१- मात- पिता के संग में, लगे धूप भी छांव।
आलय आंगन चहकता, जब रहते थे गांव।।
२- आंधी से डरते नहीं, करते देखा काज।
तुम हो मेरी प्रेरणा, तुमसे सगरे काज।।
३- जीना सीखा समर में, सीखा बनना धीर।
बाबा के पग चिन्ह चल, बना सिपाही वीर।।
४- निशि दिन खोजत फिरू मैं, करता करुण क्रंदन।
टिम-टिम आभा बिखेरे, बने सितारा गगन।।
स्वरचित: मंजू बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।