कामकाज से होकर फ्री,
आज बालकनी में जा बैठी मैं।
कड़कड़ाती हुई इस ठंड में,
सूरज की नज़ाकत देख चकित थी मैं।।
लगता है सूर्य देव को भी खबर थी मेरी,
कि आज मंजू को मिलेगी थोड़ी छुट्टी।
वरना इस कोहरे में तो,
किस्मत ही रहती है कट्टी।।
सुबह की वो अमृत बेला,
और रजाई की वो रेशमी जेल।
भोर में जागना हम औरतों के लिए,
नहीं है किसी जंग से कम खेल।।
पांच बजते ही मोबाइल का, वो सुलगता अलार्म।
मानो चीख कर कहता हो, छोड़ो मंजू रजाई का मोह और काम पे लगो तमाम।।
आंखें मींचकर, उसे दो बार किया स्नूज़।
पर साढ़े पांच होते ही, उड़ गए नींद के सारे फ्यूज़।।
उठकर धरती मां को प्रणाम किया, गर्म पानी का घूंट भरा।
और फिर शुरू हुआ मेरा, झाड़ू-पोछा वाला मुशायरा।।
रसोई में घुसते ही, हाथ ऐसे चले जैसे कोई मशीन।
एक तरफ चाय खदबद, दूसरी तरफ आलू का हसीन सीन।।
टमाटर, मिर्च, धनिया, सब कटा सरपट।
पतिदेव का टिफिन पैक किया, जैसे हो कोई बजट।।
नाश्ता कराया, विदा किया, तब जाकर मिली थोड़ी शांति।
वरना सुबह की अफरा-तफरी, जैसे कोई बड़ी क्रांति।।
गुरु मां कहती हैं, गृहस्थ जीवन में कर्म ही पूजा है।
कर्तव्य कर्म से बढ़कर, ना कोई काम दूजा है।।
फिर मंदिर में लड्डू गोपाल को, जगाया, नहलाया और सजाया।
क्षमा करना प्रभु, अपना 'कर्तव्य धर्म' दोहराया।।
सासू मां को चटनी खूब भाई, तो आशीर्वादों की बारिश हुई।
चलो भाई, आज की कुकिंग की रेटिंग 'फाइव स्टार' हुई।।
सोचा अब नाश्ता कर लूं, तो बाथरुम से कपड़ों ने आवाज दी।
मंजू! मशीन में डालो हमें, क्या हमें भूलने की कसम खा ली?
बर्तन धोए, कपड़े सुखाए, रसोई कर दी चकाचक।
एक घंटे में निपट गए सारे काम, बिना किसी रोक- टोक।।
अचानक पेट में चूहों ने किया जब तांडव और धमाल।
तब घड़ी ने बताया, मंजू ग्यारह बज गए! बुरा है तेरा हाल।।
थकान तो है पैरों में, पर चेहरे पर है नूर।
जैसे कोई जंग जीत ली हो, उसका ही है सुरूर।।
ये बालकनी, ये कुनकुनी धूप, और फ़ुरसत के ये पल अब मेरे अपने हैं।
डायरी में उकेरूं वो बातें आज, जो स्त्री की शोभा हैं और स्त्री को बांधे हैं।।
स्वरचित: मंजू बोहरा बिष्ट,
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश।