Friday, 2 January 2026

कोरोना काल: कुमाऊनी कविता।

कोरोना काल क टैम छू,

चैत्र क यौ महैंण छू।

नाण-तिनौं क नैं क्वै चिचाट है रौ,

गौं भरि में बड़ उदेख छै रौ।


अ- आ, क- ख, पढ़नें- पढ़नें,

मधुलि दबड़ है भ्यार कै द्यैखनें। 

द्येखि जालि, कभै परुली भ्यार फन,

शान-शान में बात-चित कर लिन।।


इजा क खुटा क धप- धप सुणी बेर;

मधुलि सरासर भागि गै भितेर।

देखि मधुलि क मने क छटपटाट,

ईजा ल मायाजाव क करि तड़तड़ाट।।


च्येली! मन लगै बेर जब तू पढ़लि,

अघिन कै कक्षा में तबै तू बढ़लि।

माया लुटै बेर समझा मधुलि कै,

द्वी गज क दूरि क फैद बता वीकै।।


समझन में मधुलि ल करि नैं देर,

कुणी, ईजा! अब पढ़न में नैं करुल अबेर।

नई कक्षा क आंखों में स्वीण सजै,

भै गे मधुलि पढ़न सुनि कै।।


स्वरचित: मंजू बिष्ट;

गाजियाबाद; उत्तर प्रदेश।