2025, आज तुम्हारी विदाई है,
पूरे वर्ष की समस्त यादें बहुत ही सुखदाई हैं,
दामन में तुमने भरी हैं मेरे खुशियां ही खुशियां,
सच कहूं 2025, तेरे जाने पर मेरी आंखें भर आईं हैं।
जनवरी माह में मिली हम उत्तराखंड की नारियां,
हर उत्सव मिलकर मनायेंगे होने लगी तैयारियां,
साथ रहे, संगठित रहे और किये कठिन काज,
सच कहूं 2025, हर सशक्त नारी पर मैं जाऊं बलिहारियां।
महाकुंभ स्नान से पुण्य कर्म उदित हुए,
शाकुंबरी व ज्योतिर्लिंगों के दर्शन फरवरी और मार्च में हुए,
शादी की 25 वीं सालगिरह में,
सच कहूं 2025, हमारे चित्त ज्योतिर्गमय हुए।
अप्रैल में मिट गई मेरी बची-खुची तृष्णा,
वृंदावन में देखे मैंने जब राधे- कृष्णा,
संत- महंत के संग से मेरा मन निर्मल हुआ,
सच कहूं 2025, दासी बनूं कृष्ण की, आई ऐसी स्फुंरणा।
मई में उत्तराखंड के खूबसूरत पहाड़ देखे,
कोटद्वार में सिद्धबली, नील कंठ में भोलेनाथ देखे,
सीतावनी की तीन जल धाराओं में,
सच कहूं 2025, खुशियों के कई रंग देखे।
भागवत महापुराण के स्वाध्याय से जून माह सार्थक हुआ,
प्रथम कृष्ण जन्मोत्सव से जुलाई मास खास हुआ,
अगस्त, सितंबर, अक्टूबर में प्रभु की ऐसी हुई कृपा,
सच कहूं 2025, संतों के चरण धूलि से मेरा घर पावन हुआ।
किशोरी जी ने गुरु दीक्षा देकर मेरे जीवन को कृतार्थ किया,
नवंबर माह में कुरुक्षेत्र भ्रमण से भगवत गीता का चक्षु पान किया,
यूं तो पूरा साल मेरा बेहद ही लाजवाब रहा,
सच कहूं 2025, साल के अंतिम माह ने लाड़ प्यार देकर कमाल किया।
मेरे घर की शादी में खुशियां ही खुशियां छाईं,
अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी में जाने पर खुशियां दो गुनी हुईं,
नेपाल-भारत साहित्य गौरव सम्मान पाकर,
सच कहूं 2025, मेरी सारी चाहतें पूरी हुईं।
आओ 2026, नए सपनों के साथ आओ,
नई उमंगें- नई खुशियां अपने साथ लाओ,
आशाओं के दीप जलाये इंतजार करेगी मंजू,
सुख, शांति और समृद्धि लेकर साथ आओ।।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।
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