सजा है उसकी आंखों में, वह पूरी होने वाली हैं।।
आज अचानक! मौसम बदलने से, एक अनहोनी हो गई।
बादल गरजे, बिजली चमकी, और बेमौसम बारसात हो गई।।
शाम ढले, जो गेहूं खड़ा था गर्व से, वो औंधे मुंह लटक रहा है।
काटकर बधां हुआ गेंहू, पानी में पड़ा रो रहा है।।
किसान खड़ा खेत में अपने, उसकी आंखों में बस पानी है।
साल भर की मेहनत बर्बाद देखकर, छाई जीवन में वीरानी है।।
हे बादल! तू क्यों बरसा आज, खुशियां आने वाली थी मेरे द्वार।
छीनी तूने मेरी खुशियां, देख! बेबस है आज मेरा परिवार।।
ना कोई सुनता दर्द किसान का, ना कोई पूछे उसका हाल।
बस चुपचाप वो सहता जाए, कुदरत के जख्म सहता हर साल।।
ये बारिश नहीं कहर है, जो किसान पर टूट पड़ा है।
जो सबको रोटी देता है, वो गेहूं के खेत में उदास खड़ा है।।
कुदरत तेरी मार से, अगर यूं ही अन्नदाता रोएगा।
तो कैसे देश पल्लवित होगा!, और कैसे आगे बढ़ेगा!!
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।