Friday, 26 December 2025

शरारती टिंकू: बाल कविता।

शरारती टिंकू: बाल कविता।


पढ़-पढ़ कर थक गए टिंकू भाई,
सोनू-मोनू की अब याद है आई।
गिल्ली-डंडा वो खेल रहे होंगे,
उछल रहे होंगे, हंस रहे होंगे।।

उसने खुरापाती दिमाग दौड़ाया,
खुद को बेड से नीचे लुढ़काया।
धम्म की आवाज सुन मम्मी दौड़ी,
मम्मी के पीछे, चाची- ताई दौड़ी।।

"अरे! बेचारा गिर गया नीचे,
लिया गोद में और ममता से सींचें।"
ताई ने टिंकू की गाल थपथपाई,
"जा बेटा! खेल, चाची ने दी दुहाई।।

टिंकू जी की जैसे लॉटरी लग गई,
बल्ले-बल्ले नाचे टिंकू भाई।
दादी के संग बाहर में निकल गया,
दोस्तों को देख चेहरा खिल गया,

गिल्ली- डंडा देख मुस्कान है छाई,
शरारती टिंकू ने ली अंगड़ाई।
दौड़कर दोस्तों के बीच गया,
जाकर खेल में रम गया।।

स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश।